अमित जोगी ने उठाया सवाल, बापू के हत्यारे को सुना गया तो मुझे क्यों बिना सुने सूली पर चढ़ा दिया
Arun Tiwari | Apr 07, 2026, 13:49 IST
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छत्तीसगढ़ के चर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में हाईकोर्ट ने अमित जोगी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। फैसले के बाद अमित जोगी ने न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा- मुझे क्यों बिना सुने सूली पर चढ़ा दिया?
Raipur. छत्तीसगढ़ के रामावतार जग्गी हत्याकांड में हाईकोर्ट ने अमित जोगी को उम्र कैद की सज़ा सुनाई है। अमित जोगी ने अदालत के इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। जोगी ने कहा कि महात्मा गांधी के हत्यारे को सुना गया तो मुझे क्यों बिना सुने सूली पर चढ़ा दिया गया।
पूर्व सीएम के पुत्र अमित जोगी के लिए 23 साल बाद वो मुश्किल घड़ी आ गई है जिसकी कल्पना शायद उन्होंने कभी नहीं की होगी। दो दशक बाद उनको जग्गी हत्याकांड में उम्रकैद की सजा हुई है। हाईकोर्ट के दिए गए ऑर्डर के हिसाब से सरेंडर की डेडलाइन 23 अप्रैल है।
सरेंडर की नौबत न आए इसलिए अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जोगी ने सुप्रीम राहत के लिए सीनियर एडवोकेट की फौज उतार दी है। अमित जोगी के लिए न्याय की पैरवी कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और विवेक तन्खा जैसे धुरंधर कानून के जानकार कर रहे हैं। अमित जोगी को उम्मीद है कि उनको सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ जरुर मिलेगा।
23 साल बाद रामावतार जग्गी हत्याकांड (Jaggi Murder Case) में हाईकोर्ट ने अमित जोगी को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी। अदालत ने अमित जोगी को हत्या का मास्टर माइंड बताया। सुनवाई के दौरान रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने कोर्ट में दावा किया कि यह हत्या एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा थी।
मामले की जांच कर रही सीबीआई ने 11 हजार पन्नों की चार्जशीट पेश की, जिसमें कई अहम सबूत शामिल बताए गए। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने CBI की अपील को मंजूरी दी और अमित जोगी को सरेंडर करने का आदेश दिया। इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन बाद में इस मामले को फिर से खोला गया।
पूर्व सीएम के पुत्र अमित जोगी का 23 अप्रैल को ना हो सरेंडर, सुप्रीम राहत के लिए उतारे सिब्बल,रोहतगी और तन्खा जैसे धुरंधर
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अमित जोगी का एक्स पर पोस्ट:
दोस्तों, ये कैसा न्याय है? बिना सुने सूली पर चढ़ा देना — ये कैसा दस्तूर है? हमारे देश की न्याय व्यवस्था की बुनियाद “प्राकृतिक न्याय” के सिद्धांत पर टिकी है —कि हर व्यक्ति को सुना जाएगा, हर पक्ष को अवसर मिलेगा। इतिहास गवाह है —महात्मा गांधी के हत्यारों को भी लाल क़िला में पूरा अवसर दिया गया, उन्हें सुना गया, उनकी दलीलें सुनी गईं। लेकिन मेरे मामले में क्या हुआ? इसका सीधा अर्थ क्या है?कि अदालत ने केवल एक पक्ष को सुनकर — CBI, राज्य और शिकायतकर्ता — के आधार पर निर्णय लिया। यानी मुझे, मेरे वकीलों को —एक शब्द भी कहने का अवसर नहीं दिया गया।क्या यह न्याय है? आप स्वयं 78 पन्नों का पूरा निर्णय पढ़ लीजिए — कहीं भी एक भी स्थान ऐसा नहीं मिलेगा जहाँ लिखा हो: “अमित ने अपनी सफाई में यह कहा…” क्यों? क्योंकि मुझे सुना ही नहीं गया। 12,000 पन्नों के रिकॉर्ड, गवाहियों और साक्ष्यों वाले मामले में —सिर्फ 7 दिनों के भीतर —मुझे आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई। और विडंबना देखिए उसी फैसले में यह भी कहा गया कि मैं और मेरे वकील कार्यवाही में विलम्ब कर रहे थे! जो संस्थाएँ “सच, पूरा सच और सच के सिवा कुछ नहीं” सुनने, समझने और परखने की जिम्मेदारी निभाती हैं क्या उन्हें चयनात्मक होना चाहिए? क्या न्याय एकतरफा हो सकता है? और क्या हम यह मान लें कि कुछ “असाधारण” क्षमताएँ भी काम कर रही थीं—जहाँ 12,000 पन्नों का रिकॉर्ड, पूरी दलीलें, और 78 पन्नों का फैसला सिर्फ 3 दिनों में तैयार हो गया। जबकि तीनों दिन अवकाश थे (Good Friday, शनिवार और Easter Sunday)? मैं ये प्रश्न केवल अपने लिए नहीं —बल्कि हर उस नागरिक के लिए पूछ रहा हूँ, जो न्यायपालिका पर भरोसा करता है। अब 20 अप्रैल को माननीय सर्वोच्च न्यायालय मुझे सुनवाई का अवसर देगी। आख़िरकार — मेरी बात भी सुनी जाएगी। मुझे न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। मुझे सत्य पर विश्वास है। और मुझे ईश्वर पर विश्वास है — कि मेरे साथ अन्याय नहीं होगा। सत्य की जीत निश्चित है।
इतिहास गवाह है —
महात्मा गांधी के हत्यारों को भी लाल क़िला में… pic.twitter.com/sAC468yBYu
— 𝐀𝐦𝐢𝐭 𝐀𝐣𝐢𝐭 𝐉𝐨𝐠𝐢 (@AmitJogi) April 7, 2026
सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जोगी :
सरेंडर की नौबत न आए इसलिए अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जोगी ने सुप्रीम राहत के लिए सीनियर एडवोकेट की फौज उतार दी है। अमित जोगी के लिए न्याय की पैरवी कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और विवेक तन्खा जैसे धुरंधर कानून के जानकार कर रहे हैं। अमित जोगी को उम्मीद है कि उनको सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ जरुर मिलेगा।
जोगी को बताया मास्टर माइंड :
मामले की जांच कर रही सीबीआई ने 11 हजार पन्नों की चार्जशीट पेश की, जिसमें कई अहम सबूत शामिल बताए गए। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने CBI की अपील को मंजूरी दी और अमित जोगी को सरेंडर करने का आदेश दिया। इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन बाद में इस मामले को फिर से खोला गया।
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