जीरा और सौंफ पर क्यों लड़ रहे राजस्थान और गुजरात? किसानों ने GI Tag पर उठाए सवाल
Ashish Bhardwaj | Aug 26, 2026, 15:06 IST
राजस्थान जीरा और सौंफ
गुजरात के उंझा को जीरा और सौंफ के लिए मिले GI टैग पर पश्चिमी राजस्थान के किसानों में आक्रोश है। SABC ने वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाते हुए जीआई रजिस्ट्रार से दोबारा समीक्षा की मांग की है।
समझें क्या है पूरा मामला
- गुजरात के उंझा को जीरा-सौंफ GI टैग मिलने पर राजस्थान में विरोध।
- पश्चिमी राजस्थान के किसानों ने फैसले की समीक्षा की मांग की।
- SABC ने GI टैग के दावों पर वैज्ञानिक सवाल उठाए।
- किसानों का दावा, जीरा-सौंफ की असली पहचान राजस्थान की है।
- मामला अब GI रजिस्ट्रार के पास विचाराधीन है।
पश्चिमी राजस्थान में जीरा और सौंफ की खेती करने वाले किसानों के बीच इन दिनों गहरी नाराजगी है। इसकी वजह गुजरात के मेहसाणा जिले स्थित उंझा शहर के जीरा और सौंफ को मिला GI (Geographical Indication) यानी भौगोलिक संकेतक टैग है।
जोधपुर जिला मंडी के व्यापारियों और किसानों का दावा है कि इस फैसले से पश्चिमी राजस्थान के किसानों की पहचान को नुकसान पहुंच रहा है। इसी मामले में जोधपुर स्थित SABC ने भी जीआई रजिस्ट्रार को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है।
किसान बोले, हमारी पहचान लौटाई जाए
उन्होंने मांग की कि निष्पक्ष जांच कर राजस्थान के किसानों की असली पहचान उन्हें लौटाई जाए। किसानों का कहना है कि यह सिर्फ एक टैग का मामला नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और पहचान से जुड़ा सवाल है।
SABC का तर्क, उंझा सिर्फ व्यापारिक केंद्र
SABC की रिपोर्ट के अनुसार उंझा देश का सबसे बड़ा जीरा व्यापार केंद्र जरूर है, लेकिन सिर्फ व्यापारिक पहचान के आधार पर किसी उत्पाद को GI टैग नहीं दिया जा सकता। रिपोर्ट का दावा है कि उंझा मंडी में बिकने वाला ज्यादातर जीरा और सौंफ, खासकर सिरोही जैसे जिलों से, वास्तव में राजस्थान और अन्य राज्यों से वहां पहुंचता है।
कहां होता है सबसे ज्यादा उत्पादन
वहीं गुजरात में बनासकांठा, पाटन, मेहसाणा, कच्छ और सुरेंद्रनगर जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर खेती होती है। इनमें उंझा मुख्य व्यापार केंद्र के तौर पर काम करता है।
वैज्ञानिक आधार पर उठे सवाल
SABC का यह भी कहना है कि आवेदन में डीयूएस (DUS – Distinctness, Uniformity and Stability) विशेषताओं का इस्तेमाल किया गया, जो पौधों की किस्म पहचानने का पैमाना है। उनका तर्क है कि यह किसी उत्पाद की भौगोलिक विशिष्टता साबित करने का सही आधार नहीं है।
अब आगे क्या होगा
GI टैग होता क्या है
संसद ने दिसंबर 1999 में इससे जुड़ा अधिनियम पारित किया था। इसे 2003 में लागू किया गया। इसी के तहत भारत में उत्पादों को GI टैग देने की प्रक्रिया शुरू हुई।
GI टैग
कैसे मिलता है यह टैग
आवेदन चेन्नई स्थित सीजीपीडीटीएम (CGPDTM – Controller General of Patents, Designs and Trade Marks) के दफ्तर में किया जाता है। यह संस्था दावों की पूरी जांच करती है। संतुष्ट होने के बाद ही उत्पाद को GI टैग दिया जाता है।
GI Tag मिलने के बाद इसका इस्तेमाल सिर्फ संबंधित समुदाय ही कर सकता है। यह टैग 10 साल के लिए मान्य होता है और बाद में इसे रिन्यू भी कराया जा सकता है। इससे उत्पाद की पहचान मजबूत होती है और नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलती है।
FAQ
- जीरा-सौंफ को लेकर विवाद क्यों शुरू हुआ?
गुजरात के उंझा शहर के जीरा और सौंफ को GI टैग मिला है। पश्चिमी राजस्थान के किसानों का दावा है कि असली उत्पादन उनके क्षेत्र में होता है। इसी वजह से किसानों और व्यापारियों में नाराजगी है। - SABC ने इस मामले में क्या मांग की है?
SABC ने जीआई रजिस्ट्रार से उंझा के टैग की स्वतंत्र वैज्ञानिक और कानूनी समीक्षा की मांग की है। उनका कहना है कि सिर्फ व्यापारिक केंद्र होने के आधार पर GI टैग नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने पीयर-रिव्यू जांच की सिफारिश की है। - GI टैग कितने समय के लिए मान्य होता है?
GI टैग मिलने के बाद यह 10 साल के लिए मान्य रहता है। इसे बाद में रिन्यू भी कराया जा सकता है। यह टैग केवल संबंधित समुदाय के लोग ही इस्तेमाल कर सकते हैं।
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