13 जून का इतिहास: दिल्ली का सुल्तान, जिसने खिलजी क्रांति से बदला भारत का नक्शा
Kaushiki | Jun 13, 2026, 08:00 IST
how khilji dynasty started delhi
साल 1290 में जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया था। इसके साथ ही दिल्ली सल्तनत से गुलाम वंश का राज हमेशा के लिए खत्म हो गया और इतिहास के एक नए सुनहरे पन्ने यानी शक्तिशाली खिलजी वंश की शुरुआत हुई।
Khilji Dynasty History: क्या आप जानते हैं कि आज से सात सौ साल पहले दिल्ली कैसी दिखती थी? उस समय दिल्ली की गद्दी पर बैठना कोई आसान काम नहीं था। हर राजा दूसरे राजा को हटाकर तख्त पर कब्जा करना चाहता था। साल 1290 में भी दिल्ली की सल्तनत में एक ऐसा ही जबरदस्त ड्रामा हुआ था। इस ड्रामे ने भारत का पूरा इतिहास ही बदलकर रख दिया था।
यह कहानी है एक बूढ़े लेकिन बेहद चालाक और बहादुर योद्धा की। उसका नाम था जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी। उसने अपनी समझदारी और ताकत के बल पर दिल्ली की किस्मत बदल दी थी। उस समय दिल्ली पर गुलाम वंश के राजाओं का राज हुआ करता था। लेकिन उनके कमजोर शासकों की वजह से जनता और अमीर लोग काफी परेशान थे।
इसी माहौल का फायदा उठाकर जलालुद्दीन खिलजी ने एक बहुत बड़ा तख्तापलट कर दिया। उसने गुलाम वंश के आखिरी सुल्तान को गद्दी से पूरी तरह हटा दिया। इसके बाद वह खुद दिल्ली का नया सुल्तान बनकर तख्त पर बैठ गया। इस एक घटना ने दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश के शासन का हमेशा के लिए द एंड कर दिया। यहीं से शुरुआत हुई इतिहास के सबसे चर्चित और ताकतवर खिलजी साम्राज्य की।
![दिल्ली सल्तनत - टोन अकादमी]()
इस पूरी ऐतिहासिक घटना को अच्छी तरह समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। दिल्ली पर बहुत सालों से गुलाम वंश का राज चल रहा था। कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश जैसे बड़े राजाओं ने इस वंश को खड़ा किया था। इसके बाद महान महिला शासक रजिया सुल्तान ने भी दिल्ली पर राज किया। फिर बलबन ने इस साम्राज्य को अपनी क्रूरता और कड़े नियमों से संभाला था।
लेकिन बलबन की मौत के बाद उसका पोता कैकुबाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा। कैकुबाद बहुत ही कमजोर, ऐश-पसंद और नासमझ किस्म का राजा साबित हुआ। वह राजपाठ के काम पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता था। इस वजह से दिल्ली के दरबार में गुटबाजी और साजिशें बहुत तेजी से बढ़ने लगीं।
दरबार के बड़े अधिकारी आपस में ही सत्ता के लिए लड़ने लगे थे। चारों तरफ अफरातफरी और अराजकता का माहौल पैदा हो गया था। देश की जनता भी एक मजबूत और अच्छे राजा की तलाश कर रही थी।
![खिलजी वंश का इतिहास, मानचित्र और शासक | Study.com]()
इसी दौर में जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी का नाम सबसे आगे निकलकर आया। जलालुद्दीन असल में खिलजी कबीले का एक बहुत ही अनुभवी सेनापति था। वह काफी बूढ़ा हो चुका था लेकिन उसका दिमाग बहुत तेज था। उसने मंगोलों के खिलाफ कई लड़ाइयों में दिल्ली की रक्षा की थी। इस वजह से सेना के जवान उसकी बहुत इज्जत करते थे।
कमजोर सुल्तान कैकुबाद ने जलालुद्दीन की बहादुरी देखकर उसे अपनी सेना का कमांडर बनाया था। उसे 'आरिज-ए-मुमालिक' का बड़ा पद और 'शाइस्ता खान' की उपाधि मिली थी। जलालुद्दीन ने धीरे-धीरे दरबार के अन्य अधिकारियों को अपने पक्ष में कर लिया।
उसने देखा कि सुल्तान के पास अब कोई ताकत नहीं बची है। जनता भी इस कमजोर सरकार से पूरी तरह तंग आ चुकी है। बस फिर क्या था, जलालुद्दीन ने सत्ता अपने हाथ में लेने का फैसला कर लिया।
![अलाउद्दीन खिलजी- हिंदू धर्म का रक्षक? | सबरंगइंडिया]()
जलालुद्दीन खिलजी के समर्थकों ने सबसे पहले महल के अंदर एक बड़ा ऑपरेशन चलाया। उन्होंने कमजोर सुल्तान कैकुबाद को रास्ते से पूरी तरह हटा दिया। इसके बाद उसके छोटे बेटे क्यूमर्स को कुछ दिनों के लिए राजा बनाया गया। लेकिन असली ताकत तो अब जलालुद्दीन खिलजी के ही हाथों में आ चुकी थी।
आखिरकार जून 1290 में जलालुद्दीन ने खुद को दिल्ली का असली सुल्तान घोषित कर दिया। वह दिल्ली के पास किलोखड़ी के महल में गद्दी पर बैठा। इस पूरी घटना को भारतीय इतिहास में 'खिलजी क्रांति' के नाम से जाना जाता है।
इसके साथ ही गुलाम वंश का लगभग 84 साल पुराना राज खत्म हो गया। इतिहासकार बताते हैं कि यह सिर्फ एक राजा का बदलना नहीं था। यह दिल्ली की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का एक बहुत बड़ा बदलाव था।
![जलालुद्दीन ख़िलजी - विकिपीडिया]()
जलालुद्दीन खिलजी जब सुल्तान बना, तब उसकी उम्र लगभग 70 साल थी। वह स्वभाव से बहुत ही दयालु और शांतिप्रिय राजा माना जाता था। उसने आते ही जनता को टैक्स में काफी बड़ी राहत दी थी। उसने अपने दुश्मनों को भी माफ करने की अनोखी नीति अपनाई थी।
हालांकि कुछ अमीर तुर्क अधिकारी इस नए खिलजी शासन के बिल्कुल खिलाफ थे। वे खिलजी कबीले के लोगों को अपने से छोटा समझते थे। लेकिन जलालुद्दीन ने अपनी सूझबूझ से सभी विद्रोहों को शांत कर दिया। उसने दिल्ली सल्तनत को एक नई मजबूती और स्थिरता प्रदान की।
इसी खिलजी वंश में आगे चलकर अलाउद्दीन खिलजी जैसा खतरनाक राजा भी आया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन को हटाकर गद्दी हासिल की थी। उसने पूरे दक्षिण भारत तक दिल्ली सल्तनत का झंडा फहराया था।
![जलाल उद दीन फ़िरोज़ खिलजी – जीकेटुडे]()
जलालुद्दीन खिलजी का राजा बनना इस बात का सबूत था कि ताकत सिर्फ खानदान से नहीं मिलती। इतिहास में वही राज करता है जिसके पास योग्यता और मजबूत सेना होती है। खिलजी वंश के आने से भारतीय संस्कृति और राजनीति में कई नए बदलाव हुए।
इस वंश के राजाओं ने मंगोलों के बड़े हमलों से भारत को हमेशा बचाकर रखा। उन्होंने व्यापार और बाजार के नियमों में भी बहुत बड़े सुधार किए थे। किलोखड़ी के महल से शुरू हुआ यह सफर पूरे भारत में फैल गया था।
आज भी इतिहास के पन्नों में साल 1290 को एक टर्निंग पॉइंट माना जाता है। गुलाम वंश के अंत ने दिल्ली को एक नया जीवन और नई दिशा दी थी। जलालुद्दीन खिलजी की यह कहानी हमें सिखाती है कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
इस तरह साल 1290 की उस घटना ने देश को एक नया रास्ता दिखाया। गुलाम वंश के अंत ने यह साबित कर दिया कि सत्ता सिर्फ जन्म से नहीं मिलती। जिसके पास ताकत और सही रणनीति होगी, वही दिल्ली का असली सुल्तान बनेगा। यह कहानी आज भी हमें सत्ता के खेल की याद दिलाती है।
आज का इतिहास मेंहर दिन का अपना एक अलग महत्व होता है। 13 जून का दिन भी इतिहास (आज की यादगार घटनाएं) में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है। इस दिन दुनिया में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
आइए जानते हैं 13 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं- हिंदी भाषा सम्मान होल्कर साम्राज्य
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यह कहानी है एक बूढ़े लेकिन बेहद चालाक और बहादुर योद्धा की। उसका नाम था जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी। उसने अपनी समझदारी और ताकत के बल पर दिल्ली की किस्मत बदल दी थी। उस समय दिल्ली पर गुलाम वंश के राजाओं का राज हुआ करता था। लेकिन उनके कमजोर शासकों की वजह से जनता और अमीर लोग काफी परेशान थे।
इसी माहौल का फायदा उठाकर जलालुद्दीन खिलजी ने एक बहुत बड़ा तख्तापलट कर दिया। उसने गुलाम वंश के आखिरी सुल्तान को गद्दी से पूरी तरह हटा दिया। इसके बाद वह खुद दिल्ली का नया सुल्तान बनकर तख्त पर बैठ गया। इस एक घटना ने दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश के शासन का हमेशा के लिए द एंड कर दिया। यहीं से शुरुआत हुई इतिहास के सबसे चर्चित और ताकतवर खिलजी साम्राज्य की।
दिल्ली सल्तनत - टोन अकादमी
दिल्ली सल्तनत के तख्त पर कैसे हुआ बदलाव
लेकिन बलबन की मौत के बाद उसका पोता कैकुबाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा। कैकुबाद बहुत ही कमजोर, ऐश-पसंद और नासमझ किस्म का राजा साबित हुआ। वह राजपाठ के काम पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता था। इस वजह से दिल्ली के दरबार में गुटबाजी और साजिशें बहुत तेजी से बढ़ने लगीं।
दरबार के बड़े अधिकारी आपस में ही सत्ता के लिए लड़ने लगे थे। चारों तरफ अफरातफरी और अराजकता का माहौल पैदा हो गया था। देश की जनता भी एक मजबूत और अच्छे राजा की तलाश कर रही थी।
खिलजी वंश का इतिहास, मानचित्र और शासक | Study.com
खिलजी कौन था और उसने कैसे फायदा उठाया
कमजोर सुल्तान कैकुबाद ने जलालुद्दीन की बहादुरी देखकर उसे अपनी सेना का कमांडर बनाया था। उसे 'आरिज-ए-मुमालिक' का बड़ा पद और 'शाइस्ता खान' की उपाधि मिली थी। जलालुद्दीन ने धीरे-धीरे दरबार के अन्य अधिकारियों को अपने पक्ष में कर लिया।
उसने देखा कि सुल्तान के पास अब कोई ताकत नहीं बची है। जनता भी इस कमजोर सरकार से पूरी तरह तंग आ चुकी है। बस फिर क्या था, जलालुद्दीन ने सत्ता अपने हाथ में लेने का फैसला कर लिया।
अलाउद्दीन खिलजी- हिंदू धर्म का रक्षक? | सबरंगइंडिया
खिलजी क्रांति की सबसे मजेदार दास्तान
आखिरकार जून 1290 में जलालुद्दीन ने खुद को दिल्ली का असली सुल्तान घोषित कर दिया। वह दिल्ली के पास किलोखड़ी के महल में गद्दी पर बैठा। इस पूरी घटना को भारतीय इतिहास में 'खिलजी क्रांति' के नाम से जाना जाता है।
इसके साथ ही गुलाम वंश का लगभग 84 साल पुराना राज खत्म हो गया। इतिहासकार बताते हैं कि यह सिर्फ एक राजा का बदलना नहीं था। यह दिल्ली की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का एक बहुत बड़ा बदलाव था।
जलालुद्दीन ख़िलजी - विकिपीडिया
खिलजी वंश के आने से इतिहास पर क्या असर पड़ा
हालांकि कुछ अमीर तुर्क अधिकारी इस नए खिलजी शासन के बिल्कुल खिलाफ थे। वे खिलजी कबीले के लोगों को अपने से छोटा समझते थे। लेकिन जलालुद्दीन ने अपनी सूझबूझ से सभी विद्रोहों को शांत कर दिया। उसने दिल्ली सल्तनत को एक नई मजबूती और स्थिरता प्रदान की।
इसी खिलजी वंश में आगे चलकर अलाउद्दीन खिलजी जैसा खतरनाक राजा भी आया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन को हटाकर गद्दी हासिल की थी। उसने पूरे दक्षिण भारत तक दिल्ली सल्तनत का झंडा फहराया था।
जलाल उद दीन फ़िरोज़ खिलजी – जीकेटुडे
दिल्ली के नए इतिहास की शुरुआत
इस वंश के राजाओं ने मंगोलों के बड़े हमलों से भारत को हमेशा बचाकर रखा। उन्होंने व्यापार और बाजार के नियमों में भी बहुत बड़े सुधार किए थे। किलोखड़ी के महल से शुरू हुआ यह सफर पूरे भारत में फैल गया था।
आज भी इतिहास के पन्नों में साल 1290 को एक टर्निंग पॉइंट माना जाता है। गुलाम वंश के अंत ने दिल्ली को एक नया जीवन और नई दिशा दी थी। जलालुद्दीन खिलजी की यह कहानी हमें सिखाती है कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
इस तरह साल 1290 की उस घटना ने देश को एक नया रास्ता दिखाया। गुलाम वंश के अंत ने यह साबित कर दिया कि सत्ता सिर्फ जन्म से नहीं मिलती। जिसके पास ताकत और सही रणनीति होगी, वही दिल्ली का असली सुल्तान बनेगा। यह कहानी आज भी हमें सत्ता के खेल की याद दिलाती है।
13 जून की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं
आइए जानते हैं 13 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं- हिंदी भाषा सम्मान होल्कर साम्राज्य
विश्व और भारत इतिहास की प्रमुख घटनाएं...
- 1420: जलालुद्दीन फ़िरोजशाह दिल्ली की सल्तनत का सुल्तान बना और गद्दी पर बैठा।
- 1940: जलियाँवाला बाग़ का बदला लेने वाले क्रांतिकारी ऊधमसिंह को लंदन में फाँसी दी गई।
- 1993: किम कैंपबेल ने इतिहास रचा और वह कनाडा की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।
- 1997: दिल्ली के उपहार सिनेमाघऱ में भीषण आग लगने से 59 लोगों की दर्दनाक मौत हुई।
- 2001: नेपाल शाही हत्याकांड में दीपेन्द्र की प्रेमिका देवयानी ने गवाही देने से साफ इन्कार किया।
- 2002: साल 1972 में हुए ऐतिहासिक एंटी बैलिस्टिक मिसाइल समझौते की समय सीमा समाप्त हुई।
- 2003: डेनियल अखमितोव को कजाकिस्तान देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।
- 2004: कांगो में राष्ट्रपति जोसेफ़ कबीला के ख़िलाफ़ तख्ता पलट की बड़ी कोशिश नाकाम हुई।
- 2004: ईराक के विदेश उपमंत्री बासम सालिह कुन्बा की अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी।
- 2005: ईरान 25 सालों तक भारत को तरल प्राकृतिक गैस (LNG) भेजने पर राजी हुआ।
- 2006: नाइजीरिया और कैमरून देश ने अपने पुराने सीमा विवाद को समझौते से सुलझाया।
- 2008: टेलिकॉम मलेशिया कंपनी ने भारत की आइडिया सेलुलर में 15% हिस्सेदारी ख़रीदी।
- 2008: चीन और ताइवान ने आपस में सीधी विमान सेवा शुरू करने के समझौते पर दस्तखत किए।
- 1994: भारत की मशहूर और दिग्गज महिला तीरंदाज दीपिका कुमारी का जन्म हुआ था।
- 1964: भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का जन्म हुआ था।
- 1944: संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के आठवें महासचिव बान की मून का जन्म हुआ था।
- 1923: हिंदी सिनेमा के जाने-माने और बेहद मशहूर गीतकार प्रेम धवन का जन्म हुआ था।
- 2016: भारत के मशहूर लेखक, नाटककार और व्यंग्यकार मुद्राराक्षस का निधन हुआ था।
- 2012: पूरी दुनिया में मशहूर दिग्गज ग़ज़ल गायक मेहदी हसन का निधन हुआ था।
- 2008: 'तीसरे सप्तक' की एकमात्र और बेहद प्रसिद्ध कवयित्री कीर्ति चौधरी का निधन हुआ था।
- 1999: देश की रक्षा करते हुए भारतीय सेना के जाबांज सैनिक मेजर मनोज तलवार शहीद हुए थे।
- 1999: कारगिल युद्ध में 'महावीर चक्र' पाने वाले जांबाज सैनिक मेजर विवेक गुप्ता शहीद हुए थे।
- 1994: मणिपुर राज्य के भूतपूर्व सातवें मुख्यमंत्री राज कुमार जयचंद्र सिंह का निधन हुआ था।
- 1967: अपनी कला के लिए मशहूर भारत के प्रसिद्ध मूर्तिकार विनायक पांडुरंग करमरकर का निधन हुआ।
- 1922: अंग्रेज़ हुकूमत का कड़ा विरोध करने वाले क्रांतिकारी नानक भील शहीद हुए थे।
- 1719: मुगल साम्राज्य के दसवें सुल्तान और बादशाह रफ़ीउद्दाराजात का निधन हुआ था।
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