8 जनवरी का इतिहास: डायरेक्टर बिमल रॉय जिन्होंने बदल दी भारतीय सिनेमा की दिशा
Kaushiki | Jan 08, 2026, 08:00 IST
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आठ जनवरी 1966 को फिल्म डायरेक्टर बिमल रॉय का निधन हुआ। उन्होंने अपनी फिल्मों से भारतीय सिनेमा में यथार्थवाद की नई शुरुआत की थी। आइए जानें उनके फिल्मी सफर के बारे में...
आज के दिन की कहानी: आज की तारीख भारतीय सिनेमा के लिए बहुत इमोशनल कर देने वाली है। 8 जनवरी 1966 को हमने बिमल रॉय जैसा फिल्म डॉयरेक्टर को खोया था।
बिमल दा एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने फिल्मों को महज मनोरंजन नहीं माना। उन्होंने सिनेमा को समाज का आईना बनाया और आम आदमी की तकलीफ दिखाई।
बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को पूर्वी बंगाल के ढाका में हुआ। वे एक जमींदार परिवार से थे लेकिन उनकी सोच हमेशा गरीबों के लिए थी। उन्होंने कोलकाता के न्यू थिएटर्स से बतौर कैमरामैन अपना फिल्मी करियर शुरू किया। आइए जानें उनके फिल्मी सफर के बारे में...
![आखिर कौन थे बिमल रॉय... जिनके साथ मधुबाला भी करना चाहती थी काम, जमींदार के बेटे ने भारतीय फिल्मों को विश्वभर में दिलाई थी पहचान - bimal roy bollywood ...]()
बिमल रॉय के पिता की मौत के बाद उनके परिवार को बहुत दुख झेलना पड़ा। जमींदारी छिन जाने के बाद उन्हें अपनी मां और भाइयों के साथ कोलकाता आना पड़ा। यहां उन्होंने फोटोग्राफी सीखी। धीरे-धीरे फिल्मों की दुनिया में कदम रख दिया।
बिमल दा की खासियत थी कि वे बिना शोर-शराबे के बेहतरीन काम करते थे। उनकी फिल्मों में सादगी और गहराई एक साथ देखने को मिलती थी। वे अक्सर कहते थे कि फिल्म वही अच्छी जो दिल को छू जाए।
![Bimal Roy's unique approach - The Statesman]()
बिमल रॉय को भारतीय सिनेमा में 'रियलिस्टिक सिनेमा' का जनक माना जाता है। उन्होंने इटैलियन फिल्म 'साइकिल थीव्स' से प्रेरित होकर 'दो बीघा जमीन' बनाई। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा की दिशा और दशा पूरी तरह बदल दी।
उन्होंने बंदिनी और सुजाता जैसी फिल्मों से महिला एम्पावरमेंट की बात की। उनके कैमरे का एंगल और लाइट का इस्तेमाल आज भी मिसाल है। बिमल दा ने ऋषिकेश मुखर्जी और गुलजEर जैसे महान दिग्गजों को तराशा।
![BIMAL ROY]()
ये फिल्म सिर्फ एक मूवी नहीं, बल्कि एक गरीब किसान 'शंभू' (बलराज साहनी) के इमोशन्स का सैलाब थी। कहानी एक ऐसे किसान की है जिसकी अपनी दो बीघा जमीन बचाने के लिए जमींदार से जंग छिड़ जाती है। वो पैसे कमाने के लिए कोलकाता आता है और रिक्शा चलाने लगता है।
फिल्म का रियलिज्म इतना जबरदस्त था कि लोगों को लगा ही नहीं कि वे कोई फिल्म देख रहे हैं। इस फिल्म ने बिमल दा को 'इंटरनेशनल लेवल' पर सुपरस्टार डॉयरेक्टर बना दिया। इसे कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes) में सम्मान मिला।
इसने पहला फिल्मफेयर बेस्ट मूवी अवॉर्ड भी जीता। आज भी जब क्लासिक सिनेमा की बात होती है, तो 'दो बीघा जमीन' का नाम लिस्ट में टॉप पर रहता है। मन्ना डे का गाना धरती कहे पुकार के आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।
![Bimal Roy's 'Do Bigha Zamin' restoration journey described as 'epic' by preservationist - The Statesman]()
बिमल रॉय को फिल्मफेयर अवॉर्ड्स का राजा कहना गलत नहीं होगा। उन्होंने अपने करियर में कुल 11 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स अपने नाम किए थे। उन्हें बेस्ट डॉयरेक्टर के लिए सात बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया।
उनकी फिल्मों को कान फिल्म फेस्टिवल जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहा गया। 'दो बीघा जमीन' के लिए उन्हें इंटरनेशनल अवॉर्ड भी मिला था। भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। आज भी फिल्म मेकिंग सीखने वाले छात्र उनकी फिल्मों को सिलेबस मानते हैं। आज की तारीख का इतिहास | आज की यादगार घटनाएं
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बिमल दा एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने फिल्मों को महज मनोरंजन नहीं माना। उन्होंने सिनेमा को समाज का आईना बनाया और आम आदमी की तकलीफ दिखाई।
बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को पूर्वी बंगाल के ढाका में हुआ। वे एक जमींदार परिवार से थे लेकिन उनकी सोच हमेशा गरीबों के लिए थी। उन्होंने कोलकाता के न्यू थिएटर्स से बतौर कैमरामैन अपना फिल्मी करियर शुरू किया। आइए जानें उनके फिल्मी सफर के बारे में...
आखिर कौन थे बिमल रॉय... जिनके साथ मधुबाला भी करना चाहती थी काम, जमींदार के बेटे ने भारतीय फिल्मों को विश्वभर में दिलाई थी पहचान - bimal roy bollywood ...
ढाका की गलियों से मायानगरी तक का संघर्ष
बिमल दा की खासियत थी कि वे बिना शोर-शराबे के बेहतरीन काम करते थे। उनकी फिल्मों में सादगी और गहराई एक साथ देखने को मिलती थी। वे अक्सर कहते थे कि फिल्म वही अच्छी जो दिल को छू जाए।
Bimal Roy's unique approach - The Statesman
रीयलिस्टिक सिनेमा के जनक और उनका अनोखा विजन
उन्होंने बंदिनी और सुजाता जैसी फिल्मों से महिला एम्पावरमेंट की बात की। उनके कैमरे का एंगल और लाइट का इस्तेमाल आज भी मिसाल है। बिमल दा ने ऋषिकेश मुखर्जी और गुलजEर जैसे महान दिग्गजों को तराशा।
BIMAL ROY
बिमल रॉय की टॉप 10 बेहतरीन फिल्में
- दो बीघा जमीन (1953): एक गरीब किसान के अपनी जमीन बचाने के संघर्ष की कहानी। इस फिल्म ने पूरी दुनिया में भारतीय सिनेमा का नाम ऊंचा कर दिया।
- देवदास (1955): दिलीप कुमार की इस फिल्म ने ट्रेजेडी का नया पैमाना सेट किया। बिमल रॉय ने इस क्लासिक को एक नई रूह अता की थी।
- बंदिनी (1963): एक महिला कैदी की भावनाओं को पर्दे पर बखूबी दिखाया गया। नूतन की अदाकारी और बिमल दा का निर्देशन लाजवाब था।
- सुजाता (1959): समाज में फैली छुआछूत जैसी बुराई पर एक करारा प्रहार। यह फिल्म आज भी समाज को आइना दिखाने का काम करती है।
- मधुमती (1958): पुनर्जन्म पर आधारित यह फिल्म सस्पेंस और संगीत का संगम थी। दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की जोड़ी ने कमाल कर दिया था।
- यहूदी (1958): रोमन साम्राज्य के समय की एक बेहतरीन ऐतिहासिक प्रेम कहानी। इसमें दिलीप कुमार और सोहराब मोदी की टक्कर देखने लायक थी।
- परख (1960): इंसान के लालच और ईमानदारी की परीक्षा लेती यह एक व्यंग्य फिल्म थी। इसे बिमल रॉय की सबसे प्रयोगधर्मी फिल्मों में गिना जाता है।
- परिणीता (1953): शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित एक बेहद कोमल लव स्टोरी। फिल्म की सादगी दर्शकों के दिल में आज भी बसी है।
- अंजान (1941): इस फिल्म में उन्होंने कैमरामैन के रूप में अपना हुनर दिखाया था। यहीं से उनके डायरेक्शन की मजबूत नींव भी पड़ी थी।
- उदयेर पाथे (1944): बंगाली सिनेमा की वो फिल्म जिसने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। इसने सिनेमा में रियलिज्म की एक नई लहर पैदा कर दी थी।
दो बीघा जमीन: गरीबी और स्वाभिमान की असली दास्तान
फिल्म का रियलिज्म इतना जबरदस्त था कि लोगों को लगा ही नहीं कि वे कोई फिल्म देख रहे हैं। इस फिल्म ने बिमल दा को 'इंटरनेशनल लेवल' पर सुपरस्टार डॉयरेक्टर बना दिया। इसे कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes) में सम्मान मिला।
इसने पहला फिल्मफेयर बेस्ट मूवी अवॉर्ड भी जीता। आज भी जब क्लासिक सिनेमा की बात होती है, तो 'दो बीघा जमीन' का नाम लिस्ट में टॉप पर रहता है। मन्ना डे का गाना धरती कहे पुकार के आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।
Bimal Roy's 'Do Bigha Zamin' restoration journey described as 'epic' by preservationist - The Statesman
अवॉर्ड्स और उपलब्धियों से भरा रहा जीवन का सफर
उनकी फिल्मों को कान फिल्म फेस्टिवल जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहा गया। 'दो बीघा जमीन' के लिए उन्हें इंटरनेशनल अवॉर्ड भी मिला था। भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। आज भी फिल्म मेकिंग सीखने वाले छात्र उनकी फिल्मों को सिलेबस मानते हैं। आज की तारीख का इतिहास | आज की यादगार घटनाएं
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