ओबीसी आरक्षण सुनवाई: 50% सीमा EWS से टूटी या OBC से? हाईकोर्ट में सरकार की दलीलों पर उठे सवाल
Neel Tiwari | Jul 31, 2026, 18:01 IST
ओबीसी आरक्षण सुनवाई
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27% ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई में नया मोड़ आया। ओबीसी पक्ष ने दावा किया कि 50% आरक्षण सीमा ओबीसी नहीं, बल्कि EWS आरक्षण लागू होने से टूटी है।
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 27% ओबीसी आरक्षण की वैधता पर सुनवाई जारी है।
- विवाद 50% आरक्षण सीमा और क्वांटिफिएबल डेटा को लेकर है।
- शुक्रवार को सरकार ने अपना पक्ष पूरा किया।
- ओबीसी पक्ष ने कहा कि 50% सीमा पहले EWS आरक्षण से टूटी थी।
- सरकार की दलीलों पर अब ओबीसी वर्ग ने ही सवाल उठाए हैं।
अगली सुनवाई तीन अगस्त को
सुनवाई में 87-13% भर्ती फॉर्मूले को भी चुनौती दी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर फैसला होगा, उसके बाद 87-13% फॉर्मूले पर सुनवाई होगी। अगली सुनवाई सोमवार यानी तीन अगस्त को दोपहर 2:30 बजे होगी।
50% सीमा EWS ने तोड़ी?
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन ने अपना पक्ष पूरा किया। इसके बाद ओबीसी आरक्षण के समर्थन में अधिवक्ता शशांक रत्नू ने विस्तृत बहस रखी। दिनभर की सुनवाई में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा, महाजन आयोग रिपोर्ट, क्वांटिफिएबल डेटा और EWS आरक्षण सबसे प्रमुख मुद्दे रहे।
2019 से पहले भी कई बार हुए थे प्रयास
सरकार के अनुसार इसके बाद आरक्षण संशोधन विधेयक लाया गया। राज्यपाल ने उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया। फिर 30 जून 2003 को सरकार ने प्रस्ताव पारित किया।
इसमें ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की बात थी। इसके बाद 3 जुलाई 2003 को कैबिनेट ने अध्यादेश भी मंजूर किया। हालांकि पहले का विधेयक लंबित रहने से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
फिर महाजन आयोग की रिपोर्ट पर ही लौट आई सरकार
गुरुवार और शुक्रवार को सरकार की दलीलों में भी यही आधार प्रमुख रहा। इससे यह सवाल फिर उभरा कि 2019 का संशोधन भी क्या पुराने आंकड़ों के आधार पर किया गया था। इसी मुद्दे पर अदालत में लगातार बहस होती रही।
सरकार ने एसवी जोशी फैसले का हवाला दिया
सरकार की इस दलील को लेकर ओबीसी पक्ष ने सवाल उठाए। ओबीसी वर्ग ने सरकार के तर्कों पर सवाल उठाए हैं। पक्ष का कहना है कि सरकार खुद डेटा जुटाने के लिए समय मांग रही है। इससे संकेत मिलता है कि 2019 के संशोधन के समय सरकार के पास नया क्वांटिफिएबल डेटा नहीं था। ओबीसी पक्ष ने मामले में अनावश्यक देरी का आरोप लगाया है।
विरोध और समर्थन में लंबी बहस
इसके विपरीत सरकार ने केवल दो दिन की आंशिक सुनवाई में अपना पूरा पक्ष समाप्त कर दिया। इसके बाद अदालत ने अधिवक्ता शशांक रत्नू की दलीलें सुनीं।
शशांक रत्नू ने महाजन रिपोर्ट का किया समर्थन
इसलिए यह मानने का आधार है कि ओबीसी प्रतिनिधित्व में भी बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ होगा। उन्होंने यह भी कहा कि किसी सामाजिक वर्ग को पिछड़ेपन से बाहर आने में कम से कम दो पीढ़ियां लगती हैं। इसी आधार पर उन्होंने महाजन आयोग की रिपोर्ट और 2019 के संशोधन का समर्थन किया। उन्होंने पंजाब, बिहार और उत्तर प्रदेश का उदाहरण भी दिया।
उनके अनुसार मध्य प्रदेश की सामाजिक संरचना अलग है। उन्होंने कहा कि महाजन आयोग के अनुसार राज्य में अनुसूचित जाति लगभग 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति लगभग 20 प्रतिशत और ओबीसी आबादी 48.01 प्रतिशत थी। इसलिए मध्य प्रदेश की तुलना अन्य राज्यों से नहीं की जा सकती।
50% सीमा पहले EWS आरक्षण से टूटी
इसी आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि यदि 50 प्रतिशत सीमा टूटी है तो उसका कारण ओबीसी आरक्षण नहीं, बल्कि EWS आरक्षण का पहले लागू होना है। यह शुक्रवार की सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण तर्क रहा।
क्रीमी लेयर पर भी रखा गया स्पष्ट पक्ष
87-13% भर्ती फॉर्मूले को भी दी गई चुनौती
पहले संवैधानिक वैधता पर होगा फैसला
अब सोमवार को पूरी होगी बहस
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