18 जून का इतिहास: आखिर क्यों आज भी याद किया जाता है हल्दीघाटी का युद्ध
Kaushiki | Jun 18, 2026, 08:00 IST
Haldighati Battle 1576
भारतीय इतिहास का सबसे साहसी युद्ध 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में लड़ा गया था। मेवाड़ के वीर महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेना के बीच हुई इस जंग की पूरी टाइमलाइन, चेतक की वीरता और अनसुने ऐतिहासिक फैक्ट्स यहां विस्तार से समझें।
Haldighati Battle 1576: भारतीय इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो सदियों बाद भी हमें प्रेरित करती हैं। इन्हीं में से एक सबसे बड़ी घटना है हल्दीघाटी का महायुद्ध। आज ही के दिन यानी 18 जून 1576 को यह ऐतिहासिक जंग शुरू हुई थी। यह लड़ाई सिर्फ जमीन के एक टुकड़े के लिए नहीं थी। यह लड़ाई मेवाड़ के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता को बचाने की थी।
एक तरफ मुगल सम्राट अकबर की विशाल और आधुनिक हथियारों से लैस सेना थी। दूसरी तरफ अपने देश की रक्षा के लिए मर-मिटने वाले महाराणा प्रताप थे। अरावली पहाड़ियों की तंग वादियों में यह भयंकर टकराव हुआ था। इस युद्ध की गूंज आज भी राजस्थान की माटी में सुनाई देती है।
![Haldighati Battle]()
मुगल सम्राट अकबर पूरे भारत पर अपना अधिकार जमाना चाहता था। उसने राजपूताना के कई राजाओं को अपने अधीन कर लिया था। लेकिन मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार शांति दूत भेजे थे। इनमें जलाल खान, मानसिंह, भगवान दास और टोडरमल शामिल थे। महाराणा प्रताप ने स्वाभिमान से समझौता करने से साफ मना कर दिया।
जब शांति के सारे प्रयास पूरी तरह विफल हो गए तब युद्ध तय हुआ। अकबर ने महाराणा प्रताप को बंदी बनाने के लिए बड़ी सेना भेजी। इस तरह 18 जून 1576 को युद्ध की रणभेरी बज उठी।
![वीरता की गाथाएँ - हल्दीघाटी का युद्ध]()
हल्दीघाटी का मैदान बहुत संकरा और पीले रंग की मिट्टी वाला था। इसी वजह से इस जगह का नाम हल्दीघाटी पड़ा था। इस तंग रास्ते पर बड़ी सेना का एक साथ लड़ना मुश्किल था।
महाराणा प्रताप ने इसी भौगोलिक स्थिति का पूरा फायदा उठाने की योजना बनाई। उनकी सेना में करीब तीन हजार घुड़सवार और सैंकड़ों भील तीरंदाज शामिल थे। भील आदिवासी अपनी गुरिल्ला युद्ध कला में बेहद माहिर माने जाते थे।
दूसरी तरफ मुगलों के पास करीब 10 हजार से ज्यादा सैनिक थे। मुगलों की सेना के पास आधुनिक बंदूकें और बड़े लड़ाकू हाथी भी थे। संख्या बल में कम होने के बावजूद राजपूतों के हौसले बहुत बुलंद थे।
![राजस्थान ने फिर से लिखा इतिहास: हल्दीघाटी का युद्ध अकबर ने नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप ने जीता - इंडिया टुडे]()
18 जून की सुबह युद्ध शुरू होते ही भयंकर मारकाट मच गई। महाराणा प्रताप के सैनिकों ने मुगलों के अग्रिम दस्ते को तहस-नहस कर दिया। युद्ध के बीच में एक ऐसा पल आया जो अमर हो गया।
महाराणा प्रताप अपने प्रिय नीले घोड़े चेतक पर सवार थे। उन्होंने सीधे मुगलों के मुख्य सेनापति राजा मानसिंह पर हमला बोल दिया। चेतक ने अपने पैर मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टिका दिए।
महाराणा प्रताप ने अपने भारी भाले से मानसिंह पर जोरदार वार किया। लेकिन मानसिंह हाथी के हौदे में छिपकर अपनी जान बचाने में सफल रहा। इस दौरान हाथी की सूंड में लगी तलवार से चेतक का एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया।
![अब ASI भी बताएगा हल्दीघाटी के रण में नहीं हारे थे महाराणा प्रताप, हटेगा पुराना शीलापट्ट - asi rajasthan history haldighati war maharana pratap akbar ntc - AajTak]()
चेतक का पैर कट चुका था लेकिन उसका हौसला कम नहीं हुआ। राजपूत सरदारों ने महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर जाने का आग्रह किया। उनका जीवित रहना मेवाड़ की आजादी के लिए बहुत जरूरी था।
महाराणा प्रताप भारी मन से पीछे हटने के लिए तैयार हुए। घायल चेतक अपने स्वामी को पीठ पर लादकर तेजी से दौड़ा। रास्ते में एक बहुत बड़ा और गहरा बरसाती नाला था।
मुगलों के सैनिक महाराणा प्रताप का लगातार पीछा कर रहे थे। चेतक ने अपनी पूरी ताकत समेटकर उस बड़े नाले को एक छलांग में पार कर लिया। नाला पार करते ही चेतक जमीन पर गिर गया और उसने अपने प्राण त्याग दिए।
![महाराणा प्रताप: हल्दीघाटी के युद्ध की चार यादगार घटनाएँ]()
इस युद्ध के परिणाम को लेकर इतिहासकारों में हमेशा से अलग-अलग मत रहे हैं। कुछ पुरानी किताबों में मुगलों की जीत का जिक्र मिलता है। लेकिन आधुनिक शोध और नए दस्तावेज कुछ अलग ही कहानी बयां करते हैं।
सच यह है कि अकबर का मुख्य उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सका। अकबर महाराणा प्रताप को न तो बंदी बना सका और न ही मार सका। महाराणा प्रताप ने पहाड़ों में रहकर मुगलों के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा।
उन्होंने धीरे-धीरे मेवाड़ के अपने कई खोए हुए किले वापस जीत लिए। इसलिए हल्दीघाटी के युद्ध को महाराणा प्रताप के अदम्य साहस की जीत माना जाता है।
![Haldighati Battle]()
हल्दीघाटी के महायुद्ध से जुड़े कुछ ऐसे अनोखे और रोमांचक किस्से, जो आज भी बहुत कम लोग जानते हैं।
आज का इतिहास मेंहर दिन का अपना एक अलग महत्व होता है। 18 जून का दिन भी इतिहास (आज की यादगार घटनाएं) में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है। इस दिन दुनिया में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
आइए जानते हैं 18 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं-
आज का इतिहास: भारत को पहला ओलंपिक मुक्केबाजी पदक दिलाने वाले विजेंदर सिंह का हुआ जन्म
आज का इतिहास: सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती पर जानें उनके वल्लभ से सरदार बनने तक का सफर
आज का इतिहास: Cuban Missile Crisis 1962, जब दुनिया परमाणु युद्ध से सिर्फ एक कदम दूर थी
आज का इतिहास: कैसे खड़ी हुई थी दुनिया की सबसे बड़ी आजादी की मशाल Statue of Liberty
एक तरफ मुगल सम्राट अकबर की विशाल और आधुनिक हथियारों से लैस सेना थी। दूसरी तरफ अपने देश की रक्षा के लिए मर-मिटने वाले महाराणा प्रताप थे। अरावली पहाड़ियों की तंग वादियों में यह भयंकर टकराव हुआ था। इस युद्ध की गूंज आज भी राजस्थान की माटी में सुनाई देती है।
Haldighati Battle
हल्दीघाटी का युद्ध कब और क्यों हुआ था
अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार शांति दूत भेजे थे। इनमें जलाल खान, मानसिंह, भगवान दास और टोडरमल शामिल थे। महाराणा प्रताप ने स्वाभिमान से समझौता करने से साफ मना कर दिया।
जब शांति के सारे प्रयास पूरी तरह विफल हो गए तब युद्ध तय हुआ। अकबर ने महाराणा प्रताप को बंदी बनाने के लिए बड़ी सेना भेजी। इस तरह 18 जून 1576 को युद्ध की रणभेरी बज उठी।
वीरता की गाथाएँ - हल्दीघाटी का युद्ध
दोनों सेनाओं की रणनीतिक युद्ध कौशल
महाराणा प्रताप ने इसी भौगोलिक स्थिति का पूरा फायदा उठाने की योजना बनाई। उनकी सेना में करीब तीन हजार घुड़सवार और सैंकड़ों भील तीरंदाज शामिल थे। भील आदिवासी अपनी गुरिल्ला युद्ध कला में बेहद माहिर माने जाते थे।
दूसरी तरफ मुगलों के पास करीब 10 हजार से ज्यादा सैनिक थे। मुगलों की सेना के पास आधुनिक बंदूकें और बड़े लड़ाकू हाथी भी थे। संख्या बल में कम होने के बावजूद राजपूतों के हौसले बहुत बुलंद थे।
राजस्थान ने फिर से लिखा इतिहास: हल्दीघाटी का युद्ध अकबर ने नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप ने जीता - इंडिया टुडे
जब मैदान में आमने-सामने आए प्रताप-मानसिंह
महाराणा प्रताप अपने प्रिय नीले घोड़े चेतक पर सवार थे। उन्होंने सीधे मुगलों के मुख्य सेनापति राजा मानसिंह पर हमला बोल दिया। चेतक ने अपने पैर मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टिका दिए।
महाराणा प्रताप ने अपने भारी भाले से मानसिंह पर जोरदार वार किया। लेकिन मानसिंह हाथी के हौदे में छिपकर अपनी जान बचाने में सफल रहा। इस दौरान हाथी की सूंड में लगी तलवार से चेतक का एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया।
अब ASI भी बताएगा हल्दीघाटी के रण में नहीं हारे थे महाराणा प्रताप, हटेगा पुराना शीलापट्ट - asi rajasthan history haldighati war maharana pratap akbar ntc - AajTak
स्वामीभक्त घोड़े चेतक की वीरता
महाराणा प्रताप भारी मन से पीछे हटने के लिए तैयार हुए। घायल चेतक अपने स्वामी को पीठ पर लादकर तेजी से दौड़ा। रास्ते में एक बहुत बड़ा और गहरा बरसाती नाला था।
मुगलों के सैनिक महाराणा प्रताप का लगातार पीछा कर रहे थे। चेतक ने अपनी पूरी ताकत समेटकर उस बड़े नाले को एक छलांग में पार कर लिया। नाला पार करते ही चेतक जमीन पर गिर गया और उसने अपने प्राण त्याग दिए।
महाराणा प्रताप: हल्दीघाटी के युद्ध की चार यादगार घटनाएँ
हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम
सच यह है कि अकबर का मुख्य उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सका। अकबर महाराणा प्रताप को न तो बंदी बना सका और न ही मार सका। महाराणा प्रताप ने पहाड़ों में रहकर मुगलों के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा।
उन्होंने धीरे-धीरे मेवाड़ के अपने कई खोए हुए किले वापस जीत लिए। इसलिए हल्दीघाटी के युद्ध को महाराणा प्रताप के अदम्य साहस की जीत माना जाता है।
Haldighati Battle
महायुद्ध से जुड़े कुछ रोमांचक किस्से
भाले और कवच का भारी-भरकम वजन
महाराणा प्रताप कोई आम योद्धा नहीं थे। उनकी शारीरिक ताकत नेक्स्ट लेवल थी। युद्ध के मैदान में वे जो भाला इस्तेमाल करते थे, उसका वजन अकेले 81 किलो था! इसके अलावा उनकी छाती का कवच लगभग 72 किलो का था। जब आप उनके दो भारी तलवारों और ढाल का वजन जोड़ेंगे, तो कुल वजन 200 किलो से भी ज्यादा हो जाता था।बहलोल खान के दो टुकड़े
इस युद्ध का सबसे हैरान करने वाला पल तब आया, जब अकबर का सबसे ताकतवर और क्रूर सेनापति बहलोल खान लोदी, महाराणा प्रताप के सामने आया। बहलोल खान कद-काठी में किसी दैत्य जैसा था। प्रताप ने अपनी पूरी ताकत से अपनी तलवार का ऐसा वार किया कि बहलोल खान के सिर से लेकर उसके घोड़े तक के दो बराबर टुकड़े हो गए। यह देखकर मुगल सेना के हौसले पस्त हो गए थे।चेतक के चेहरे पर हाथी का मुखौटा
युद्ध की रणनीति के तहत महाराणा प्रताप ने अपने वफादार घोड़े चेतक के चेहरे पर एक नकली हाथी की सूंड लगाई थी। यह कोई फैशन नहीं, बल्कि एक तगड़ी चाल थी। मुगलों के लड़ाकू हाथी ट्रेंड थे कि वे घोड़ों पर हमला करते थे, लेकिन दूसरे हाथियों पर नहीं। इस मुखौटे की वजह से मुगल सेना के हाथी कंफ्यूज हो गए और उन्होंने चेतक को अपना ही बच्चा समझकर रास्ता दे दिया।हाथियों के बीच का टाइटैनिक मुकाबला
हल्दीघाटी में सिर्फ इंसानों और घोड़ों की जंग नहीं थी, बल्कि वहां हाथियों का महा मुकाबला भी हुआ था। मेवाड़ की तरफ से रामप्रसाद और लूना नाम के समझदार हाथी लड़ रहे थे। रामप्रसाद ने अकेले ही मुगलों के कई हाथियों को मार गिराया था। जब रामप्रसाद को मुगलों ने पकड़ लिया, तो अकबर ने उसका नाम बदलकर पीरप्रसाद रख दिया। लेकिन उस वफादार हाथी ने मुगलों का दिया अन्न और पानी छोड़ दिया और भूखा रहकर अपने प्राण त्याग दिए।झाला मान का ऐतिहासिक बलिदान
जब चेतक घायल हो गया और महाराणा प्रताप मुगलों से घिर गए, तब मेवाड़ के बड़े सरदार झाला मान आगे आए। उनका चेहरा महाराणा प्रताप से काफी मिलता था। उन्होंने बिना देर किए प्रताप के सिर से राजकीय मुकुट और छत्र अपने सिर पर रख लिया। मुगलों ने उन्हें ही महाराणा प्रताप समझ लिया और उन पर टूट पड़े। झाला मान ने हंसते-हंसते अपने प्राण दे दिए, लेकिन तब तक महाराणा प्रताप सुरक्षित निकल चुके थे।जंग के बाद भी भूखा सोया था अकबर
हल्दीघाटी युद्ध (महाराणा प्रताप अकबर वॉर) के बाद राजा मानसिंह और आसफ खान जब अकबर के दरबार में पहुंचे, तो अकबर जश्न मनाने के बजाय बुरी तरह भड़क गया। उसका मुख्य मकसद महाराणा प्रताप को जिंदा या मुर्दा पकड़ना था, जिसमें मुगल नाकाम रहे। इतिहासकार अबुल फजल लिखते हैं कि अकबर इतना निराश और खौफजदा था कि उसने कई दिनों तक मानसिंह और आसफ खान के दरबार में एंट्री बंद कर दी थी और खुद भी चैन से नहीं सो पाया था।
18 जून की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं
आइए जानते हैं 18 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं-
विश्व और भारत इतिहास की प्रमुख घटनाएं...
- 1576: मेवाड़ के वीर महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेना के बीच ऐतिहासिक हल्दीघाटी का युद्ध शुरू हुआ था।
- 1979: अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर और सोवियत राष्ट्रपति ब्रेझनेव ने वियना में 'साल्ट-द्वितीय' (SALT-II) समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 1997: कंबोडिया के खमेर रूज के क्रूर नेता और लाखों लोगों के हत्यारे माओवादी पोलपोट ने आत्मसमर्पण किया।
- 1999: लंदन में 35 यूरोपीय देशों के बीच पेयजल समझौते पर हस्ताक्षर हुए और लातविया में वाइके फ़्रेबरेमा को नया राष्ट्रपति चुना गया।
- 2001: पाकिस्तान ने अपने रक्षा बजट में कटौती की और तालिबान ने अमेरिका के खिलाफ ओसामा बिन लादेन का फतवा रद्द किया।
- 2004: चाड के सैनिकों ने 69 सूडानी मिलिशियाई को मार गिराया, वहीं दक्षिण कोरिया ने इराक में अपनी सेना भेजने का फैसला किया।
- 2008: केंद्र सरकार ने गुर्जरों को ओबीसी (OBC) कोटे के तहत 5% आरक्षण देने की बड़ी घोषणा की।
- 2008: भारत आए सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद और पीएम डॉ. मनमोहन सिंह के बीच तीन महत्वपूर्ण समझौते हुए।
- 2008: भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी ने अमेरिकी दिग्गज फाइजर के साथ चल रहे पेटेंट विवाद को एक समझौते के तहत खत्म किया।
- 2008: वियतनाम ने ग्लोबल मार्केट में सप्लाई सुधारने के लिए अपने चावल के निर्यात (Export) पर लगी पाबंदी को हटा लिया।
- 2017: आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी (ICC Champions Trophy) के फाइनल मुकाबले में पाकिस्तान ने भारत को हराकर खिताब जीता।
- 1817: नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री जंगबहादुर का जन्म हुआ था।
- 1852: भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता सी. विजय राघवा चारियर का जन्म हुआ।
- 1887: महान स्वतंत्रता सेनानी, वकील और आधुनिक बिहार के निर्माता अनुग्रह नारायण सिन्हा का जन्म हुआ।
- 1899: मशहूर स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और गांधीवादी विचारक दादा धर्माधिकारी का जन्म हुआ था।
- 1921: बिहार और कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल रहे पी. वेंकटसुब्बैया का जन्म हुआ।
- 1931: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पांचवें सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन का जन्म हुआ था।
- 1931: ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति फर्नांडो हेनरिक कार्डोसो का जन्म हुआ।
- 1958: नौकायन (Yachting) खेल में भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे होमी डैडी मोतीवाला का जन्म हुआ।
- 1992: आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध महिला राजनीतिज्ञों में से एक गोड्डेति माधवी का जन्म हुआ था।
- 1974: प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, सांसद और हिंदी के बेहतरीन साहित्यकार सेठ गोविन्द दास का निधन हुआ।
- 1974: सोवियत संघ के मशहूर रक्षामंत्री जॉर्जी ज़ुकोव का निधन हुआ था।
- 1993: स्वतंत्रता सेनानी, जाने-माने राजनेता और होम्योपैथी डॉक्टर युधवीर सिंह का निधन हुआ।
- 2002: हिंदी फिल्मों की मशहूर और बेहद खूबसूरत अभिनेत्री नसीम बानो का निधन हुआ था।
- 2009: विख्यात भारतीय संगीतकार, शास्त्रीय गायक और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर ख़ाँ का निधन हुआ।
- 2021: भारत के महानतम धावक और 'फ्लाइंग सिख' के नाम से मशहूर मिलखा सिंह का निधन हुआ था।
- गोवा क्रान्ति दिवस: हर साल 18 जून को गोवा की आजादी के संघर्ष की याद में 'गोवा क्रांति दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
आज का इतिहास से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें...
आज का इतिहास: सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती पर जानें उनके वल्लभ से सरदार बनने तक का सफर
आज का इतिहास: Cuban Missile Crisis 1962, जब दुनिया परमाणु युद्ध से सिर्फ एक कदम दूर थी
आज का इतिहास: कैसे खड़ी हुई थी दुनिया की सबसे बड़ी आजादी की मशाल Statue of Liberty
MP कर्मचारी प्रमोशन: 10 साल बाद पदोन्नति, अब 4 साल की छूट पर अटका मामला, राज्य कर्मचारी संघ ने सीएम मोहन यादव से की मांग
By Atul Dwivedi
एमपी भाजपा में 30 सितंबर को तीन दिग्गजों की एकसाथ आमद, 236 दिन बाद मिला प्रदेश संगठन महामंत्री
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश भाजपा में अब लक्ष्मण रेखा कौन खींचेगा? चंद्रशेखर की होगी असली परीक्षा
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत: मिनी ट्रैक्टर पर मिलेगी 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसे करें आवेदन
By Jitendra Shrivastava
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
By Sanjay Dhiman
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
By Sanjay Gupta
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari