आखिर कब तक हिरासत बनी रहेगी 'कब्रगाह', खाकी पर गहराते खून के दाग
The Sootr | Apr 28, 2026, 17:22 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान पुलिस का ध्येय वाक्य है- अपराधियों में डर, आमजन में विश्वास। लेकिन वर्तमान हालात को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्रदेश में यह वाक्य उलट चुका है। आज आम आदमी अपराधियों से ज्यादा पुलिस की लाठी और थानों की चारदीवारी से खौफ खा रहा है।
योगेंद्र योगी@जयपुर
Jaipur: राजस्थान में पुलिस भले ही खनन माफिया, बजरी माफिया और संगठित गिरोहों के सामने नतमस्तक नजर आए, लेकिन निहत्थे नागरिकों पर जुल्म ढाने में खाकी ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। राजस्थान में पुलिस हिरासत में हो रही मौतों का सिलसिला अब महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक फेलियर बन चुका है।
हाल ही में पाली जिले से एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। चेन्नई में हुई एक चोरी के मामले में पूछताछ के बहाने पुलिस ने एक ज्वेलर को उठाया। आरोप है कि पुलिस ने उन्हें न केवल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, बल्कि झूठे केस में फंसाने की धमकी भी दी।
इस प्रताड़ना से टूटकर ज्वेलर ने जहर खा लिया। बड़े भाई की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि छोटे भाई ने भी पुलिस डर से जहर खा लिया। वह जोधपुर एम्स में वेंटिलेटर पर मौत से लड़ रहा है। मरने से पहले हिरासत में लिए भाई का वो आखिरी वॉइस मैसेज पुलिसिया बर्बरता का सबसे बड़ा सबूत है। क्या एक सभ्य समाज में पूछताछ का तरीका इतना खौफनाक हो सकता है कि कोई मौत को गले लगा ले?
26 सितंबर 2025 को बांसवाड़ा में 22 वर्षीय दिलीप अहारी की मौत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा सवाल खड़ा किया। डूंगरपुर के दोवड़ा थाने में हुई इस मौत के बाद जो हुआ, वह राजस्थान पुलिस के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। आम तौर पर सरकार मुआवजे की घोषणा करती है, लेकिन यहाँ पुलिस ने खुद बिचौलियों के जरिए परिजनों को 27.50 लाख रुपये नकद थमा दिए। आदिवासी अंचल में इसे 'मौताणा' कहा जाता है।
सवाल यह है कि क्या यह पैसा पुलिसकर्मियों की निजी जेब से आया या विभाग ने चंदा किया? और सबसे बड़ा सवाल-यदि पुलिस बेगुनाह थी, तो इतनी बड़ी रकम देकर मामला रफा-दफा करने की क्या जरूरत थी? इस सौदेबाजी की जानकारी मंत्री, सांसद और कलेक्टर तक को थी, जो व्यवस्था की मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
राजस्थान के थानों से निकलने वाली लाशों की फेहरिस्त बहुत लंबी है:
11 अगस्त 2025 (राजसमंद): चोरी के शक में बुलाए गए ज्वेलर्स खुबचंद सोनी की संदिग्ध मौत। हंगामे के बाद 4 पुलिसकर्मी सस्पेंड।
15 अप्रैल 2025 (झुंझुनूं): खेतड़ी में पप्पू राम मीणा की मौत। डीएसपी और एसएचओ सहित 8 पर हत्या का मुकदमा दर्ज।
मई-अक्टूबर 2024: झुंझुनूं में कुमार गौरव की मौत (कारण लू लगना बताया गया) और फलोदी में फूल सिंह की मौत।
दिसंबर 2024: श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ में नरेश नरसी की तथाकथित आत्महत्या।
इन सभी मामलों में एक पैटर्न कॉमन है-मौत के बाद हंगामा, फिर सस्पेंशन, फिर एक आंतरिक जांच और अंत में 'क्लीन चिट'।
राजस्थान विधानसभा में पेश आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सरकार ने खुद माना कि पिछले दो साल में हिरासत में 21 मौतें हुईं। इनमें से 13 मामलों में पुलिस को क्लीन चिट दी जा चुकी है।
वर्ष 2024: 8 मौतें, सभी में पुलिस को क्लीन चिट।
वर्ष 2025: 13 मौतें, 5 में क्लीन चिट, 9 में जांच जारी।
क्या यह मुमकिन है कि थाने की कस्टडी में होने वाली हर मौत सिर्फ बीमारी या आत्महत्या हो? जब जांच करने वाले और आरोपी एक ही विभाग के हों, तो न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ जाती है।
लोकसभा के आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल औसतन 140 से 175 कस्टोडियल मौतें होती हैं। महाराष्ट्र इस सूची में शीर्ष पर है, लेकिन राजस्थान भी पीछे नहीं है। पिछले 5 सालों में राजस्थान में 51 मौतें पुलिस कस्टडी में हुई हैं। साल 2025-26 के शुरुआती महीनों (15 मार्च तक) में ही 18 मौतें हो चुकी हैं, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है। यह आंकड़ा चेतावनी दे रहा है कि पुलिस बेलगाम हो चुकी है।
25 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के मामलों का स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ी टिप्पणी की थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि हिरासत में मौतें एक कलंक हैं और इन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने थानों में CCTV कैमरों की अनुपलब्धता पर भी नाराजगी जताई।
2018 के आदेश के बावजूद कई थानों में या तो कैमरे नहीं हैं, या वे काम नहीं कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि थाने का 'रिमांड रूम' भी कैमरे की जद में होना चाहिए और फुटेज को 18 महीने तक सुरक्षित रखना अनिवार्य है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब भी कोई कांड होता है, पता चलता है कि उस दिन कैमरा खराब था या बिजली गुल थी।
पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ न्याय की एक उम्मीद 6 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु से आई। मदुरै की एक अदालत ने 2020 के चर्चित सथानकुलम कस्टोडियल डेथ मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई। पिता-पुत्र (जयराज और बेनिक्स) की पुलिस प्रताड़ना से हुई मौत ने पूरे देश को हिला दिया था। राजस्थान पुलिस के लिए यह एक कड़ा सबक है कि कानून के हाथ बहुत लंबे हैं।
हिरासत में मौतों का यह कलंक तब तक नहीं धुलेगा जब तक जवाबदेही तय न हो। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ सस्पेंशन नहीं, बल्कि हत्या का मुकदमा चले और त्वरित अदालत में सुनवाई हो। पूछताछ के आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाए। पुलिस को नेताओं की कठपुतली बनने से रोका जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि थानों के CCTV फुटेज का कंट्रोल रूम सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास हो। पुलिस का काम समाज की रक्षा करना है, भक्षक बनना नहीं। यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। राजस्थान पुलिस को अपनी वर्दी पर लगे इन खून के दागों को धोने के लिए आत्मचिंतन और आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है।
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Jaipur: राजस्थान में पुलिस भले ही खनन माफिया, बजरी माफिया और संगठित गिरोहों के सामने नतमस्तक नजर आए, लेकिन निहत्थे नागरिकों पर जुल्म ढाने में खाकी ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। राजस्थान में पुलिस हिरासत में हो रही मौतों का सिलसिला अब महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक फेलियर बन चुका है।
हंसते-खेलते परिवार की तबाही
इस प्रताड़ना से टूटकर ज्वेलर ने जहर खा लिया। बड़े भाई की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि छोटे भाई ने भी पुलिस डर से जहर खा लिया। वह जोधपुर एम्स में वेंटिलेटर पर मौत से लड़ रहा है। मरने से पहले हिरासत में लिए भाई का वो आखिरी वॉइस मैसेज पुलिसिया बर्बरता का सबसे बड़ा सबूत है। क्या एक सभ्य समाज में पूछताछ का तरीका इतना खौफनाक हो सकता है कि कोई मौत को गले लगा ले?
'मौताणा' या गुनाह छिपाने की कीमत?
सवाल यह है कि क्या यह पैसा पुलिसकर्मियों की निजी जेब से आया या विभाग ने चंदा किया? और सबसे बड़ा सवाल-यदि पुलिस बेगुनाह थी, तो इतनी बड़ी रकम देकर मामला रफा-दफा करने की क्या जरूरत थी? इस सौदेबाजी की जानकारी मंत्री, सांसद और कलेक्टर तक को थी, जो व्यवस्था की मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
तारीखें बदलती हैं, पर कहानियां वही:
11 अगस्त 2025 (राजसमंद): चोरी के शक में बुलाए गए ज्वेलर्स खुबचंद सोनी की संदिग्ध मौत। हंगामे के बाद 4 पुलिसकर्मी सस्पेंड।
15 अप्रैल 2025 (झुंझुनूं): खेतड़ी में पप्पू राम मीणा की मौत। डीएसपी और एसएचओ सहित 8 पर हत्या का मुकदमा दर्ज।
मई-अक्टूबर 2024: झुंझुनूं में कुमार गौरव की मौत (कारण लू लगना बताया गया) और फलोदी में फूल सिंह की मौत।
दिसंबर 2024: श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ में नरेश नरसी की तथाकथित आत्महत्या।
इन सभी मामलों में एक पैटर्न कॉमन है-मौत के बाद हंगामा, फिर सस्पेंशन, फिर एक आंतरिक जांच और अंत में 'क्लीन चिट'।
क्लीन चिट का खेल
वर्ष 2024: 8 मौतें, सभी में पुलिस को क्लीन चिट।
वर्ष 2025: 13 मौतें, 5 में क्लीन चिट, 9 में जांच जारी।
क्या यह मुमकिन है कि थाने की कस्टडी में होने वाली हर मौत सिर्फ बीमारी या आत्महत्या हो? जब जांच करने वाले और आरोपी एक ही विभाग के हों, तो न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ जाती है।
राजस्थान पांचवें पायदान पर
सुप्रीम कोर्ट की फटकार
2018 के आदेश के बावजूद कई थानों में या तो कैमरे नहीं हैं, या वे काम नहीं कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि थाने का 'रिमांड रूम' भी कैमरे की जद में होना चाहिए और फुटेज को 18 महीने तक सुरक्षित रखना अनिवार्य है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब भी कोई कांड होता है, पता चलता है कि उस दिन कैमरा खराब था या बिजली गुल थी।
मदुरै की नजीर: जब खाकी को मिली फांसी
सुधार की जरूरत कहां?
विशेषज्ञों का कहना है कि थानों के CCTV फुटेज का कंट्रोल रूम सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास हो। पुलिस का काम समाज की रक्षा करना है, भक्षक बनना नहीं। यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। राजस्थान पुलिस को अपनी वर्दी पर लगे इन खून के दागों को धोने के लिए आत्मचिंतन और आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है।
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