सुनो भाई साधो... स्वागत की माला तुरंत उतारने का रिवाज
The Sootr | Nov 02, 2025, 07:00 IST
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व्यंग्यकार सुधीर नायक ने फूलों की माला पर चर्चा पर की है। इसमें बताया गया है कि यह आलेख माला उतारने की कुप्रथा पर प्रहार करता है। मेहमानों और मेजबानों के बीच असुविधा उजागर करता है।
सुधीर नायक
यह आलेख माला उतारने की कुप्रथा पर प्रहार करता है। मेहमानों और मेजबानों के बीच असुविधा उजागर करता है। लेखक व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहता है कि फूलों का सम्मान करें, रिवाज तोड़ने वाला 'सूरमा' चाहिए।
न जाने किस दुष्ट ने यह रिवाज चला दिया कि माला पहनते ही उतारनी पड़ेगी। मेजबानों का कर्त्तव्य है कि वे अतिथियों का पुष्पमालाएं पहनाकर स्वागत करें और अतिथियों का कर्त्तव्य है कि वे पहनते साथ ही माला उतारकर हाथ में ले लें या टेबल पर रख दें।
कभी-कभी तो फोटो भी नहीं खिंच पाती
सब बेमन से इस कुप्रथा को ढ़ो रहे हैं। एक को उतारते देखकर दूसरे को उतारना पड़ती है। कभी-कभी तो फोटो भी नहीं खिंच पाती और कोई दुष्ट उतारने लगता है। उसे उतारते देखकर सबकी मजबूरी हो जाती है। सब चाहते हैं कि थोड़ी देर और डली रहे। गले से ताजी-ताजी उतारी गई माला को देखकर मन कुढ़ता है। अभी न छोड़कर कि ये दिल अभी भरा नहीं। ये फिजा जरा महक तो ले।
कोई विद्रोही नहीं जन्मा जो कहता हम नहीं उतारेंगे
ये फूलों का अपमान नहीं तो क्या है?
भोपाल में वरिष्ठ कर्मचारी नेता हैं कर्मचारी नेता सुधीर नायक
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