जॉब के नाम पर विदेश भेजकर बनाते थे साइबर गुलाम, 5 आरोपियों गिरफ्तार
Ashish Bhardwaj | Aug 04, 2026, 12:27 IST
साइबर स्लेवरी गैंग
राजस्थान पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय साइबर स्लेवरी गैंग के 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह गैंग जॉब का लालच देकर युवाओं को कंबोडिया, म्यांमार, वियतनाम और लाओस भेजता था। वहां पासपोर्ट छीनकर उनसे जबरन साइबर ठगी करवाई जाती थी।
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान में इंटरनेशनल साइबर स्लेवरी गैंग का खुलासा।
- जॉब के बहाने युवाओं को विदेश भेजकर ठगी कराई।
- लाओस-कंबोडिया समेत चार देशों से जुड़े तार।
- पासपोर्ट छीनकर युवाओं को बनाया जाता था बंधक।
- पुलिस ने 5 आरोपियों को किया गिरफ्तार।
पुलिस ने सोमवार रात इस अंतरराष्ट्रीय साइबर स्लेवरी गिरोह का खुलासा किया। इसमें साइबर फ्रॉड के साथ मानव तस्करी के भी सबूत मिले हैं।
किन आरोपियों को किया गिरफ्तार
जांच में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। आरोपी जीतूराज ने करीब 10 भारतीय युवाओं के पासपोर्ट और निजी दस्तावेज चीनी हैंडलर्स को सौंप दिए थे।
I4C की जांच में मिला बड़ा सुराग
इन सभी को जॉब का लालच देकर कंबोडिया, वियतनाम, म्यांमार और लाओस भेजा गया था। इनमें से कई अब तक भारत नहीं लौट सके हैं। जो पीड़ित वापस लौटे, उन्होंने भी अपनी आपबीती बताई। उनके अनुसार वहां उनके साथ मारपीट और मानसिक प्रताड़ना होती थी। उन्हें जबरन साइबर फ्रॉड करने पर मजबूर किया जाता था।
फर्जी प्रोफाइल से करोड़ों की ठगी
पूछताछ के बाद पुलिस ने कोलकाता से तीन और आरोपियों को पकड़ा। यह तीनों टूरिस्ट वीजा पर म्यांमार जाने की तैयारी में थे।
आरोपियों ने पूछताछ में ठगी का पूरा तरीका बताया। साइबर स्कैम सेंटर में उन्हें पहले ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके बाद फेक प्रोफाइल बनाकर सोशल मीडिया पर भारतीयों से दोस्ती की जाती थी। धीरे-धीरे उनका विश्वास जीता जाता था। इसके बाद क्रिप्टोकरेंसी और निवेश में भारी मुनाफे का लालच दिया जाता था। इसी झांसे में पीड़ित लाखों रुपए निवेश कर देते थे। यह पूरी रकम म्यूल अकाउंट्स से निकालकर क्रिप्टोकरेंसी में बदली जाती थी। आखिर में यह रकम चीन और कंबोडिया के हैंडलर्स तक पहुंचाई जाती थी।
पासपोर्ट छीनकर बनाया जाता था बंधक
विदेश पहुंचते ही असली खेल शुरू होता था। युवाओं के पासपोर्ट और पहचान-पत्र तुरंत जब्त कर लिए जाते थे। इसके बाद उन्हें डिजिटल अरेस्ट, फेक इन्वेस्टमेंट और क्रिप्टो फ्रॉड जैसे साइबर अपराध करने पर मजबूर किया जाता था। उनसे रोजाना सुबह 9 बजे से रात साढ़े 11 बजे तक काम कराया जाता था। अगर कोई काम छोड़ना चाहता, तो उसे हजारों डॉलर जुर्माने और मारपीट की धमकी दी जाती थी।
पांचों आरोपियों की अलग-अलग भूमिका
सागर सिंह की भूमिका भी अहम थी। वह पोइपेट में फेसबुक पर फर्जी महिला प्रोफाइल बनाकर लोगों से दोस्ती करता था। कुछ दिनों की चैटिंग में ही वह पीड़ितों की गोपनीय जानकारी हासिल कर लेता था। इसके बाद वह पूरी जानकारी अपने टीम लीडर को सौंप देता था।
जीतूराज उर्फ जेम्स का काम पैसों के लेन-देन से जुड़ा था। वह क्रिप्टो एक्सचेंज बायनेन्स पर अकाउंट चलाता था। इसके जरिए वह ठगी की रकम USDT में बदलकर आगे भेजता था। वह भारत से फर्जी सिम कार्ड और मूल अकाउंट भी साइबर सेंटर तक पहुंचाता था।
रवि कुमार उर्फ माही साल 2023 से ही कंबोडिया में सक्रिय था। वह वहां नए लोगों को फर्जी प्रोफाइल बनाने की ट्रेनिंग देता था। बाद में वह म्यांमार के नए स्कैम सेंटर में शिफ्ट होने की तैयारी में था।
अनिल कुमार उर्फ डेविल, जीतूराज का भाई है। वह 2024 में कंबोडिया गया था और करीब एक साल तक स्कैम सेंटर में सक्रिय रहा। उसे म्यांमार के एक स्कैम सेंटर में निर्माण सुपरवाइजर बनाकर भेजा जा रहा था। पुलिस ने उसे म्यांमार की उड़ान से ठीक पहले कोलकाता से पकड़ लिया।
अभी भी जारी है तलाश
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