बालों की चाह में जान से खेल.... हेयर ट्रांसप्लांट पर सरकार की सख्ती

Rajesh Lahoti | Aug 21, 2026, 18:36 IST
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हेयर ट्रांसप्लांट पर सरकार की सख्ती
हेयर ट्रांसप्लांट पर सरकार की सख्ती

हेयर ट्रांसप्लांट के नाम पर चल रहे अनधिकृत सैलून-क्लिनिक और बिना योग्य डॉक्टरों के इलाज पर सरकार सख्ती की तैयारी में है। नियमों का उद्देश्य मरीजों को संक्रमण, एनेस्थीसिया की जटिलताओं और सर्जिकल लापरवाही से बचाना है।

सिर पर गिरते बाल और घटती घनी जुल्फें आज केवल सौंदर्य या सुंदरता का प्रश्न नहीं रह गई हैं, बल्कि यह आधुनिक समाज में व्यक्ति के आत्म-सम्मान, उसकी पेशेवर पहचान और विशेषकर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ चुकी हैं। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव और सुंदर दिखने की तीव्र चाहत का फायदा उठाकर देश भर के मेट्रो शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक सैलून-क्लिनिक का एक ऐसा अनियंत्रित कारोबार खड़ा हो गया है, जो चिकित्सा विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों को ठेंगे पर रखकर लोगों की जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहा है।

ब्यूटी पार्लरों, नाई की दुकानों और दो कमरों के तंग बेसमेंट में चल रहे इन तथाकथित हेयर रिस्टोरेशन सेंटरों में बिना किसी मेडिकल डिग्री के सिर्फ कुछ हफ्तों की अनधिकृत ट्रेनिंग लिए हुए तकनीशियन और नौसिखिए लोग जटिल सर्जिकल प्रक्रियाएं अंजाम दे रहे हैं। अब इस अनियंत्रित और जानलेवा ब्यूटी इंडस्ट्री पर भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय बड़ा प्रहार करने जा रहा है।

स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय यानी DGHS के अंतर्गत गठित एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति ने हेयर ग्राफ्टिंग और ट्रांसप्लांटेशन प्रक्रिया को लेकर बेहद कड़े और पारदर्शी दिशानिर्देश अंतिम रूप से तैयार कर लिए हैं। इस नीतिगत ढांचे का मुख्य उद्देश्य सैलून शैली के इन खतरनाक क्लिनिकों पर स्थायी ताला लगाना और मरीज की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखना है।

कड़े नियमों की जरूरत और हालिया घटनाएं

स्वास्थ्य मंत्रालय को यह कड़ा रुख इसलिए अपनाना पड़ा है क्योंकि हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से अनधिकृत क्लिनिकों द्वारा किए गए गलत हेयर ट्रांसप्लांट की वजह से गंभीर संक्रमण, शारीरिक अपंगता और मौतों की भयावह खबरें सामने आई हैं। मई 2025 में उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक गैरमानक और अनधिकृत क्लिनिक में सर्जरी कराने के बाद दो युवाओं में गंभीर पोस्ट ऑपरेटिव इंफेक्शन और मस्तिष्क में सूजन यानी ब्रेन स्वेलिंग विकसित हुई, जिससे कुछ ही दिनों के भीतर उनकी दर्दनाक मौत हो गई।

इससे पहले मार्च 2019 में मुंबई में एक बेहद दर्दनाक मामला सामने आया था, जहां ट्रांसप्लांट के दौरान एनेस्थीसिया के गलत इस्तेमाल से मरीज को एनाफिलेक्टिक शॉक लगा और पर्याप्त आपातकालीन व्यवस्था न होने के कारण मरीज की जान पर बन आई। इसी तरह नवंबर 2021 में राजधानी दिल्ली में एक व्यक्ति की सर्जरी के दौरान सेप्सिस और मल्टीऑर्गन फेलियर के कारण मृत्यु हो गई थी।

जांच में पाया गया कि यह सर्जरी बिना किसी प्रशिक्षित एनेस्थेटिस्ट और बिना स्टरलाइजेशन के एक छोटे से कमरे में की गई थी। इन लगातार होती दुर्घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि सौंदर्य निखारने की आड़ में बिना नियमों के चल रही ये दुकानें असल में मौत के कुएं बन चुकी हैं, जिन पर तत्काल प्रशासनिक व कानूनी नकेल कसना अनिवार्य हो गया था।

नए रेगुलेटरी गाइडलाइंस और कड़े मानक

DGHS द्वारा तैयार किए गए नए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में स्पष्ट कर दिया गया है कि हेयर ट्रांसप्लांट को अब केवल एक सतही कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे एक पूर्ण जटिल सर्जिकल प्रक्रिया का दर्जा दिया जाएगा। नए नियमों के तहत अब कोई भी सामान्य तकनीशियन या बी-ग्रेड मेडिकल प्रैक्टिशनर स्वतंत्र रूप से हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी नहीं कर पाएगा।

सर्जरी करने वाले मुख्य चिकित्सक के पास प्लास्टिक सर्जरी में MCh या DNB, डर्मेटोलॉजी में MD या DNB, ईएनटी (ENT), या फिर जनरल सर्जरी में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री अथवा ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी में MDS या BDS होना अनिवार्य किया गया है। केवल डिग्री होना ही काफी नहीं होगा, बल्कि डॉक्टर को किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से कम से कम 1 वर्ष का ट्राइकोलॉजी व हेयर ट्रांसप्लांटेशन सर्जरी का गहन व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्राप्त होना आवश्यक होगा।

इसके अतिरिक्त, क्लिनिक के स्टाफ स्ट्रक्चर में भी बड़ा बदलाव किया गया है। अब हर रजिस्टर्ड क्लिनिक में हर समय कम से कम एक फुल-टाइम क्वालिफाइड डॉक्टर, एक प्रशिक्षित नर्स और एक ओटी टेक्नीशियन का उपस्थित होना कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा, साथ ही किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए एक ऑनकॉल बैकअप एनेस्थेटिस्ट का होना अनिवार्य कर दिया गया है।

सर्जिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और दंडात्मक प्रावधान

अक्सर देखा गया है कि सैलून और छोटे सेंटरों में न तो हवा की शुद्धता का ध्यान रखा जाता है और न ही सर्जिकल औजारों के स्टरलाइजेशन की कोई पुख्ता व्यवस्था होती है। नए दिशानिर्देशों के लागू होने के बाद किसी भी साधारण कमरे या ब्यूटी पार्लर में ट्रांसप्लांट की अनुमति नहीं होगी।

क्लिनिक के पास पूर्ण डे-केयर सर्जिकल सेटअप, समर्पित और पूरी तरह स्टरलाइज़्ड ऑपरेशन थिएटर, रीससिटेशन किट, डिफिब्रिलेटर, निरंतर ऑक्सीजन सप्लाई और आपातकालीन दवाओं से लैस क्रैश कार्ट तथा इंटुबेशन उपकरण होना अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा, मरीजों के वित्तीय शोषण को रोकने के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण का नियम बनाया गया है, जिसके तहत पैकेज के नाम पर हिडन चार्ज वसूलने या सोशल मीडिया पर भ्रामक विज्ञापनों से मरीजों को लुभाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।

प्रक्रिया का कुल खर्च, ग्राफ्ट्स की संभावित संख्या और सर्जरी से जुड़े सभी जोखिमों की जानकारी मरीज को लिखित में देनी होगी। इन सख्त नियमों का उल्लंघन करने वाले क्लिनिक संचालकों पर 5 लाख तक का भारी नकद जुर्माना लगाया जाएगा। इतना ही नहीं, बिना लाइसेंस काम करने वाले या गंभीर लापरवाही बरतने वाले संचालकों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और उपभोक्ता संरक्षण कानून की संगीन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाएगा।

बाजार का भारी दबाव और युवाओं में बढ़ता क्रेज

हेयर ट्रांसप्लांट के इस अनियंत्रित बाजार के पीछे एक विशाल आर्थिक गणित और सामाजिक दबाव भी काम कर रहा है। आईएमएआरसी (IMARC) ग्रुप के शोध अनुमानों के अनुसार, भारत में हेयर ट्रांसप्लांट का बाजार 307 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,500 करोड़ रुपए से अधिक का विशाल आकार ले चुका है और यह सालाना तेज रफ्तार से बढ़ रहा है।

आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता तनाव, असंतुलित खान-पान, जल प्रदूषण और आनुवंशिक कारणों से युवाओं में बेहद कम उम्र यानी 20 से 30 वर्ष के बीच ही बाल झड़ने की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है।

मुंबई स्थित यावना स्किन एंड हेयर क्लिनिक की संस्थापिका डॉ. मधुरी अग्रवाल का कहना है कि 20 से 30 वर्ष के युवाओं में असमय बाल झड़ने की समस्या बहुत अधिक देखी जा रही है और मांग में आई इस एकाएक तेजी के कारण सैलून की तर्ज पर अनगिनत सेंटर गली-कूचों में खुल गए हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें से अधिकांश सेंटर बिना किसी योग्य डॉक्टर के, केवल तकनीशियनों के भरोसे चलाए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा और जीवन से खिलवाड़ है। सस्ते दामों पर बाल उगाने का लालच देकर ये सैलून सोशल मीडिया पर फर्जी तस्वीरें और वीडियो दिखाकर युवाओं को अपने जाल में फंसाते हैं।

चिकित्सीय खतरे और विशेषज्ञों की चेतावनी

चिकित्सा विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि हेयर ट्रांसप्लांट एक जटिल जैविक प्रक्रिया है जिसमें सिर के पिछले हिस्से से जीवित हेयर फॉलिकल्स यानी ग्राफ्ट्स को निकालकर गंजेपन वाले हिस्से में रोपा जाता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स (AIIMS) नई दिल्ली के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मनीष सिंघल ने इस बात पर जोर दिया है कि बिना डॉक्टरी देखरेख और अनुभवहीन हाथों से कराई गई सर्जरी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

गैर प्रशिक्षित तकनीशियन जब अनाड़ी हाथों से ग्राफ्ट निकालते हैं, तो डोनर एरिया की त्वचा हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त हो जाती है और स्थायी स्कारिंग बन जाती है। इससे मरीज के प्राकृतिक बाल भी हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। इसके अलावा, अस्वच्छ औजारों के इस्तेमाल से होने वाला बैक्टीरियल इंफेक्शन बहुत तेजी से खून में फैलकर सेप्सिस का रूप ले लेता है, जो इंसान के मल्टी ऑर्गन फेलियर का कारण बनता है।

एनेस्थीसिया का गलत डोज भी उतना ही खतरनाक है। लोकल एनेस्थीसिया की अधिक मात्रा दिए जाने से मरीज को अचानक कार्डियक अरेस्ट, ब्लड प्रेशर में जानलेवा गिरावट या गंभीर एलर्जी यानी एनाफिलेक्सिस हो सकता है, जिसे केवल एक प्रशिक्षित एनेस्थेटिस्ट ही संभाल सकता है।

कानूनी व उद्योग जगत का नजरिया

कानूनी और हेल्थकेयर उद्योग के विशेषज्ञ सरकार के इस कदम को समय की मांग बता रहे हैं, लेकिन साथ ही इसके सख्त क्रियान्वयन को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। देश के जाने माने वकीलों का मानना है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुपालन और नियमों का पालन सीधे भारत के संविधान द्वारा दिए गए जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है।

चूंकि चिकित्सा लापरवाही के कानूनी मामले बेहद जटिल और लंबे चलने वाले होते हैं, इसलिए नए नियमों का प्रवर्तन केवल कागजों पर न रहकर जमीनी स्तर पर नियमित पुलिस और स्वास्थ्य अधिकारियों की छापेमारी व निगरानी के साथ होना चाहिए। दूसरी ओर यूजीनिक्स हेयर साइंसेज की सह-संस्थापक डॉ. एरिका बंसल ने इस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पूरे उद्योग में इलाज का मानक बहुत ऊंचा उठेगा और पारदर्शी माहौल बनेगा।

अब क्लिनिक को वास्तविक सर्जिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और योग्य डॉक्टरों की टीम पर निवेश करना ही होगा, जिससे मरीजों को झूठे विज्ञापनों और लुभावने दावों से हटकर क्लिनिक की वास्तविक गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्था को आंकने का एक प्रामाणिक आधार मिल सकेगा।

निष्कर्ष और जन-जागरूकता का संदेश

स्वास्थ्य मंत्रालय और DGHS द्वारा उठाए गए ये नीतिगत कदम भारतीय कॉस्मेटिक सर्जरी और डर्मेटोलॉजी के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत हैं। हालांकि, केवल कानून और सरकारी नकेल से ही इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। इसके लिए आम जनता, विशेषकर युवाओं में भी जागरूकता का होना बेहद जरूरी है।

समाज को यह समझना होगा कि बाल रोपण की प्रक्रिया कोई सैलून में कराया जाने वाला फेशियल, थ्रेडिंग या हेयर स्पॉ नहीं है, बल्कि यह एक वास्तविक सर्जिकल प्रोसीजर है जिसमें शरीर की त्वचा और रक्त सीधे शामिल होते हैं। किसी भी क्लिनिक में जाने से पहले डॉक्टर की मेडिकल डिग्री, उनका अनुभव, क्लिनिक का सर्जिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और आपातकालीन सुविधाओं की खुद जांच परख करना हर मरीज का पहला काम होना चाहिए।

जब मरीज स्वयं जागरूक होंगे और केवल मान्यता प्राप्त विशेषज्ञों का चुनाव करेंगे, तभी इन अवैध सैलून-क्लिनिक जैसी दुकानों पर पूर्ण विराम लग सकेगा। सरकार के ये नए नियम न केवल धोखाधड़ी करने वाले सेंटरों को बंद करेंगे, बल्कि भारत के मेडिकल टूरिज्म और कॉस्मेटिक हेल्थकेयर को अंतरराष्ट्रीय स्तर की विश्वसनीयता, सुरक्षा और सम्मान भी प्रदान करेंगे।

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