क्यों लड़ रहीं दीदी अपने जीवन की सबसे बड़ी जंग, जानिए क्या होने जा रहा है बंगाल चुनाव में
Jinesh Jain | Apr 23, 2026, 16:22 IST
Photograph: (the sootr)
पश्चिम बंगाल की फिजाओं में नई हलचल है। यह बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा पावर गेम है। यहां सत्ता के शिखर की लड़ाई केवल बैलेट तक सीमित नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार के आरोपों, केंद्रीय एजेंसियों की छापेमारी और चुनाव आयोग की सख्ती के बीच शतरंज की बिसात बन चुकी है
पहले चरण में गुरुवार को पश्चिम बंगाल के 16 जिलों की 152 विधानसभा सीटों पर मतदान हो रहा है। यह महज वोटिंग नहीं, बल्कि जनादेश का वह लिटमस टेस्ट है, जो पूरे राज्य का मिजाज तय करेगा। उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग और कूचबिहार से लेकर जंगलमहल के झाड़ग्राम और पुरुलिया तक हर बूथ पर एक ही सवाल है-क्या ममता का जादू फिर चलेगा या मोदी-शाह की जोड़ी इतिहास रचेगी?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता के सिंहासन पर बैठने का सपना देख रही हैं। इस बार का उनका रास्ता फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों भरी डगर है। 15 साल का शासन कम नहीं होता। इतने लंबे समय के बाद सत्ता विरोधी लहर या एंटी-इंकंबेंसी का उठना स्वाभाविक है। लेकिन इस बार चुनौती दोहरी है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी है। स्कूल भर्ती घोटाला, राशन और कोयला कांड तथा दिग्गजों की गिरफ्तारी से टीएमसी की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है।
भ्रष्टाचार के आरोपों में मंत्री सलाखों के पीछे। सरकारी योजनाओं में सेंधमारी के आरोपों ने पार्टी को काफी गहरे जख्म दिए हैं। पार्थ चटर्जी, ज्योतिप्रिय मल्लिक और अनुब्रत मंडल जैसे कद्दावर नेताओं का जेल में होना टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे के लिए एक बड़ा झटका है।
पश्चिम बंगाल चुनाव की घोषणा के साथ ही केंद्रीय एजेंसियों सीबीआई, ईडी और एनआईए की सक्रियता बढ़ गई है। टीएमसी के कई उम्मीदवार जैसे सुजीत बोस और रथिन घोष एजेंसियों के निशाने पर हैं।
ममता बनर्जी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा, वे मेरे सुरक्षा घेरे तक पहुंच गए हैं। क्या वे मुझे मारना चाहते हैं? दीदी का यह बयान सहानुभूति की लहर पैदा करने की एक कोशिश है, जहां वे खुद को एक 'अकेली योद्धा' के रूप में पेश कर रही हैं जो दिल्ली की ताकत से लड़ रही है।
इस चुनाव का सबसे विवादास्पद अध्याय है-मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)
चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों से करीब 27 लाख नाम हटा दिए हैं। टीएमसी का तर्क है कि यह वास्तविक मतदाताओं को बाहर निकालने की बीजेपी की साजिश है।
इसके उलट भाजपा का कहना है कि ये फर्जी वोटर थे, जिनके दम पर टीएमसी सत्ता में बनी रही। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। टीएमसी को उम्मीद है कि जिन परिवारों के नाम कटे हैं, उनका गुस्सा बीजेपी पर जरूरत गिरेगा।
चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों के साथ ही पश्चिम बंगाल के प्रशासन की तस्वीर बदल दी। मुख्य सचिव से लेकर डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर तक को हटा दिया गया। 500 से अधिक अधिकारियों के तबादले ने ममता को यह कहने का मौका दे दिया कि बंगाल को केंद्र के कंट्रोल में लेने की कोशिश हो रही है।
बंगाल में 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो पारंपरिक रूप से ममता बनर्जी का मजबूत किला रही है। लेकिन, इस बार इस किले में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस, आईएसएफ और एआईएमआईएम जैसे दल मैदान में हैं।
दूसरी तरफ, बीजेपी का गणित सीधा है। वे जानते हैं कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे, इसलिए उनकी पूरी ताकत हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर है। बीजेपी नेताओं का मानना है कि अगर वे हिंदू वोटों का बड़ा हिस्सा हासिल कर लेते हैं तो 148 के जादुई आंकड़े (बहुमत) तक पहुंचना संभव है।
सबसे दिलचस्प मुकाबला ममता बनर्जी की अपनी सीट भवानीपुर में है। यहां भाजपा ने उनके पुराने सिपहसालार और अब कट्टर दुश्मन शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है।
भवानीपुर में 51,000 वोट कट गए हैं, जो ममता की जीत के अंतर (करीब 58,000) के बहुत करीब है। पहली बार ममता बनर्जी को अपने ही क्षेत्र में घर-घर जाकर प्रचार करने की योजना बनानी पड़ रही है। यह दिखाता है कि लड़ाई कितनी कांटे की है।
2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर सबको चौंकाया था। हालांकि 2021 में ममता ने शानदार वापसी की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी 29 सीटों के साथ हावी रही।
लेकिन विधानसभा चुनाव का मिजाज अलग होता है। यहां लड़ाई स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार और बंगाली अस्मिता के बीच है। एक तरफ बीजेपी का सोनार बांग्ला का नारा है तो दूसरी तरफ ममता की 'लक्ष्मी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाएं।
बंगाल की जनता खामोश है, लेकिन उनके मन में बहुत कुछ चल रहा है। क्या ममता दीदी अपनी साख बचा पाएंगी? या बीजेपी बंगाल के राजनीतिक भूगोल को हमेशा के लिए बदल देगी?
जवाब उन मतपेटियों में बंद हो रहा है, जो 16 जिलों के 152 निर्वाचन क्षेत्रों में रखी गई हैं। अगला पड़ाव 29 अप्रैल को भवानीपुर की जंग होगी, जो तय करेगी कि बंगाल की कमान किसके हाथ में रहेगी।
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एंटी-इंकंबेंसी और भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह
तृणमूल कांग्रेस (TMC) भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी है। स्कूल भर्ती घोटाला, राशन और कोयला कांड तथा दिग्गजों की गिरफ्तारी से टीएमसी की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है।
भ्रष्टाचार के आरोपों में मंत्री सलाखों के पीछे। सरकारी योजनाओं में सेंधमारी के आरोपों ने पार्टी को काफी गहरे जख्म दिए हैं। पार्थ चटर्जी, ज्योतिप्रिय मल्लिक और अनुब्रत मंडल जैसे कद्दावर नेताओं का जेल में होना टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे के लिए एक बड़ा झटका है।
एजेंसियों का हॉट रडार
ममता बनर्जी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा, वे मेरे सुरक्षा घेरे तक पहुंच गए हैं। क्या वे मुझे मारना चाहते हैं? दीदी का यह बयान सहानुभूति की लहर पैदा करने की एक कोशिश है, जहां वे खुद को एक 'अकेली योद्धा' के रूप में पेश कर रही हैं जो दिल्ली की ताकत से लड़ रही है।
सफाई या साजिश, वोटर लिस्ट का विवाद
चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों से करीब 27 लाख नाम हटा दिए हैं। टीएमसी का तर्क है कि यह वास्तविक मतदाताओं को बाहर निकालने की बीजेपी की साजिश है।
इसके उलट भाजपा का कहना है कि ये फर्जी वोटर थे, जिनके दम पर टीएमसी सत्ता में बनी रही। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। टीएमसी को उम्मीद है कि जिन परिवारों के नाम कटे हैं, उनका गुस्सा बीजेपी पर जरूरत गिरेगा।
दीदी बनाम चुनाव आयोग
ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोट बैंक का गणित
दूसरी तरफ, बीजेपी का गणित सीधा है। वे जानते हैं कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे, इसलिए उनकी पूरी ताकत हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर है। बीजेपी नेताओं का मानना है कि अगर वे हिंदू वोटों का बड़ा हिस्सा हासिल कर लेते हैं तो 148 के जादुई आंकड़े (बहुमत) तक पहुंचना संभव है।
दीदी के अपने घर में जंग
भवानीपुर में 51,000 वोट कट गए हैं, जो ममता की जीत के अंतर (करीब 58,000) के बहुत करीब है। पहली बार ममता बनर्जी को अपने ही क्षेत्र में घर-घर जाकर प्रचार करने की योजना बनानी पड़ रही है। यह दिखाता है कि लड़ाई कितनी कांटे की है।
क्या कहती है बंगाल की हवा?
लेकिन विधानसभा चुनाव का मिजाज अलग होता है। यहां लड़ाई स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार और बंगाली अस्मिता के बीच है। एक तरफ बीजेपी का सोनार बांग्ला का नारा है तो दूसरी तरफ ममता की 'लक्ष्मी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाएं।
बंगाल की जनता खामोश है, लेकिन उनके मन में बहुत कुछ चल रहा है। क्या ममता दीदी अपनी साख बचा पाएंगी? या बीजेपी बंगाल के राजनीतिक भूगोल को हमेशा के लिए बदल देगी?
जवाब उन मतपेटियों में बंद हो रहा है, जो 16 जिलों के 152 निर्वाचन क्षेत्रों में रखी गई हैं। अगला पड़ाव 29 अप्रैल को भवानीपुर की जंग होगी, जो तय करेगी कि बंगाल की कमान किसके हाथ में रहेगी।
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