पत्नी की निजी जानकारी के लिए RTI का इस्तेमाल गलत, राजस्थान हाई कोर्ट ने बरकरार रखा तलाक
Mukesh Sharma | Nov 01, 2026, 22:25 IST
हाईकोर्ट का अहम फैसला, आरटीआई का गलत इस्तेमाल और एटीएम से जबरन सैलरी निकालना मानसिक क्रूरता
राजस्थान हाई कोर्ट ने पति द्वारा पत्नी की निजी जानकारी आरटीआई से मांगना, पत्नी के सहकर्मियों के साथ उसके अवैध संबंध होने के झूठे आरोप लगाना और पत्नी के सैलरी अकाउंट के एटीएम कार्ड से जबरन पैसे निकालने को मानसिक क्रूरता माना है। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने पति की अपील को खारिज करते हुए तलाक की डिक्री को बरकरार रखा है।
अदालत ने अपने फैसले में माना कि पति द्वारा लगाए गए सभी आरोपों का पत्नी ने फैमली कोर्ट में तथ्यों के साथ खंडन किया था। वहीं पति द्वारा पत्नी की मेडिकल और सैलरी संबंधित जानकारी मांगने के लिए आरटीआई लगाने के तथ्य भी फाइल पर मौजूद हैं।
इसके साथ ही दोनों साल 2018 से अलग-अलग रह रहे हैं। ऐसे में दोनों के बीच दाम्पत्य संबंधों की पुर्नस्थापना की कोई संभावना नहीं बची हैं।
पत्नी की ओर से अधिवक्ता शोवित झांझड़िया ने अदालत को बताया कि दोनों का विवाह 6 फरवरी 2010 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। वैवाहिक जीवन से उनकी दो बेटियां हैं, जो पत्नी के साथ रह रही हैं।
पत्नी ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल करते हुए आरोप लगाया था कि विवाह के शुरुआती दौर से ही उसे पति और उसके परिवार के सदस्यों की ओर से प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने दहेज की मांग, दुर्व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न के आरोप भी लगाए।
पत्नी के अनुसार, पति ने उसके कार्यस्थल पर आरटीआई आवेदन देकर उसकी मेडिकल स्थिति, वेतन और अन्य निजी जानकारियां हासिल करने का प्रयास किया। इन गतिविधियों का उद्देश्य उसे मानसिक रूप से परेशान करना और विभाग में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था।
पत्नी ने यह भी कहा कि 4 नवंबर 2018 को पति ने उसे और दोनों बेटियों को घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद दोनों के बीच वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं हो सके।
पत्नी का
राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) की खंडपीठ ने अपने फैसले में पत्नी के उस बयान पर विचार किया, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि पति ने उसका एटीएम कार्ड अपने पास रख लिया था और उससे वेतन की राशि निकालता था।
पत्नी ने यह भी कहा था कि उसे अपना ATM कार्ड अपने पास रखने की अनुमति नहीं थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी ने फैमिली कोर्ट में अपने बयान के दौरान इन तथ्यों को रखा था और जिरह के दौरान भी इस संबंध में साक्ष्य दिए थे। खंडपीठ ने पति के इस आचरण को वैवाहिक संबंधों में क्रूरता के प्रश्न पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।
वहीं पत्नी का आरोप था कि गर्भावस्था के दौरान पति और उसके परिवार ने उसकी उचित देखभाल नहीं की और उसे पर्याप्त भोजन तक उपलब्ध नहीं कराया।
पति ने हाईकोर्ट में स्वयं पैरवी करते हुए पत्नी की ओर से लगाए गए आरोपों को गलत बताया। पति ने कहा कि फैमली कोर्ट ने मानसिक क्रूरता को गलत तरीके से परिभाषित किया हैं। पति का कहना था कि उसने कभी दहेज की मांग नहीं की और न ही पत्नी या उसके परिवार को धमकी दी।
पति ने दलील दी कि पत्नी उसके साथ रहना नहीं चाहती थी और वह अपनी बेटियों के साथ रहना चाहता था। पति ने यह आपत्ति भी उठाई कि तलाक की अर्जी पर फैमली कोर्ट-2 को सुनवाई का अधिकार ही नहीं था।
वहीं उसने पहले हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए अर्जी दायर की थी। जो मंजूर कर ली गई थी। ऐसे में तलाक की अर्जी पर फैसला नहीं किया जा सकता था।
इसके साथ ही दोनों साल 2018 से अलग-अलग रह रहे हैं। ऐसे में दोनों के बीच दाम्पत्य संबंधों की पुर्नस्थापना की कोई संभावना नहीं बची हैं।
प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया
पत्नी ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल करते हुए आरोप लगाया था कि विवाह के शुरुआती दौर से ही उसे पति और उसके परिवार के सदस्यों की ओर से प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने दहेज की मांग, दुर्व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न के आरोप भी लगाए।
पत्नी के अनुसार, पति ने उसके कार्यस्थल पर आरटीआई आवेदन देकर उसकी मेडिकल स्थिति, वेतन और अन्य निजी जानकारियां हासिल करने का प्रयास किया। इन गतिविधियों का उद्देश्य उसे मानसिक रूप से परेशान करना और विभाग में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था।
पत्नी ने यह भी कहा कि 4 नवंबर 2018 को पति ने उसे और दोनों बेटियों को घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद दोनों के बीच वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं हो सके।
पत्नी का एटीएम कार्ड पति अपने पास रखता था
पत्नी ने यह भी कहा था कि उसे अपना ATM कार्ड अपने पास रखने की अनुमति नहीं थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी ने फैमिली कोर्ट में अपने बयान के दौरान इन तथ्यों को रखा था और जिरह के दौरान भी इस संबंध में साक्ष्य दिए थे। खंडपीठ ने पति के इस आचरण को वैवाहिक संबंधों में क्रूरता के प्रश्न पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।
वहीं पत्नी का आरोप था कि गर्भावस्था के दौरान पति और उसके परिवार ने उसकी उचित देखभाल नहीं की और उसे पर्याप्त भोजन तक उपलब्ध नहीं कराया।
पति ने आरोपों को बताया निराधार
पति ने दलील दी कि पत्नी उसके साथ रहना नहीं चाहती थी और वह अपनी बेटियों के साथ रहना चाहता था। पति ने यह आपत्ति भी उठाई कि तलाक की अर्जी पर फैमली कोर्ट-2 को सुनवाई का अधिकार ही नहीं था।
वहीं उसने पहले हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए अर्जी दायर की थी। जो मंजूर कर ली गई थी। ऐसे में तलाक की अर्जी पर फैसला नहीं किया जा सकता था।
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