News Strike: यूजीसी के नए नियम पर अंतरिम रोक, लेकिन क्या रुक सकेगा जातिगत भेदभाव, क्यों लग रहा है ‘जातंकवाद’ भड़कने का डर?

Harish Divekar | Jan 31, 2026, 07:00 IST
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Photograph: (thesootr)

यूजीसी के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक लगाई। इससे जातिवाद के बढ़ने का डर पैदा हो गया है। मध्यप्रदेश में जाति आधारित विवादों के बढ़ने से चिंता बढ़ी है।

News In Short

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई।
जातिवाद की बढ़ती जड़ें समाज में विभाजन बढ़ा सकती हैं।
मध्यप्रदेश में जाति आधारित विवादों ने चिंता बढ़ाई।
सरकार जातिवाद बढ़ाने का आरोप झेल रही है।
जातंकवाद की आग फैलने से सामाजिक ताने-बाने को खतरा है।

News In Detail

News Strike | न्यूज स्ट्राइक:क्या मध्यप्रदेश अब जातंक की कगार पर पहुंच गया है। पहले यूजीसी के नियमों में बदलाव और फिर उन पर अंतरिम रोक। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे वाली कहावत का ये घटना एक सटीक उदाहरण है। ऐसे में आतंक या जेहाद नहीं जातंक का डर लोगों को सताने लगा है।

आप जरूर सोचेंगे कि ये जातंक आखिर क्या बला है। वो भी बताएंगे और उसका डर क्यों गहरा रहा है, वो भी बताएंगे। साथ में ये भी समझाएंगे कि इस पूरी घटना का आफ्टर इफेक्ट खासतौर पर मध्यप्रदेश में क्या होने वाला है।

क्या सरकार की मंशा पर हो रहा खेल?

यूजीसी के भेदभाव वाले नियम पर बीते कुछ दिन जमकर हल्ला हुआ। उसका असर ये भी हुआ कि पार्टी का सबसे वफादार वोटर उससे खफा हो गया।

सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार की तारीफ करने वाले ढेरों चैनल्स के सुर अचानक बदल गए। मानों सरकार न हुई कोई माशूका हो गई जो अचानक से बेवफाई पर अमादा है। और सोनम बेवफा है कि तर्ज पर हजारों आशिकनुमा हैंडल्स ने अलग अलग शब्दों में लिख दिया कि ये सरकार भी बेवफा हो गई। लेकिन फिर अचानक वो फैसला आया जिसका इंतजार था।

सुप्रीम कोर्ट ने ताजा नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है। इस फैसले ने ये साफ कर दिया कि सरकार जो चाहती थी वो हो चुका है। अब वो एससी, एसटी और ओबीसी तबकों की प्रियसी बन गई है और सवर्णों को भी अपने पुराने प्यार पर फिर से भरोसा होने लगा है। लेकिन दोनों को ही ये सोचना जरूरी है कि क्या इस बहाने उन्हें ठगने की कोशिश तो नहीं हो रही।

एक बार कोर्ट में केस गया है तो तारीख पर तारीख मिलना तय है। ऐसे में किसी नतीजे पर कब पहुंचना है इसका फैसला भी सरकार की मंशा पर निर्भर हो सकता है। तब तक दोनों आशिक यही सोचते रहेंगे कि आखिर माशूक का दिल किस तरफ है।

पर इस सोशल मीडिया पर पसरे फैलारे से ज्यादा ये मामला बेहद संजीदा है और, समाज के भीतर किसी नई जंग का दबा छुपा ऐलान भी हो सकता है। फिलहाल तो अंतरिम रोक के बाद विरोध करने वालों की आवाज कुछ थमी जरूर है, लेकिन जो गुस्सा अंदर ही अंदर पनप चुका है। वो क्या इतनी आसानी से शांत हो जाएगा। ये नाराजगी दोनों तरफ है।

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सरकार जातिवाद को और बढ़ा रही है!

शायद नहीं क्योंकि यूजीसी के नए नियमों के बनने की सुगबुगाहट से ही लोगों में समता की बजाए भेदभाव बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। या यूं कहें कि खतरा बढ़ चुका है। अब मध्यप्रदेश की ही बात ले लेते हैं। जहां कई अंचलों में सवर्ण वर्सेज दलिता का माहौल तैयार हो चुका है। ऐसी जगहों पर ये फैसला आग में कुछ चम्मच घी बनकर नहीं आया है। बल्कि, आग में पीपे भर भरकर घी उड़ेला गया है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद समाज में विभाजन की जो महीन सी लकीर थी। वो गहरा चुकी है। डर ये है कि अब तक जो गुस्सा जो नाराजगी मजहब को लेकर थी वो अब छोटी-छोटी जातियों के बीच ही न बंट जाए। सुप्रीम कोर्ट को सवर्ण समाज अपनी जीत के रूप में देख सकता है, लेकिन सच्चाई ये है कि सरकार नाम की ये प्रेयसी न सवर्ण वर्ग की हुई न दलित वर्ग की।

अलबत्ता कोर्ट के हवाले से दोनों ही साधने की पूरी कोशिश जरूर की, लेकिन सवर्णों की नाराजगी को दूर करना इतना भी आसान नहीं है। सरकार से खार खाए बैठे वफादार वोटर्स के एक प्रतिनिधि ने इस घटनाक्रम के बाद जातंकवाद बढ़ने का खौफ भी जाहिर किया है।

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जातंकवाद क्या आतंकवाद से भी खतरनाक?

जातंकवाद का अर्थ तो अब आप समझ ही गए होंगे। न समझे हों तो हम आपको बताते हैं। आपने आतंकवाद बहुत बार सुना होगा। झेला भी होगा या महसूस किया होगा। आमतौर पर जब भी आतंकवाद का नाम आता है एक समुदाय विशेष पर पूरा ध्यान चला जाता है। ये एक ऐसी जंग है जो देश के दो मजहबों के बीच लड़ी जा रही है। जिसमें नुकसान अमूमन एक पक्ष को होता है और दूसरा पक्ष बदनाम होता है, लेकिन अब इसकी जड़ें गहरी हो गई हैं और फैल गई हैं। इसे आप नेक्स्ट लेवल आतंकवाद या नेक्स्ट जैन आतंकवाद का नाम दे सकेत हैं।

जिस तरह डिजिटल युग में जनरेशन को अलग-अलग नाम मिले हैं, अल्फा, बीटा, जैन जी, बूमर ठीक उसी तरह अब आतंकवाद की भी जनरेशन आना शुरू हो चुकी हैं। जिसके मजहबी मम्मी डैडी हैं आतंकवाद और जेहाद। अब ये अगली पीढ़ी में जातंकवाद में बदल रही है। यानी कि अब तक जो आतंक मजहबों के बीच था। वो अब जातियों के बीच गहरा रहा है।

क्या हम ऐसे किसी दिन की कल्पना कर सकते हैं कि एक क्लास या स्कूल में अलग-अलग जातियों के बीच अपने बच्चे को पढ़ाने में ही डर लगने लग जाए। सोचिए फिर इस देश में हम कहां भाग कर जाएंगे। कौन सी गली, कौन सा मोहल्ला, कौन सा शहर ऐसा होगा जहां हम आप या हमारे बच्चे सेफ महसूस करेंगे। जातंकवाद बढ़ा तो ये आतंकवाद से भी खौफनाक हो सकता है। फिर क्या भरोसा जातंकवाद से आगे बढ़कर ये गौत्रों के आतंक में तब्दील हो जाए।

हुक्मरानों को अगर विकास न करना हो तो आतंकवाद की ये जनरेशन ही उसके सिर पर सत्ता का ताज सजाए रखने में तो काम आएंगी। क्या आपको भी ऐसा ही लगता है। सोचिए जब आतंकवाद ने सिर्फ जड़े फैलाना शुरू की हैं तब हाल ये है कि प्रदेश के अलग-अलग अंचल में ब्राह्मण वर्सेज दलित के हालात हैं जब ये जड़ें फैलकर गहरी हो जाएंगी तब क्या हालात होंगे।

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क्या जातंकवाद से बीजेपी को फायदा होगा

अगर बीजेपी सोचती है कि जातंकवाद गहरा होगा तो उसे फायदा होगा। तो शायद वो गलत है ऐसा करना न सिर्फ बीजेपी बल्कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए फायदेमंद है। ऐसा सोचने वाली बीजेपी को खुद अपना ही नारा याद कर लेना चाहिए।

जाति आधारित जनगणना के जवाब में खुद बीजेपी ने जुमला दिया था कि बंटेंगे तो कटेंगे, लेकिन चाहे अनचाहे इस जुमले से इतर काम शुरू हो चुका है। धर्म के बाद जाति के नाम पर भी हम बंटने लगे तो कल्पना कीजिए समाज का स्वरूप कैसा हो जाएगा।

बीजेपी ने दिग्विजय के कंधे पर रखी बंदूक

बीजेपी ने वैसे इस इल्जाम से बचने की कोशिश पूरी की है। इसलिए यूजीसी के नए नियमों की बंदूक भी कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के कंधे पर रखकर चलाई। जिस संसदीय समिति ने यूजीसी के इन नियमों को जांचा परखा, उसके अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ही बनाए गए। बीजेपी ने पूरी प्रोसेस को किसी कैटेलिस्ट की तरह देखा और प्रोसेस पूरी होते ही उससे बाहर हो गई, लेकिन इस बार कैटेलिस्ट पर भी इस प्रक्रिया का असर पड़ा है।

अब इस सच से पार्टी कैसे बचेगी कि जातिगत भेदभाव पिछले कुछ सालों में ज्यादा बढ़ा है और खुलकर सामने आने लगा है। इसका जिम्मेदार आखिर कौन है। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। उदाहरण मध्यप्रदेश का ही लिया जा सकता है।

यहां कुछ ही दिन पहले ग्वालियर चंबल ब्राह्मण वर्सेज दलित की आग से जूझ रहा था। ग्वालियर के वकील अनिल मिश्रा ने अंबेडकर और संविधान को लेकर बयान दिया। हिमाकत देखिए विवादित बयान के बाद खुद वकील साहब गिरफ्तारी देने भी पहुंच गए। उनके बयान पर ग्वालियर इतना उबला की उसकी सीमाएं सील होने की भी नौबत आ गई।

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जातंकवाद की आग एमपी में फैल रही है!

अनिल मिश्रा के दिए जख्म भरे भी नहीं थे कि संतोष वर्मा नाम के अफसर का विवादित बयान सुर्खियों में आ गया। जिस पर एक बार फिर जातियों में ही उबाल देखने को मिला। ये दो एकदम ताजा उदाहरण है। मध्यप्रदेश के ग्वालियर चंबल अंचल के अलावा विंध्य में भी अक्सर सवर्ण बनाम दलित की घटनाएं देखने को मिलती रहती हैं।

दलितों को मल मूत्र पिलाने जैसे घिनौने मामले हो या फिर सीधी वाला कांड हो जो बीजेपी के तत्कालीन विधायक केदारनाथ शुक्ल का राजनीतिक करियर ही तबाह कर गया। क्या इन घटनाओं को भुलाया जा सकता है। जातिवाद की आग फैली तो बुंदेलखंड भी जरूर सुलगेगा। यूपी से सटा ये इलाका भी ऐसा है जहां जातिवाद की जड़ें काफी गहरी हैं। तो सोचिए जातंकवाद फैला तो क्या मध्यप्रदेश की सरकार इन इलाकों को बचा सकेगी।

जातंकवाद की जड़ें बढ़ने से पहले काटी जाएं

सरकारें विकास की बात करती हैं, लेकिन समाज को बांटने वाले इन कामों से कब तक और कितना लंबा काम चल सकेगा, यही सब चलता रहा तो हिंदू मुस्लमान तो भूल ही जाइए। हो सकता है कि हिंदू हिंदू से ही लड़ पड़े वो भी जाति के नाम पर। भलाई इसी में है कि जातंकवाद की जड़ों को बढ़ने से पहले ही काट दिया जाए। ताकि सब एक रह सकें और सेफ भी रह सकें।

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