CBSE Three-Language Rule: अब 3 भाषाएं पढ़ना होगा जरूरी, डिटेल में समझें नियम?

Manya Jain | Apr 08, 2026, 12:02 IST
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cbse new three language formula 2026
cbse new three language formula 2026

सीबीएसई सत्र 2026-27 से तीन भाषा नीति लागू करेगा। इसमें दो भारतीय भाषाएं पढ़ना जरूरी होगा। जानें क्यों दो भारतीय भाषाएं पढ़ना अनिवार्य है और छात्रों पर इसका क्या असर होगा।

Education News.सीबीएसई अब स्कूलों में तीन भाषाएं अनिवार्य कर रहा है। सीबीएसई गाइडलाइन के मुताबिक यह नियम साल 2026-27 से लागू किया जाएगा। इसका मकसद बच्चों को ज्यादा भाषाएं सिखाना है। अब छात्रों को दो भारतीय भाषाएं पढ़नी होंगी। तीसरी भाषा विदेशी या कोई अन्य हो सकती है। यह फैसला नई शिक्षा नीति के तहत लिया गया।

पैरेंट्स और शिक्षक इस बदलाव से थोड़े परेशान हैं। सबको डर है कि पढ़ाई का बोझ बढ़ जाएगा। किताबों के पब्लिशर्स भी नई तैयारी में जुटे हैं। बोर्ड ने वेबकास्ट के जरिए नियम समझाए हैं। फिर भी लोगों के मन में कई सवाल हैं। आज हम जानेंगे की ये फैसला (Big decision of CBSE) क्यों लिया गया और इससे जुड़े नियम क्या हैं।

क्या है नया थ्री-लैंग्वेज नियम?

  • दो भारतीय भाषाएं जरूरी अब बच्चों को दो देसी भाषाएं सीखनी ही होंगी। इससे वे अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़ेंगे। भारत की विविध बोलियों को इससे बढ़ावा मिलेगा।
  • एक विदेशी भाषा का विकल्प छात्र तीसरी भाषा के तौर पर विदेशी भाषा चुनेंगे। यह भाषा भविष्य में उनके बहुत काम आएगी। इससे दुनिया भर में करियर बनाना आसान होगा।
THREE LANGAUGE RULE
THREE LANGAUGE RULE


  • अंग्रेजी अब विदेशी भाषा मानी जाएगी सबसे बड़ा बदलाव अंग्रेजी को लेकर हुआ है। अब अंग्रेजी को विदेशी भाषा गिना जाएगा। इसलिए अंग्रेजी के साथ दो भारतीय भाषाएं पढ़नी होंगी।
  • रट्टा नहीं, बातचीत पर जोर बोर्ड अब रटने पर ध्यान नहीं देगा। उनका मकसद बातचीत करने का हुनर सिखाना है। बच्चे भाषा का इस्तेमाल असल जिंदगी में कर सकेंगे।

कागजी नीति बनाम जमीनी हकीकत

नई नीतियां कागजी रूप से तो अमल हो जाती हैं लेकिन इनकी जमीनी हकीकत कुछ और ही होती हैं।

संसाधनों की भारी कमी

आजकल उत्तर भारत के ज़्यादातर स्कूलों में भारतीय भाषाओं के नाम पर बस हिंदी और संस्कृत ही मिलती है। अगर कोई बच्चा कन्नड़, ओड़िया या तमिल जैसी भाषाएं सीखना चाहे, तो उन्हें पढ़ाने वाले टीचर्स ही नहीं हैं। ऊपर से शिक्षकों का यह भी कहना है कि अगर एक ही टीचर पर 150-150 बच्चों की जिम्मेदारी डाल दी जाएगी, तो पढ़ाई की क्वालिटी खराब होना तय है।

बस नाम के विकल्प (दिखावा)

अभिभावकों (Parents) को सबसे बड़ा डर यह है कि क्या बच्चों को सच में अपनी पसंद की भाषा चुनने का मौका मिलेगा या यह सब बस कागजों पर होगा?

रोहिणी की एक संस्कृत टीचर, दामिनी का कहना है कि नए लैंग्वेज टीचर्स को रखने के लिए स्कूलों को बहुत पैसा खर्च करना पड़ेगा। अब स्कूल अपनी जेब से तो देंगे नहीं, तो इसका सीधा बोझ स्कूल फीस बढ़ने के रूप में माता-पिता पर ही आएगा।

पेरेंट्स की सोच और मजबूरी

माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा ऐसी भाषा सीखे जिससे आगे चलकर उसे अच्छी नौकरी मिले। जैसे दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखने से देश के दूसरे राज्यों में करियर के बढ़िया मौके मिल सकते हैं। लेकिन समस्या वही है....इच्छा तो है, पर स्कूलों में सिखाने वाले गुरुजी (टीचर्स) ही गायब हैं।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

लोटस पेटल स्कूल की प्रिंसिपल श्रीविद्या का कहना है कि यह नीति फ्लेकजीबल होनी चाहिए। इसे धीरे-धीरे लागू करना ही सही रहेगा। इससे स्कूलों को तैयारी के लिए पूरा समय मिलेगा। शिक्षक भी नई चीजों को अच्छे से सीख पाएंगे।

सही योजना से भारतीय छात्र कई भाषाएं बोलकर ग्लोबल नागरिक बन सकेंगे। लेकिन बिना तैयारी के इसे थोपना गलत होगा। इससे बच्चों और शिक्षकों पर बेकार का बोझ बढ़ेगा। बेहतर बुनियादी ढांचा इस नीति की सफलता के लिए जरूरी है।

FAQ

  1. क्या कक्षा 10 के छात्रों के लिए भी 2026 से यह नियम लागू होगा?
    नहीं, सीबीएसई इस नीति को चरणबद्ध तरीके (Phased manner) से लागू करेगा। इसकी शुरुआत शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कक्षा 6 के नए बैच से होगी।
  2. क्या छात्र दो विदेशी भाषाएं चुन सकते हैं?
    नए थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला (Three-Language Formula) के तहत कम से कम दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य है। इसलिए, छात्र केवल एक ही विदेशी भाषा (जैसे अंग्रेजी, जर्मन या फ्रेंच) चुन सकते हैं।
  3. क्या अंग्रेजी पढ़ना अनिवार्य रहेगा?
    चूंकि अंग्रेजी को अब एक विदेशी भाषा माना गया है, इसलिए छात्र इसे तीसरी भाषा के रूप में चुन सकते हैं। हालांकि, भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता के कारण छात्रों को दो देशी भाषाओं (जैसे हिंदी, मराठी, बंगाली आदि) को साथ में पढ़ना होगा।
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