पुलिस को नहीं है बेल बॉन्ड निरस्त करने का अधिकार, हाई कोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी
Mukesh Sharma | May 09, 2026, 20:39 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि पुलिस या जांच एजेंसियां खुद बेल बॉन्ड रद्द नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने माना कि आरोपी को परेशान करने के लिए बाद में गंभीर धाराएं जोड़ना गलत है। बेल बॉन्ड या जमानत रद्ध करने का अधिकार केवल अदालत के पास है।
News In Short
- राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा, पुलिस को नहीं है बेल बॉन्ड रद्द करने का अधिकार।
- कोर्ट ने कहा एक बार स्वीकार किए गए बेल बॉन्ड केवल कोर्ट ही रद्द कर सकती है।
- जांच एजेंसी किसी आरोपी की स्वतंत्रता छीनने के लिए न्यायिक शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकती।
- कोर्ट ने पाया कि इस मामले में बिजली अधिनियम की धारा-136 जबरन जोड़ी गई।
- पुलिस को जमानत रद्द करानी है तो उसे सक्षम अदालत में प्रार्थना पत्र पेश करना होगा।
News In Detail
जस्टिस अनिल उपमन ने यह आदेश मानवेन्द्र सिंह राठौड़ उर्फ मोनू की आपराधिक याचिका पर दिया। याचिका में जोधपुर के बोरूंदा थाने में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की गई थी।
यह है मामला
याचिकाकर्ता का कहना था कि कब्जा तो एफआईआर दर्ज करवाने वाले ने कर रखा है और गोदाम का पट्टा उसके दादा के नाम है। पुलिस ने शुरु में गैर-जमानती धाराओं में मामला दर्ज किया था और याचिकाकर्ता की जमानत के बेल-बांड भी स्वीकार कर लिए थे। लेकिन, बाद में मामले को गैर-जमानती बनाने के लिए बिजली अधिनियम की धारा-136 जोड़ दी ओर बेल बांड रद्ध कर दिए।
कोर्ट ने माना-संपत्ति विवाद है असली जड़
बिजली कंपनी ने क्यों नहीं करवाई रिपोर्ट दर्ज
रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो धारा 136 जोड़ने को उचित ठहराता हो। मीटर रीडर की रिपोर्ट घटना के लगभग एक महीने बाद तैयार की गई। यदि वास्तव में बिजली मीटर से छेड़छाड़ हुई होती तो बिजली विभाग तुरंत कार्रवाई करता। धारा 136 को आरोपी की स्वतंत्रता सीमित करने के उद्देश्य से जोड़ा गया।
पुलिस होती कौन है..
तो कोर्ट आती पुलिस
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