राजस्थान हाई कोर्ट ने बिना मांगे ही एएमबी होटल्स को दे दी 100 करोड़ की जमीन
Mukesh Sharma | May 13, 2026, 15:02 IST
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राजस्थान हाईकोर्ट के एक फैसले से एएमबी होटल वालों की तो जैसे किस्मत ही खुल गई। रोचक बात ये है कि होटल वाले न तो कोर्ट गए थे और न ही उन्होंने कोर्ट से कोई गुहार लगाई। फिर भी बिन खरीदे लॉटरी का जैकपॉट खुलने के अंदाज में उनके हाथ सीधे 100 करोड़ की जमीन हाथ लग गई। चलिए इस रोचक कहानी को समझते हैं…
जयपुर के जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर करीब 100 करोड़ रुपए की जमीन है। जेडीए (Jaipur Development Authority) ने 2007 में यह जमीन नीलाम की थी। उस समय एएमबी होटल्स प्राइवेट लिमिटेड ने 8 करोड़ से ज्यादा में यह जमीन खरीदी थी। गोपाललाल नाम के व्यक्ति ने जमीन पर हक जताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
अब राजस्थान हाई कोर्ट ने गोपाललाल की याचिका खारिज कर दी, लेकिन बिना मांगे ही होटल कंपनी को जमीन का कब्जा देने का आदेश भी दे दिया। कोर्ट का कहना है कि जमीन 1982 में ही जेडीए कब्जे में ले चुका है।
दरअसल साल 2007 में जेडीए ने सांगानेर के चैनपुरा गांव की 6 बिस्वा जमीन नीलाम की थी। एएमबी होटल्स ने 8 करोड़ रुपए की सबसे ऊंची बोली लगाई तो जेडीए ने उसे मंजूरी दे दी। इसके बाद कंपनी ने 8 करोड़ 20 लाख 5 हजार रुपए जमा भी करवा दिए। तभी गोपाललाल ने दावा किया कि यह जमीन उनकी है। उन्होंने जेडीए ट्रिब्यूनल (Tribunal) में याचिका लगाई।
20 दिसंबर 2007 को ट्रिब्यूनल ने यह याचिका खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल ने माना कि जमीन जेडीए की है। यहां ध्यान दें कि उस दौरान मामला लंबित होने की वजह से एएमबी होटल्स ने जमा रकम में से 4 करोड़ 90 लाख रुपए वापस ले लिए थे।
फिर गोपाललाल
ट्रिब्यूनल से राहत न मिलने पर गोपाललाल राजस्थान हाई कोर्ट पहुंच गए। 4 मार्च 2008 को हाई कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। गोपाललाल का दावा था कि सांगानेर के सहायक सेटलमेंट अधिकारी (Assistant Settlement Officer) ने 6 नवंबर 1985 को उनके नाम खातेदारी दर्ज की थी। तभी से वह उस जमीन पर काबिज थे।
हाई कोर्ट के जस्टिस गणेशराम मीना ने रिकॉर्ड खंगाले। पता चला कि 21 अगस्त 1969 को भूमि अधिग्रहण की धारा-4 की अधिसूचना जारी हुई थी। 28 फरवरी 1973 को धारा-6 की अधिसूचना आई। 3 जून 1981 को 6 बिस्वा जमीन का अवार्ड पारित हो गया। 6 जुलाई 1982 को जेडीए ने जमीन का कब्जा ले लिया।
यानी जब गोपाललाल के पक्ष में 1985 में सेटलमेंट अधिकारी ने आदेश दिया, तब जेडीए पहले ही 1982 में जमीन का कब्जा ले चुकी थी। कोर्ट ने कहा कि 1985 का वह आदेश अवैध था। इसके अलावा गोपाललाल या उनसे पहले के खातेदारों ने कभी अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी। इस आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
यहां से असली पेंच शुरू होता है। कोर्ट ने गोपाललाल की याचिका खारिज की, यह तो ठीक था। लेकिन फैसला सुनाते हुए जस्टिस मीना ने यह भी कह दिया कि एएमबी होटल्स को 15 दिन के भीतर जमीन का कब्जा दिया जाए।
बड़ी बात यह है कि एएमबी होटल्स इस केस में सिर्फ प्रतिवादी थी। उसने खुद कोई याचिका नहीं लगाई थी। याचिका में कहीं भी यह मांग नहीं थी कि होटल कंपनी को जमीन का कब्जा दिलाया जाए। इस आदेश से कंपनी को करीब 100 करोड़ रुपए की जमीन बिन मांगे मिल गई। जबकि उसके सिर्फ 3 करोड़ 30 लाख 5 हजार रुपए ही जेडीए के पास जमा थे।
स्थापित न्यायिक सिद्धांत बिल्कुल साफ है। हाई कोर्ट में जो याचिका लगाता है, राहत उसी को मिल सकती है। प्रतिवादी को कोई राहत चाहिए तो उसे अलग से याचिका दायर करनी होती है।
राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) 2008 में रामेश्वर प्रसाद केस में यह बात साफ कर चुकी है। उसने कहा था कि अदालत गैर-याचिकाकर्ता या प्रतिवादी के पक्ष में राहत नहीं दे सकती। ऐसा करना अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर है। खंडपीठ ने यह भी कहा था कि ऐसे आदेश से ऐसा लगेगा जैसे याचिका प्रतिवादी ने दायर की हो।
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यह पहली बार नहीं है जब ऐसा विवाद उठा। 2007 में ही एक अलग केस में एकलपीठ (Single Bench) ने चैनपुरा गांव की ही जमीन अधिग्रहण को कानूनी मानते हुए खातेदार की याचिका खारिज की थी। उस केस में पिंक सिटी गृह निर्माण सहकारी समिति प्रतिवादी थी। समिति ने वहां सिद्धार्थ नगर कॉलोनी बसा दी थी। एकलपीठ ने समिति के सदस्यों को पट्टे जारी करने का भी आदेश दे दिया।
सरकार और जेडीए ने उस आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी। 2 अप्रैल 2010 को खंडपीठ ने एकलपीठ के उस आदेश को गलत ठहराया। इससे पहले एक अन्य अपील में भी खंडपीठ ने यही कहा था। यानी खुद राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ पहले भी ऐसे आदेशों को रद्द कर चुकी है।
यह मामला न्यायिक अनुशासन और प्रक्रियागत निष्पक्षता का सवाल उठाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून के सामने समानता की गारंटी है। लेकिन जब अदालत बिना मांगे किसी प्रतिवादी को 100 करोड़ रुपए की संपत्ति दे दे, तो यह न्यायिक परंपराओं और संविधान की भावना दोनों पर सवाल खड़ा करता है।
सार्वजनिक जमीन का मामला होने की वजह से यह जनहित से भी जुड़ा है। जेडीए करदाताओं की जवाबदेही वाली सरकारी संस्था है। इसकी जमीन पर कौन और कैसे कब्जा पाता है, यह आम नागरिक के लिए जानना जरूरी है।
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अब राजस्थान हाई कोर्ट ने गोपाललाल की याचिका खारिज कर दी, लेकिन बिना मांगे ही होटल कंपनी को जमीन का कब्जा देने का आदेश भी दे दिया। कोर्ट का कहना है कि जमीन 1982 में ही जेडीए कब्जे में ले चुका है।
ऐसे शुरू हुआ जमीन का विवाद
20 दिसंबर 2007 को ट्रिब्यूनल ने यह याचिका खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल ने माना कि जमीन जेडीए की है। यहां ध्यान दें कि उस दौरान मामला लंबित होने की वजह से एएमबी होटल्स ने जमा रकम में से 4 करोड़ 90 लाख रुपए वापस ले लिए थे।
फिर गोपाललाल हाई कोर्ट पहुंच गए
गोपाललाल का कहना था कि जेडीए ने बाउंड्रीवॉल तोड़कर जबरन कब्जा लिया। फिर 16 अप्रैल 2007 को जमीन नीलाम कर दी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जमीन को अवाप्त (अधिग्रहण) भी माना जाए तो सरकार के 26 मई 2000 के एक सकुर्लर के मुताबिक उसे आवासीय आरक्षित दर की 25 फीसदी दर पर नियमित होना चाहिए। जबकि जेडीए ने गोपाललाल को अतिक्रमी करार दिया।
तो फिर कोर्ट ने क्यों माना जेडीए का हक
यानी जब गोपाललाल के पक्ष में 1985 में सेटलमेंट अधिकारी ने आदेश दिया, तब जेडीए पहले ही 1982 में जमीन का कब्जा ले चुकी थी। कोर्ट ने कहा कि 1985 का वह आदेश अवैध था। इसके अलावा गोपाललाल या उनसे पहले के खातेदारों ने कभी अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी। इस आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
इधर बिन मांगे मिला कब्जा तो उठे सवाल
बड़ी बात यह है कि एएमबी होटल्स इस केस में सिर्फ प्रतिवादी थी। उसने खुद कोई याचिका नहीं लगाई थी। याचिका में कहीं भी यह मांग नहीं थी कि होटल कंपनी को जमीन का कब्जा दिलाया जाए। इस आदेश से कंपनी को करीब 100 करोड़ रुपए की जमीन बिन मांगे मिल गई। जबकि उसके सिर्फ 3 करोड़ 30 लाख 5 हजार रुपए ही जेडीए के पास जमा थे।
क्या कहती है न्यायिक परंपरा
राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) 2008 में रामेश्वर प्रसाद केस में यह बात साफ कर चुकी है। उसने कहा था कि अदालत गैर-याचिकाकर्ता या प्रतिवादी के पक्ष में राहत नहीं दे सकती। ऐसा करना अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर है। खंडपीठ ने यह भी कहा था कि ऐसे आदेश से ऐसा लगेगा जैसे याचिका प्रतिवादी ने दायर की हो।
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पुरानी मिसाल भी है मौजूद
सरकार और जेडीए ने उस आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी। 2 अप्रैल 2010 को खंडपीठ ने एकलपीठ के उस आदेश को गलत ठहराया। इससे पहले एक अन्य अपील में भी खंडपीठ ने यही कहा था। यानी खुद राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ पहले भी ऐसे आदेशों को रद्द कर चुकी है।
यह खबर क्यों जरूरी है
सार्वजनिक जमीन का मामला होने की वजह से यह जनहित से भी जुड़ा है। जेडीए करदाताओं की जवाबदेही वाली सरकारी संस्था है। इसकी जमीन पर कौन और कैसे कब्जा पाता है, यह आम नागरिक के लिए जानना जरूरी है।
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