जादूगर गहलोत की नई बिसात, डोटासरा को ढाल बना पायलट पर साध रहे निशाना!
Mukesh Sharma | May 15, 2026, 10:05 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान की राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने गोविंद सिंह डोटासरा के नेतृत्व में अगला चुनाव लड़ने की बात कहकर नया बवंडर खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या यह महज मजाक है या पायलट को रोकने और आलाकमान को चुनौती देने की रणनीतिक घेराबंदी।
राजस्थान की राजनीति में पूर्व सीएम अशोक गहलोत जैसा खांटी राजनीतिज्ञ शायद ही कोई दूसरा हुआ हो। गहलोत कई बार कह चुके हैं कि राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं है। गहलोत की राजनीति को समझना आसान भी नहीं है। वह कई बार कह चुके हैं कि वह कोई भी बात ऐसे ही नहीं कहते, बल्कि उनकी बातों में छिपे अर्थ को समझना चाहिए।
सचिन पायलट और गहलोत की राजनीतिक प्रतिद्धंतिता किसी से छिपी नहीं है। मीडिया के सामने भले ही दोनों हाथ मिलाएं और कुछ भी कहें, लेकिन अंदरुनी सच्चाई यही है कि दोनों एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखना चाहते।
दिसंबर 2023 में कांग्रेस सरकार जाने के बाद और सचिन पायलट के एआईसीसी में बतौर महासचिव स्थापित होने के बाद से यह लगने लगा था कि अब राजस्थान की राजनीति में गहलोत की विदाई का समय आ गया है। लेकिन, गहलोत निरंतर सक्रिय हैं और राज्य में विपक्ष की राजनीति में छाए हुए हैं।
प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर के निर्माण के लिए कांस्टीट्यूशनल क्लब में 13 मई को एक बैठक थी। इस बैठक में अशोक गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को कहा कि डोटसरा जी अगला चुनाव आपके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। इसलिए तब तक कम से कम बिल्डिंग का एक फ्लोर तो बनवा ही दो बाकी आने वाला अध्यक्ष बना लेगा।
कहने को तो यह हंसी मजाक में बोली गई बात लगती है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गहलोत कभी भी कोई बात बिना किसी कारण नहीं बोलते। डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने जुलाई में छह साल पूरे हो जाएंगे और उनको हटना ही है।
कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि आलाकमान राजस्थान का नेतृत्व सचिन पायलट को देने का मन बना चुका है। इसके लिए उन्हें अगले विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस की कमान एक बार फिर से दी जानी है। लेकिन पायलट फिलहाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के इच्छुक नहीं हैं। वह चाहते हैं कि उनके किसी वफादार को यह मौका दिया जाए।
गहलोत को भी यह पता है इसलिए वह किसी भी हाल में पायलट या उनके किसी वफादार को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। फिर चाहे इसके लिए उन्हें डोटासरा पर ही दांव क्यों ना खेलना पड़े।
21 मई, 2025 को राजीव गांधी की पुण्य तिथि के मौके पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में हुए कार्यक्रम में गहलोत ने एक तीर से दो निशाने साधे थे। उन्होंने कहा था डोटासरा तो 2020 की मानेसर गए विधायकों के कारण उत्पन्न हुए राजनीतिक घटनाक्रम की देन हैं।
मानेसर जाने वाले विधायकों ने प्रियंका गांधी और अहमद पटेल के साथ हुई बैठक में डोटासरा को अध्यक्ष बनाने पर कोई ऐतराज नहीं जताया था। क्यों कि पायलट पहले ही उनका नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए आगे कर चुके थे। अब गहलोत भी उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात बोल रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार अशोक गहलोत की कही गई बात की कसौटी पर ही देखा जाए तो वह डोटासरा के समर्थन में नहीं हैं, बल्कि गहलोत सार्वजनिक रुप से उनके नेतृत्व में अगले चुनाव लड़ने की बात बोलकर पायलट को सतर्क कर रहे हैं।
क्योंकि कांग्रेस आलाकमान डोटासरा के संगठन की मजबूती के लिए किए गए काम से खुश है और सीधा उनके संपर्क में है। डोटासरा सामाजिक और राजनीतिक रुप से प्रभावशाली जाट समुदाय से हैं और शेखावाटी जैसे खांटी जाट बैल्ट से हैं। आलाकमान के अलावा प्रदेश के दूसरे सीनियर नेता भी उनके काम से प्रसन्न हैं।
ऐसे में गहलोत ना केवल पायलट को लेकर सतर्क हैं बल्कि अब डोटासरा को लेकर भी आशंकित दिख रहे हैं। नाम नहीं बताने की शर्त पर पायलट समर्थक नेता ने बताया कि अभी तक पायलट का पुन: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय है,लेकिन यह कब होगा यह नहीं पता।
इस बार आलाकमान भी गहलोत हो या डोटासरा या अन्य कोई नेता किसी के प्रभाव में अपने फैसले को नहीं बदलने वाला। लेकिन,यह नेता पूर्व सीएम अशोक गहलोत के प्रभाव और राजनीतिक कौशल को भी जानते हैं इसलिए साथ में गहलोत को दरकिनार करने की संभावना से भी इनकार करते हैं।
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सचिन पायलट और गहलोत की राजनीतिक प्रतिद्धंतिता किसी से छिपी नहीं है। मीडिया के सामने भले ही दोनों हाथ मिलाएं और कुछ भी कहें, लेकिन अंदरुनी सच्चाई यही है कि दोनों एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखना चाहते।
दिसंबर 2023 में कांग्रेस सरकार जाने के बाद और सचिन पायलट के एआईसीसी में बतौर महासचिव स्थापित होने के बाद से यह लगने लगा था कि अब राजस्थान की राजनीति में गहलोत की विदाई का समय आ गया है। लेकिन, गहलोत निरंतर सक्रिय हैं और राज्य में विपक्ष की राजनीति में छाए हुए हैं।
डोटासरा के नेतृत्व में अगला चुनाव
पायलट को रोकने की कवायद तो नहीं?
कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि आलाकमान राजस्थान का नेतृत्व सचिन पायलट को देने का मन बना चुका है। इसके लिए उन्हें अगले विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस की कमान एक बार फिर से दी जानी है। लेकिन पायलट फिलहाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के इच्छुक नहीं हैं। वह चाहते हैं कि उनके किसी वफादार को यह मौका दिया जाए।
गहलोत को भी यह पता है इसलिए वह किसी भी हाल में पायलट या उनके किसी वफादार को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। फिर चाहे इसके लिए उन्हें डोटासरा पर ही दांव क्यों ना खेलना पड़े।
लेकिन डोटासरा ही क्यों?
मानेसर जाने वाले विधायकों ने प्रियंका गांधी और अहमद पटेल के साथ हुई बैठक में डोटासरा को अध्यक्ष बनाने पर कोई ऐतराज नहीं जताया था। क्यों कि पायलट पहले ही उनका नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए आगे कर चुके थे। अब गहलोत भी उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात बोल रहे हैं।
जो बोला जाता है वह होता नहीं
क्योंकि कांग्रेस आलाकमान डोटासरा के संगठन की मजबूती के लिए किए गए काम से खुश है और सीधा उनके संपर्क में है। डोटासरा सामाजिक और राजनीतिक रुप से प्रभावशाली जाट समुदाय से हैं और शेखावाटी जैसे खांटी जाट बैल्ट से हैं। आलाकमान के अलावा प्रदेश के दूसरे सीनियर नेता भी उनके काम से प्रसन्न हैं।
ऐसे में गहलोत ना केवल पायलट को लेकर सतर्क हैं बल्कि अब डोटासरा को लेकर भी आशंकित दिख रहे हैं। नाम नहीं बताने की शर्त पर पायलट समर्थक नेता ने बताया कि अभी तक पायलट का पुन: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय है,लेकिन यह कब होगा यह नहीं पता।
इस बार आलाकमान भी गहलोत हो या डोटासरा या अन्य कोई नेता किसी के प्रभाव में अपने फैसले को नहीं बदलने वाला। लेकिन,यह नेता पूर्व सीएम अशोक गहलोत के प्रभाव और राजनीतिक कौशल को भी जानते हैं इसलिए साथ में गहलोत को दरकिनार करने की संभावना से भी इनकार करते हैं।
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