परिवहन विभाग में दो सीनियर IAS अफसरों में ठनी, 3 बार बदली 6 इंस्पेक्टरों की पोस्टिंग
Mukesh Sharma | Jun 15, 2026, 13:26 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के परिवहन विभाग में आयुक्त पुरुषोत्तम शर्मा और प्रमुख सचिव भवानी सिंह देथा के बीच जंग छिड़ी हुई है। दोनों सीनियर आईएएस अधिकारियों के बीच यह लड़ाई आपसी अधिकारों को लेकर सामने आई है।
ऐसे समझें पूरा मामला
- परिवहन आयुक्त पुरुषोत्तम शर्मा और प्रमुख सचिव भवानी सिंह देथा के बीच छिड़ी जंग।
- एक ही विभाग के दोनों आईएएस अधिकारियों के बीच यह लड़ाई अधिकारों को लेकर।
- विवाद की शरुआत आयुक्त की ओर से 6 एपीओ परिवहन इंस्पेक्टरों की पोस्टिंग से हुई।
- प्रमुख शासन सचिव ने सचिवालय में फाइल आते ही 24 घंटे में निरस्त कर दिए आदेश।
- महज 21 दिन में पोस्टिंग के चार आदेश जारी हुए। इनमें तीन बार बदली गई पोस्टिंग।
अधिकारों और ईगो की इस लड़ाई का नतीजा यह हुआ कि 21 दिन के भीतर 6 इंस्पेक्टरों की पोस्टिंग चार अलग-अलग आदेशों की फाइलों में झूलती रही। उनकी पोस्टिंग 3 बार बदल दी गई। स्थिति यह है कि कर्मचारी-अधिकारी यह समझने में असमर्थ हैं कि उनका असली बॉस कौन है।
कैसे शुरू हुआ कुर्सी का कुरुक्षेत्र?
आदेश के तहत इंस्पेक्टर महेश पारीक और नवल मीणा को को आरटीओ प्रथम जयपुर, प्रमोद चौधरी को झालावाड़, पुष्पेंद्र भारद्वाज को डूंगरपुर, गौतम मिश्रा को बांसवाड़ा और रामचंद्र को पोकरण भेजा गया। महेश कुमार और नवल मीणा ने तो तुरंत अपनी नई कुर्सी संभालकर काम भी शुरू कर दिया।
24 घंटे में पलट गई बाजी
इसके बाद शुरू हुआ फाइलों का कोल्ड वॉर। पूरे 10 दिन तक यह फाइल सचिवालय के गलियारों में धूल फांकती रही। अंदरखाने चर्चा थी कि अब समझौता हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 12 जून को बिना प्रशासनिक सुधार विभाग की अनुमति के एक नया आदेश जारी कर दिया गया, जिसने इस विवाद को और हवा दे दी।
ताश के पत्तों की तरह बदली पोस्टिंग
नए आदेश में प्रमोद चौधरी को झालावाड़ की जगह जोधपुर भेज दिया गया। पुष्पेंद्र भारद्वाज को डूंगरपुर से हटाकर जयपुर-द्वितीय लगा दिया गया। गौतम मिश्रा को बांसवाड़ा की बजाय सादुलशहर लगा दिया गया। रामचंद्र को पोकरण के बजाय कोटा का टिकट थमा दिया गया।
महज 21 दिन के भीतर परिवहन विभाग में उन्हीं 6 चेहरों के लिए 4 अलग-अलग आदेश जारी किए गए। इंस्पेक्टरों की 3 बार पोस्टिंग बदली गई है। राजस्थान में इसे प्रशासनिक इतिहास के दुर्लभ वाकयों में से एक माना जा रहा है।
आखिर कौन है सही?
आयुक्त कार्यालय की दलील है कि राजस्थान सेवा नियम-1951 (RSR) और भारतीय संविधान का अनुच्छेद-309 विभागाध्यक्ष (HOD) को यह पावर देता है कि वह अपनी सुविधानुसार कर्मचारियों की नियुक्ति और पदस्थापन कर सके।
सचिवालय का कहना है कि सरकार रूल्स ऑफ बिजनेस से चलती है। इसके तहत सचिव के पास अंतिम वीटो पावर होती है।
एक रिटायर्ड आईएएस का कहना है कि रूल्स ऑफ बिजनेस मुख्य रूप से सचिवालय की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए हैं, जबकि विभागीय स्तर पर नियुक्तियों और अधिकारों को परिभाषित करने का असली काम आरएसआर और अनुच्छेद-309 ही करते हैं। ऐसे में यह लड़ाई अब ईगो और वर्चस्व की बन चुकी है।
एक तरफ सुधारों का ढिंढोरा, दूसरी तरफ अंदरूनी कलह
विभाग में दलालों की नो-एंट्री, ऑनलाइन ऑटोमेटेड ड्राइविंग ट्रैक और बसों-वाहनों की जीपीएस मॉनिटरिंग जैसे हाई-टेक सुधारों के दावे किए जा रहे हैं।
दोनों अधिकारियों ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। सवाल है कि जब विभाग के दो सबसे बड़े मुखिया ही आपस में उलझे हों, तो जमीनी स्तर पर सुधारों की गाड़ी कैसे पटरी पर दौड़ेगी।
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