हाई कोर्ट ने आटा-साटा प्रथा को बताया अमानवीय और नैतिक रूप से दिवालिया, दी तलाक को मंजूरी
Jageshwar prasad | May 19, 2026, 11:49 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान हाईकोर्ट ने आटा-साटा प्रथा को अमानवीय और कानूनी रूप से दिवालिया बताते हुए पत्नी की तलाक याचिका स्वीकार की। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग लड़कियों को सौदेबाजी की वस्तु बनाने वाली यह प्रथा वैवाहिक बंधक जैसी है।
News In Short
- राजस्थान हाईकोर्ट ने आटा-साटा प्रथा को अमानवीय सौदा बताकर किया खारिज।
- जजों ने कहा- यह प्रथा कानूनी और नैतिक रूप से दिवालिया है।
- नाबालिग ननद के मुकलावा से इनकार करने पर पत्नी को घर से निकाला गया था।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया- भरण-पोषण याचिका अनुचित दबाव नहीं, रक्षात्मक कदम है।
- पत्नी के भरण-पोषण छोड़ने के बाद हाईकोर्ट ने तलाक को मंजूरी दी।
News In Detail
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक मामलों में क्रूरता साबित करने के लिए आपराधिक मुकदमों की तरह संदेह से परे (beyond reasonable doubt) सबूतों की आवश्यकता नहीं होती। संभावनाओं की प्रबलता (preponderance of probability) ही पर्याप्त है।
क्या है पूरा मामला और विवाद की जड़?
इसके बाद लड़के वालों के परिवार ने अपना गुस्सा याचिकाकर्ता बहू पर निकालना शुरू कर दिया। पीड़िता का आरोप है कि उसे लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और 19 मार्च 2020 को उसे उसकी दुधमुंही बेटी के साथ घर से धक्के मारकर निकाल दिया गया। पीड़िता ने इसके बाद बीकानेर के नयाशहर पुलिस थाने में पति और ससुर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की नामजद एफआईआर दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने चार्जशीट भी पेश की थी।
फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
सहनशीलता प्रताड़ना की सहमति नहीं
अदालत ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि जब शादियों को परिवारों के बीच वित्तीय या सामाजिक आदान-प्रदान (बार्टर) का जरिया बना दिया जाता है, तो उसमें लड़कियों को महज एक वस्तु समझा जाता है।
इस प्रथा में एक लड़की की ज़िंदगी दूसरी लड़की के कहने-मानने पर टिकी होती है। यह बात किसी भी सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है। कोर्ट ने पत्नी की दलीलों को सही मानते हुए तुरंत तलाक की डिक्री जारी करने के आदेश दिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
राजस्थान हाईकोर्ट ने आटा-साटा प्रथा को लेकर क्या सख्त टिप्पणी की है?
फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किया?
क्या इस तलाक के फैसले से बच्चों की कस्टडी या अन्य मुकदमों पर असर पड़ेगा?
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