गुलाबी नगरी का फीका पड़ रहा रंग, क्या जयपुर खो देगा वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा?
Jageshwar prasad | Apr 29, 2026, 15:06 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में जयपुर का यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज दर्जा खतरे में है। अनियंत्रित विकास और 400 से अधिक ऐतिहासिक हवेलियों के विध्वंस के कारण शहर अपनी मूल पहचान खो रहा है। यूनेस्को ने दिसंबर 2026 तक विस्तृत कार्ययोजना पेश करने की अंतिम मोहलत दी है।
News In Short
- यूनेस्को ने जयपुर को खतरे की सूची में डालने की चेतावनी दी, दिसंबर 2026 तक मांगी रिपोर्ट।
- परकोटे की करीब 400 ऐतिहासिक हवेलियां आधुनिक निर्माण और व्यावसायिक दबाव की भेंट चढ़ीं।
- अवैध निर्माण और मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं से शहर की 300 साल पुरानी ग्रिड योजना प्रभावित।
- ठठेरों और कारीगरों के पारंपरिक रास्तों का आधुनिक शोरूम्स में बदलना विरासत के लिए बड़ा खतरा।
- विशेषज्ञों ने हवेली मालिकों के लिए हेरिटेज फंड और ड्रोन मैपिंग के जरिए सख्त निगरानी की दी सलाह।
News In Detail
यूनेस्को की चेतावनी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जयपुर अब खतरे की सूची में जाने की कगार पर है। नवंबर 2025 में वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी ने जयपुर के अद्वितीय सार्वभौमिक मूल्य (Outstanding Universal Value - OUV) को खतरे में बताया है। राजस्थान सरकार को दिसंबर 2026 तक की मोहलत दी गई है कि वह एक ऐसी विस्तृत रिपोर्ट पेश करे, जो यह साबित कर सके कि वह इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए गंभीर है। अब सवाल उठता है कि जिस शहर को सहेजने का वादा हमने पूरी दुनिया से किया था, उसे हम अपने ही भीतर क्यों खोते जा रहे हैं?
महाराजा सवाई जय सिंह II का स्वप्न और जयपुर की वास्तुकला
शहर को नौ वर्गों में विभाजित किया गया था, जिसे नौ निधियां कहा जाता था। सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, जो उस समय के किसी भी भारतीय शहर के लिए एक क्रांतिकारी सोच थी।
जयपुर के बाजारों की खूबसूरती उनके एक जैसे दिखने वाले स्तंभों (Colonnades) और समरूपता में थी। जौहरी बाजार, त्रिपोलिया बाजार और चांदपोल बाजार जैसे क्षेत्रों को व्यापार के साथ-साथ सौंदर्य के लिए डिजाइन किया गया था।
महाराजा ने कला और शिल्प को बढ़ावा देने के लिए 36 अलग-अलग उद्योगों की स्थापना की। प्रत्येक शिल्प (जैसे मीनाकारी, कुंदन, पत्थर की नक्काशी) के लिए एक विशिष्ट गली तय की गई थी। यही जीवित विरासत जयपुर को अन्य मृत स्मारकों से अलग और महान बनाती है।
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विरासत जब बोझ बनने लगी
इसका एक कारण यह भी है कि अधिकांश हवेलियां निजी स्वामित्व में हैं। मालिकों के लिए पुरानी हवेली का रखरखाव करना आर्थिक रूप से कठिन होता है। वहीं, सरकार की ओर से इन्हें सहेजने के लिए कोई ठोस वित्तीय प्रोत्साहन या सब्सिडी नहीं दी जाती। परिणाम यह होता है कि रातों-रात इन धरोहरों को गिरा दिया जाता है ताकि वहां व्यावसायिक मॉल्स या होटल बनाए जा सकें।
नामांकन के समय वादा किया गया था कि परकोटा (Walled City) के भीतर की सभी मध्यकालीन संरचनाओं को संरक्षित किया जाएगा। लेकिन आज, संकरी गलियों में बहुमंजिला अवैध निर्माणों ने शहर की संरचना को बिगाड़ दिया है।
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यूनेस्को की चेतावनी और खतरे की सूची का डर
अब यूनेस्को ने राजस्थान सरकार से जवाब मांगा है। यदि सरकार यह साबित नहीं कर पाती कि वह धरोहर संरक्षण को लेकर गंभीर है तो जयपुर को वर्ल्ड हेरिटेज इन डेंजर सूची में डाल दिया जाएगा। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शहर की प्रतिष्ठा के लिए एक बड़ा झटका होगा और भविष्य में यह टैग छीना भी जा सकता है।
जयपुर बनाम अहमदाबाद
नगर निगमों के पास वह तकनीकी विशेषज्ञता और हेरिटेज सेल की कमी है जो आधुनिक विकास और प्राचीन संरक्षण के बीच संतुलन बना सके। कागजों पर तो हेरिटेज मैनेजमेंट प्लान बहुत सुंदर दिखते हैं, लेकिन धरातल पर क्रियान्वयन शून्य है। नीतियों और वास्तविक संरक्षण के बीच एक गहरी खाई है।
लुप्त होती जीवित परंपराएं
बाजार के संरेखण और दुकान की टाइपोलॉजी जयपुर की यूनेस्को सूची का मुख्य आधार थी। आज, बड़े-बड़े साइनबोर्ड्स, अतिक्रमण और प्लास्टिक के ढांचों ने उस ऐतिहासिक लुक को पूरी तरह ढंक दिया है।
हम अपनी धरोहर क्यों नहीं बचा पा रहे?
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भविष्य के लिए क्या जरूरी?
ड्रोन डिटेल्ड मैपिंग और डिजिटल दस्तावेजीकरण के जरिए हर ऐतिहासिक इमारत की साप्ताहिक निगरानी होनी चाहिए। जब तक जयपुर के लोग अपनी हवेलियों और गलियों को अपना गौरव नहीं मानेंगे, प्रशासन अकेले कुछ नहीं कर पाएगा। विरासत शिक्षा को स्कूली स्तर पर अनिवार्य करना होगा। हवेलियों को होमस्टे या संग्रहालयों में बदलने के लिए सरल प्रक्रिया अपनानी चाहिए, ताकि मालिक को विरासत बोझ न लगे।
जयपुर का यूनेस्को टैग खतरे में होना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारी सामूहिक सांस्कृतिक हार है। 1727 में जो शहर भविष्य की ओर देख रहा था, 2026 में वह अपने अतीत को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यूनेस्को के टैग और संरक्षण दिशा-निर्देश केवल प्रतीकात्मक होते हैं; असली शक्ति हमारी अपनी नीतियों और इच्छाशक्ति में होती है।
यदि हम आज नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां जयपुर को केवल इतिहास की किताबों और धुंधली तस्वीरों में ही देख पाएंगी। जयपुर की हवेलियां और बाजार केवल पत्थर और ईंट के नहीं हैं, वे राजस्थान की आन, बान और शान के गवाह हैं। इन्हें बचाना केवल यूनेस्को के लिए नहीं, बल्कि खुद के अस्तित्व के लिए जरूरी है।
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