भ्रष्टाचार के खिलाफ कमजोर पड़ती कार्यकर्ताओं की लड़ाई, बार-बार खारिज होती RTI, कानून बना मजाक
Amit Baijnath Garg | Oct 21, 2025, 12:50 IST
Photograph: (the sootr)
देश में 100 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या। राजस्थान में कार्यकर्ताओं पर 17 से ज्यादा हमले, दो की जान गई। 15 से ज्यादा को मारपीट या धमकी देकर डराया गया है।
Jaipur. सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के लागू होने के 20 वर्ष पूरे होने पर जहां पारदर्शिता और जवाबदेही की बातें हो रही हैं, वहीं इस कानून के जरिए भ्रष्टाचार उजागर करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं की जान पर बनी है। देश में आरटीआई का कानून अब चिड़ियाघर का शेर बनता जा रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता और वी द पीपल की फाउंडर की मंजू सुराणा ने कमजोर होते इस कानून के बारे में चौकाने वाले खुलासे किए हैं। सुराणा ने बताया कि देश में अब तक 100 से अधिक आरटीआई कार्यकताओं की हत्या हो चुकी है, जबकि सैकड़ों पर हमले और धमकियां जारी हैं। हत्या के पीछे अक्सर वही कारण होते हैं, वे किसी सच को उजागर करने के करीब पहुंच जाते हैं, लेकिन जांच एजेंसियां या मीडिया, ध्यान भटका देते हैं।
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आरटीआई कार्यकर्ताओं का दर्द इस मामले से समझिए। ये प्रकरण पुणे जिले के संदीप शेट्टी के भाई सत्यनारायण शेट्टी की हत्या का था, जिनकी याद में अब भी उनका परिवार न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है। सत्यनारायण शेट्टी को स्थानीय निकायों और पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।
2010 में उन्हें गोली मार दी गई थी। केस की जांच सीबीआई को सौंपी गई, लेकिन आरोपियों को अब तक सजा नहीं मिली है। सत्यनारायण के भाई संदीप ने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि मेरे भाई के हत्यारे कई बार जेल गए, लेकिन जमानत पर बाहर आकर सबूत मिटाने में जुट गए। अगर न्यायपालिका और एजेंसियां समय पर कार्रवाई करतीं, तो यह हाल न होता। इसी तरह के दर्जनों मामले फाइलों में धूल चाट रहे हैं।
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कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) के अनुसार, देश में आरटीआई एक्टिविस्टों पर हमले के सैकड़ों मामले दर्ज हैं। अब तक 100 से अधिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। सुराणा ने बताया कि वे खुद भी दो बड़े हादसों से बची हैं, लेकिन फिर भी वे सूचना के अधिकार को जनशक्ति का सबसे बड़ा माध्यम मानती हैं। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार से लड़ना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है, यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
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एक पूर्व आईपीएस अधिकारी का कहना है कि उन्होंने 50 से अधिक आरटीआई आवेदन दाखिल किए, जिनमें से अधिकांश को बार-बार खारिज कर दिया गया। इस विरोधाभास ने सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सूचना का अधिकार सिर्फ जानकारी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ को मजबूत करने का अधिकार है।
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डाटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसे नए कानूनों ने इस अधिकार के भविष्य पर भी खतरा पैदा कर दिया है। सुराणा ने बताया कि आरटीआई नागरिकों को सरकार से जवाब मांगने का औजार देता है, लेकिन अब इसका दुरुपयोग रोकने के नाम पर इसे कमजोर किया जा रहा है। कई राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पदों के कारण लंबित मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे आवेदकों को महीनों तक जवाब नहीं मिल पाते हैं।
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क्या मौजूदा सरकार इस कानून को कमजोर करना चाहती है, क्या देश में राष्ट्रीय सुरक्षा का पत्ता फेंक तानाशाही का दौर शुरू होने जा रहा है। आरटीआई जैसे कानून की हैसियत को कमजोर करना इस ओर इशारा कर रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता और वी द पीपल की फाउंडर की मंजू सुराणा ने कमजोर होते इस कानून के बारे में चौकाने वाले खुलासे किए हैं। सुराणा ने बताया कि देश में अब तक 100 से अधिक आरटीआई कार्यकताओं की हत्या हो चुकी है, जबकि सैकड़ों पर हमले और धमकियां जारी हैं। हत्या के पीछे अक्सर वही कारण होते हैं, वे किसी सच को उजागर करने के करीब पहुंच जाते हैं, लेकिन जांच एजेंसियां या मीडिया, ध्यान भटका देते हैं।
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एक दिल को हिला देने वाला उदाहरण
2010 में उन्हें गोली मार दी गई थी। केस की जांच सीबीआई को सौंपी गई, लेकिन आरोपियों को अब तक सजा नहीं मिली है। सत्यनारायण के भाई संदीप ने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि मेरे भाई के हत्यारे कई बार जेल गए, लेकिन जमानत पर बाहर आकर सबूत मिटाने में जुट गए। अगर न्यायपालिका और एजेंसियां समय पर कार्रवाई करतीं, तो यह हाल न होता। इसी तरह के दर्जनों मामले फाइलों में धूल चाट रहे हैं।
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भ्रष्टाचार से लड़ना सामूहिक जिम्मेदारी
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विशेष सुरक्षा कानून बनाया जाए हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं, जहां सबसे अधिक हमले दर्ज किए गए। मानवाधिकार संगठनों ने सरकार से मांग की है कि आरटीआई एक्टिविस्टों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाया जाए और ऐसे मामलों की जांच फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। सुराणा का कहना है कि सत्य उजागर करने वालों को संरक्षण देना लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में पहला कदम है।
सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल
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आवेदकों को महीनों तक जवाब नहीं
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