OBC आरक्षण: 1982 की रिपोर्ट और 2022 के डेटा पर घिरी सरकार की दलील
Neel Tiwari | Jul 30, 2026, 17:52 IST
ओबीसी आरक्षण
जबलपुर हाईकोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई में अदालत ने सरकार के आंकड़ों पर कई सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा, 2019 में आरक्षण किस आधार पर बढ़ाया गया। सरकार ने महाजन आयोग और 2022 की रिपोर्ट का हवाला दिया। अगली सुनवाई 31 जुलाई को होगी।
जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामले में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सरकार की दलीलों पर अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के समक्ष पहले लंच तक ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत से अधिक किए जाने के पक्ष में विस्तृत बहस हुई।
लंच के बाद राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि 2019 में आरक्षण संशोधन करते समय सरकार ने किन आधारों और किस ताजा क्वांटिफिएबल डेटा पर भरोसा किया था।
सुनवाई के पहले चरण में ओबीसी पक्ष की ओर से अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने संविधान सभा की 23 नवंबर 1948 की बहस का हवाला देते हुए कहा कि उस समय सभी पक्षों ने पिछड़े वर्गों को समान अवसर देने के लिए आरक्षण की आवश्यकता स्वीकार की थी, लेकिन कहीं भी आरक्षण का प्रतिशत तय नहीं किया गया था।
उन्होंने अदालत से कहा कि जिस प्रकार अन्य वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिला है, उसी प्रकार ओबीसी वर्ग को भी उनकी आबादी के अनुरूप आरक्षण दिया जाना चाहिए।
लंच के बाद सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन ने महाजन आयोग की रिपोर्ट और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया।
सरकार ने अदालत को बताया कि महाजन आयोग के अनुसार उस समय सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व कुल मिलाकर लगभग 8.71 प्रतिशत था, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में ओबीसी आबादी 53.29 प्रतिशत थी। सरकार ने यह भी बताया कि इसी आधार पर पहले 14 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया।
इसके बाद सरकार ने डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय की 2022 की रिपोर्ट का भी हवाला दिया। सरकार के अनुसार इस रिपोर्ट में प्रथम श्रेणी की नौकरियों में ओबीसी प्रतिनिधित्व 9.55 प्रतिशत, द्वितीय श्रेणी में 23.18 प्रतिशत, तृतीय श्रेणी में 28.33 प्रतिशत और चतुर्थ श्रेणी में 32.56 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जबकि कुल प्रतिनिधित्व लगभग 28 प्रतिशत बताया गया।
इसी दौरान अदालत ने सरकार से पूछा कि यदि महाजन आयोग के समय 8.71 प्रतिशत प्रतिनिधित्व था और अब यह बढ़कर लगभग 28 प्रतिशत हो चुका है, तो यह स्वयं प्रतिनिधित्व बढ़ने का संकेत है। इस पर सरकार ने कहा कि वह जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की आवश्यकता दर्शाने के लिए यह तथ्य रख रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी किया कि जब 2019 में आरक्षण संशोधन लागू किया गया था, तब सरकार ने किस रिपोर्ट पर भरोसा किया था। इस पर सरकार ने स्पष्ट किया कि संशोधन के समय 1982 की महाजन आयोग रिपोर्ट के आधार पर ही निर्णय लिया गया था। इसके बाद अदालत ने पूछा कि 1982 से 2019 तक की अवधि में हुए बदलावों का आकलन किए बिना आरक्षण का प्रतिशत कैसे तय किया गया।
बहस के दौरान इंदिरा साहनी मामले का भी उल्लेख हुआ। ओबीसी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि इंदिरा साहनी का फैसला संविधान का हिस्सा नहीं है और सर्वोच्च न्यायालय कानून नहीं बनाता बल्कि उसकी व्याख्या करता है। साथ ही एन.एम. थॉमस मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि कुछ परिस्थितियों में 50 प्रतिशत की सीमा से आगे भी आरक्षण संभव माना गया है।
इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि 50 प्रतिशत सीमा से अधिक आरक्षण केवल असाधारण परिस्थितियों और उसके समर्थन में ठोस क्वांटिफिएबल डेटा होने पर ही न्यायिक परीक्षण में टिक सकता है।
गुरुवार की सुनवाई के दौरान सरकार और अन्य पक्षों की दलीलों के बीच सबसे अधिक चर्चा 2019 के संशोधन के आधार और ताजा आंकड़ों को लेकर रही। अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने के लिए कई सवाल पूछे कि संशोधन के समय उपलब्ध वास्तविक आंकड़े क्या थे और उनका मूल्यांकन किस प्रकार किया गया था। मामले की सुनवाई अब शुक्रवार 31 जुलाई को सुबह 11 बजे फिर होगी, जब राज्य सरकार अपनी शेष दलीलें अदालत के समक्ष रखेगी।
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लंच के बाद राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि 2019 में आरक्षण संशोधन करते समय सरकार ने किन आधारों और किस ताजा क्वांटिफिएबल डेटा पर भरोसा किया था।
ओबीसी वर्ग को भी आबादी के अनुरूप आरक्षण मिले
उन्होंने अदालत से कहा कि जिस प्रकार अन्य वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिला है, उसी प्रकार ओबीसी वर्ग को भी उनकी आबादी के अनुरूप आरक्षण दिया जाना चाहिए।
सरकार ने रखे ये तर्क
सरकार ने अदालत को बताया कि महाजन आयोग के अनुसार उस समय सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व कुल मिलाकर लगभग 8.71 प्रतिशत था, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में ओबीसी आबादी 53.29 प्रतिशत थी। सरकार ने यह भी बताया कि इसी आधार पर पहले 14 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया।
अंबेडकर विश्वविद्यालय की रिपोर्ट का हवाला
इसी दौरान अदालत ने सरकार से पूछा कि यदि महाजन आयोग के समय 8.71 प्रतिशत प्रतिनिधित्व था और अब यह बढ़कर लगभग 28 प्रतिशत हो चुका है, तो यह स्वयं प्रतिनिधित्व बढ़ने का संकेत है। इस पर सरकार ने कहा कि वह जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की आवश्यकता दर्शाने के लिए यह तथ्य रख रही है।
अदालत ने पूछे तीखे सवाल
इंदिरा साहनी केस का भी जिक्र
इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि 50 प्रतिशत सीमा से अधिक आरक्षण केवल असाधारण परिस्थितियों और उसके समर्थन में ठोस क्वांटिफिएबल डेटा होने पर ही न्यायिक परीक्षण में टिक सकता है।
शुक्रवार को फिर होगी सुनवाई
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