जयपुर में 42 बीघा जमीन अब हाउसिंग बोर्ड की, हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी के दावों को किया ध्वस्त

Mukesh Sharma | Apr 11, 2026, 09:28 IST
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42 bigha
Photograph: (the sootr)

राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर के बी-2 बाइपास की 42 बीघा जमीन पर राजस्थान हाउसिंग बोर्ड के मालिकाना हक को सही ठहराया है। कोर्ट ने एग्रीमेंट-टू-सेल को अवैध बताते हुए जेडीए के पुराने नियमितीकरण आदेशों को रद्द कर दिया।

News In Short

  • तीन दशक पुराने विवाद में आवासन मंडल की जीत, निजी समितियों के दावे खारिज
  • धोखाधड़ी और तथ्यों को छिपाकर प्राप्त किए गए अदालती आदेश कानूनन अवैध
  • एग्रीमेंट-टू-सेल से नहीं मिलता मालिकाना हक, सेल डीड के बिना दावा शून्य
  • जेडीए की 1995 की योजना स्वीकृति रद्द, अब करोड़ों की जमीन पर होगा हाउसिंग बोर्ड का कब्जा

News In Detail

राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर के सबसे महंगे इलाकों में शुमार बी-2 बाइपास की करीब 42 बीघा बेशकीमती जमीन के मालिकाना हक को लेकर चल रहे तीन दशक पुराने कानूनी विवाद पर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने निजी समितियों और व्यक्तियों के दावों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी से हासिल किए गए आदेश कभी वैध नहीं हो सकते।

जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने राजस्थान आवासन मंडल (RHB) की याचिका को स्वीकार करते हुए न केवल जेडीए (JDA) द्वारा पूर्व में जारी नियमितीकरण आदेशों को रद्द कर दिया, बल्कि 1981 में हुए तथाकथित 'समझौता विक्रय' को भी शून्य घोषित कर दिया है।

कैसे उलझा 42 बीघा जमीन का मामला?

इस विवाद की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी। जवाहरपुरी भवन निर्माण सहकारी समिति ने दावा किया था कि उन्होंने 31 जुलाई, 1981 को मूल खातेदारों से जमीन खरीदने का एग्रीमेंट कर लिया था और वहां श्रीराम कॉलोनी-बी योजना बनाई। राज्य सरकार ने सार्वजनिक उपयोग के लिए साल 1990 में इस भूमि को अवाप्त कर लिया और 1991 में राजस्थान हाउसिंग बोर्ड को कब्जा सौंप दिया था।

जेडीए ने बढ़ाई कानूनी पेचिदगियां

भूमि अवाप्ति और आवासन मंडल को कब्जा मिलने के बावजूद जेडीए ने 1995 में इस निजी योजना को मंजूरी दे दी। इससे कानूनी पेचिदागियां बढ़ गईं। समिति ने साल 2002 में हाईकोर्ट की एकलपीठ से जेडीए को पट्टे जारी करने का आदेश ले लिया था। हाउसिंग बोर्ड ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि यह आदेश तथ्यों को छिपाकर प्राप्त किया गया था।

एग्रीमेंट-टू-सेल से नहीं मिलता मालिकाना हक

अदालत ने अपने 47 पन्नों के विस्तृत फैसले में हाउसिंग बोर्ड की याचिका स्वीकार करते हुए कहा है कि केवल एग्रीमेंट-टू-सेल से मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता। जब तक सेल डीड न हो समिति जमीन की मालिक नहीं बन सकती।

अदालत ने माना कि 2002 का अदालती आदेश गलत जानकारी देकर प्राप्त किया गया था। धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश यदि फाईनल भी हो जाए तब भी वह कानून की नजर में शून्य और अवैध ही रहता है। कोर्ट ने माना है कि 5 दिसंबर, 1991 को जमीन का भौतिक कब्जा आवासन मंडल को दिया जा चुका था और मुआवजे की राशि भी सिविल कोर्ट में जमा थी। 1986 की ऑडिट रिपोर्ट और 2019 की जांच समिति की रिपोर्ट से यह साबित है कि अवाप्ति के समय मौके पर कोई कॉलोनी या योजना अस्तित्व में ही नहीं थी।

सभी आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने जेडीए के 29 मई, 1995 को दी गई योजना स्वीकृति और उसके बाद के सभी आदेशों को अवैध मानकर रद्द कर दिया है। अदालत ने मूल खातेदारों को राहत देते हुए कहा है कि यदि उन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला है तो वे सिविल कोर्ट में इसके लिए आवेदन कर सकते हैं। हाउसिंग बोर्ड की ओर से सीनियर एडवोकेट ऐ.के.शर्मा व एडवोकेट दिनेश यादव ने पैरवी की।

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