डेटा प्रोटेक्शन एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: 21 मीडिया हाउस पहुंचे कोर्ट, खोजी पत्रकारिता पर कैसे पड़ेगा असर
CHAKRESH | Oct 27, 2026, 13:22 IST
डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की टाइमलाइन, संसद से सुप्रीम कोर्ट तक डीपीडीपी कानून का पूरा सफर
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन के 21 मीडिया हाउस ने डीपीडीपी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। 698 पन्नों की DNPA petition में कहा गया है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता को पंगु बना देगा। गोपनीय स्रोतों की पहचान भी खतरे में पड़ सकती है। यही डेटा प्रोटेक्शन एक्ट आम लोगों को निजी डेटा पर अधिकार भी देता है। सवाल यह है कि दोनों में संतुलन कैसे बनेगा?
रॉयटर्स के मुताबिक याचिका 698 पन्नों की है। प्रकाशकों का तर्क है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता को पंगु बना देगा। उनके मुताबिक गोपनीय स्रोतों की पहचान भी खतरे में पड़ेगी। यह मामला सिर्फ मीडिया का नहीं है। यह आपके फोन, आपके डेटा और आपके जानने के हक से भी जुड़ा है।
डीएनपीए (DNPA - Digital News Publishers Association) देश के 21 प्रमुख डिजिटल समाचार प्रकाशकों का समूह है। याचिका में मुकेश अंबानी का नेटवर्क 18 शामिल है। गौतम अडानी का एनडीटीवी भी इसमें है।
द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम भी साथ हैं। इतने बड़े मीडिया समूहों का एक साथ अदालत जाना आम बात नहीं है। DNPA petition का केंद्र एक ही सवाल है। क्या निजता के नाम पर प्रेस की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है?
डीपीडीपी (DPDP - Digital Personal Data Protection) यानी डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून। संसद ने इसे अगस्त 2023 में पास किया था। केंद्र ने इसके नियम नवंबर 2025 में जारी किए।
नियम 12 से 18 महीने में चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहे हैं। यह डेटा प्राइवेसी कानून आपके ऑनलाइन निजी डेटा की सुरक्षा के लिए है। नाम, मोबाइल नंबर, पता और ऑनलाइन गतिविधि जैसी जानकारी इसमें आती है।
डेटा इकट्ठा करने वाली कंपनी या संस्था को "डेटा फिड्यूशरी" (डेटा का जिम्मेदार संरक्षक) कहा गया है। जिसका डेटा है, उसे "डेटा प्रिंसिपल" (डेटा का मालिक) कहा गया है।
आम आदमी को
यह DPDP Act आम नागरिक को अपने डेटा पर नियंत्रण देता है। आप जान सकते हैं कि किस संस्था के पास आपका कौन-सा डेटा है। गलत जानकारी सुधरवा सकते हैं। सहमति वापस लेकर डेटा हटाने की मांग भी कर सकते हैं।
नियमों के मुताबिक डेटा लीक होने पर प्रभावित व्यक्ति को बिना देरी सूचना देनी होगी। कानूनी जरूरत न हो तो निजी डेटा एक साल से ज्यादा नहीं रखा जा सकेगा। डेटा मिटाने से पहले 48 घंटे का नोटिस देना होगा। मोबाइल नंबर लीक होकर अनचाही कॉल आएं, तो भी शिकायत का रास्ता खुला है।
कानून लागू कराने के लिए डेटा संरक्षण बोर्ड बनाया गया है। नियम तोड़ने पर बोर्ड प्रति उल्लंघन 250 करोड़ रुपए तक जुर्माना लगा सकता है। जुर्माना उल्लंघन की गंभीरता के हिसाब से तय होगा। छोटे कारोबार को राहत देने के लिए अलग-अलग स्तर रखे गए हैं। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।
डीएनपीए की याचिका में पांच मुख्य चिंताएं उठाई गई हैं। पहली चिंता सहमति के नियम से जुड़ी है।
याचिका के मुताबिक पत्रकार को किसी व्यक्ति का डेटा जुटाने से पहले सहमति लेनी पड़ सकती है। किसी घोटाले की पड़ताल से पहले आरोपी से ही इजाजत मांगनी होगी। प्रकाशकों का कहना है कि तब आरोपी सबूत मिटा सकता है और गवाहों को डरा सकता है।
कानून लोगों को कभी भी सहमति वापस लेने और डेटा हटवाने का हक देता है। याचिका के मुताबिक इसमें जनहित के लिए कोई छूट नहीं है। ऐसे में मीडिया हाउस को छपी हुई तथ्यात्मक खबरें हटाने या बदलने पर मजबूर किया जा सकता है।
कानून की धारा 36 केंद्र सरकार को किसी भी डेटा संस्था से जानकारी मांगने की शक्ति देती है। डीएनपीए का मानना है कि इसके जरिए न्यूजरूम से स्रोतों की जानकारी मांगी जा सकती है। व्हिसलब्लोअर (भ्रष्टाचार की जानकारी देने वाले लोग) तब सामने आने से डरेंगे।
यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर के डेटा कानूनों में पत्रकारों के लिए साफ छूट है। भारत के कानून में ऐसा कोई लिखित प्रावधान नहीं है। याचिका के मुताबिक, सरकार ने अगस्त में मौखिक आश्वासन दिया था। प्रकाशकों का कहना है कि लिखित प्रावधान के बिना अनिश्चितता बनी हुई है।
केंद्रीय प्राधिकरण को भारी जुर्माना लगाने का अधिकार है। वह जनहित के नाम पर किसी जानकारी तक पहुंच ब्लॉक भी कर सकता है। डीएनपीए ने इसे अप्रत्यक्ष पूर्व-सेंसरशिप (छपने से पहले रोक) बताया है।
रोजमर्रा की रिपोर्टिंग में भी नाम, पद, संपत्ति और फोन रिकॉर्ड जैसे निजी डेटा आते हैं। किसी अफसर की बेनामी संपत्ति की खबर इसका उदाहरण है। सहमति का नियम लागू हुआ तो ऐसी पड़ताल शुरू होने से पहले रुक सकती है।
छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों पर असर और बड़ा होगा। 250 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का डर ही खबर रोकने के लिए काफी हो सकता है। Press Freedom India की बहस का असली केंद्र यही डर है।
इसके दो पहलू हैं। पहला पहलू राहत का है। ऐप, बैंक और ऑनलाइन कंपनियां अब आपके डेटा का मनमाना इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी। डेटा लीक होने पर आपको सूचना मिलेगी और शिकायत का मंच भी होगा।
दूसरा पहलू चिंता का है। कानून की धारा 44 (3) ने सूचना के अधिकार कानून (RTI - Right to Information) में बदलाव किया है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक इससे निजी जानकारी देने में जनहित वाली छूट खत्म हो गई।
यानी अफसरों और नेताओं से जुड़ी कई जानकारियां आम आदमी तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। खबरें कम होंगी, तो जवाबदेही भी कमजोर होगी। आखिर बिना पड़ताल के घोटाले कैसे सामने आएंगे?
यह कानून पहले से सुप्रीम कोर्ट के सामने है। फरवरी 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने तीन याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस दिया था। ये याचिकाएं वेंकटेश नायक, एनसीपीआरआई और द रिपोर्टर्स कलेक्टिव और पत्रकार नितिन सेठी ने लगाई थीं। अदालत ने मामला बड़ी बेंच को भेजा, लेकिन कानून पर रोक नहीं लगाई।
मार्च 2026 में पत्रकार गीता शेषु और एसएफएलसी डॉट इन की याचिका पर भी नोटिस जारी हुआ। उसमें धारा 17 के तहत सरकारी एजेंसियों को छूट और डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। अब DPDP Act Supreme Court में किस दिशा जाएगा, इस पर देशभर की नजर है।
Data Protection Act India आने वाले सालों में हर नागरिक की डिजिटल जिंदगी तय करेगा। इसलिए फैसला सिर्फ मीडिया का नहीं, आपका भी है।
संविधान का अनुच्छेद 21 निजता को मौलिक अधिकार मानता है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(क) बोलने और प्रेस की आजादी देता है। डेटा प्रोटेक्शन एक्ट इन दोनों अधिकारों के बीच खड़ा है। एक तरफ आम आदमी के निजी डेटा की सुरक्षा है। दूसरी तरफ सत्ता से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि लोकतंत्र में निजता और जवाबदेही साथ कैसे चलें।
FAQs:
याचिका में कौन-कौन शामिल
द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम भी साथ हैं। इतने बड़े मीडिया समूहों का एक साथ अदालत जाना आम बात नहीं है। DNPA petition का केंद्र एक ही सवाल है। क्या निजता के नाम पर प्रेस की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है?
डीपीडीपी कानून क्या है?
नियम 12 से 18 महीने में चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहे हैं। यह डेटा प्राइवेसी कानून आपके ऑनलाइन निजी डेटा की सुरक्षा के लिए है। नाम, मोबाइल नंबर, पता और ऑनलाइन गतिविधि जैसी जानकारी इसमें आती है।
डेटा इकट्ठा करने वाली कंपनी या संस्था को "डेटा फिड्यूशरी" (डेटा का जिम्मेदार संरक्षक) कहा गया है। जिसका डेटा है, उसे "डेटा प्रिंसिपल" (डेटा का मालिक) कहा गया है।
आम आदमी को निजी डेटा का अधिकार
नियमों के मुताबिक डेटा लीक होने पर प्रभावित व्यक्ति को बिना देरी सूचना देनी होगी। कानूनी जरूरत न हो तो निजी डेटा एक साल से ज्यादा नहीं रखा जा सकेगा। डेटा मिटाने से पहले 48 घंटे का नोटिस देना होगा। मोबाइल नंबर लीक होकर अनचाही कॉल आएं, तो भी शिकायत का रास्ता खुला है।
डेटा संरक्षण बोर्ड और 250 करोड़ जुर्माना
खोजी पत्रकारिता पर 5 बड़े सवाल
क्या आरोपी से सहमति लेकर होगी जांच?
छपी खबर हटाने का बढ़ेगा दबाव
गोपनीय स्रोत और व्हिसलब्लोअर पर खतरा
यूरोप-ब्रिटेन में छूट, भारत में नहीं
भारी जुर्माना और पूर्व-सेंसरशिप का आरोप
पत्रकारिता पर सीधा असर क्या?
छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों पर असर और बड़ा होगा। 250 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का डर ही खबर रोकने के लिए काफी हो सकता है। Press Freedom India की बहस का असली केंद्र यही डर है।
आम आदमी पर क्या फर्क पड़ेगा?
दूसरा पहलू चिंता का है। कानून की धारा 44 (3) ने सूचना के अधिकार कानून (RTI - Right to Information) में बदलाव किया है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक इससे निजी जानकारी देने में जनहित वाली छूट खत्म हो गई।
यानी अफसरों और नेताओं से जुड़ी कई जानकारियां आम आदमी तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। खबरें कम होंगी, तो जवाबदेही भी कमजोर होगी। आखिर बिना पड़ताल के घोटाले कैसे सामने आएंगे?
सुप्रीम कोर्ट में पहले से सुनवाई
सुनवाई में स्टे से इनकार
"स्टे का कोई सवाल ही नहीं।"
By: - सूर्यकांत, मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट (फरवरी 2026 की सुनवाई में)
Data Protection Act India आने वाले सालों में हर नागरिक की डिजिटल जिंदगी तय करेगा। इसलिए फैसला सिर्फ मीडिया का नहीं, आपका भी है।
यह खबर क्यों जरूरी है
FAQs:
- डीपीडीपी कानून क्या है?
डीपीडीपी कानून यानी डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून, जो लोगों के ऑनलाइन निजी डेटा की सुरक्षा के लिए बना है। संसद ने इसे अगस्त 2023 में पास किया। इसके नियम नवंबर 2025 में जारी हुए और चरणों में लागू हो रहे हैं। - मीडिया हाउस इस कानून का विरोध क्यों कर रहे हैं?
प्रकाशकों का कहना है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता को कमजोर करेगा। उनके मुताबिक इसमें पत्रकारों के लिए लिखित छूट नहीं है। सहमति का नियम और डेटा हटाने का अधिकार खबरों पर दबाव बना सकता है। - इस कानून से आम आदमी को क्या फायदा है?
आम आदमी अपने डेटा की जानकारी ले सकता है, उसे सुधरवा और हटवा सकता है। डेटा लीक होने पर उसे सूचना मिलेगी। नियम तोड़ने वाली संस्था पर 250 करोड़ रुपए तक जुर्माना लग सकता है।
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