छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: बीयर से अफीम तक…सियासत, सिस्टम और समाज
Rajesh Lahoti | Mar 14, 2026, 20:00 IST
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छत्तीसगढ़ में बीता हफ्ता ऐसा रहा कि जैसे कोई हास्य-व्यंग की फिल्म चल रही हो। वैसे देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में खबरें ही इतनी रंगीन हैं कि व्यंग्य अपने-आप पैदा हो जाता है। कहीं बीयर के कैन पर रैपर बदल रहे है तो कहीं खेतों में अनाज की जगह अफीम उग रही थी।
छत्तीसगढ़ में बीता हफ्ता ऐसा रहा कि जैसे कोई हास्य-व्यंग की फिल्म चल रही हो। वैसे देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में खबरें ही इतनी रंगीन हैं कि व्यंग्य अपने-आप पैदा हो जाता है। कहीं बीयर के कैन पर रैपर बदल रहे है तो कहीं खेतों में अनाज की जगह अफीम उग रही थी। कहीं जंगल विकास के नाम पर कट रहे थे, तो वहीँ विधानसभा में गैस सिलेंडर पर ऐसी बहस हो रही थी मानो पूरा लोकतंत्र उसी चूल्हे पर पक रहा हो।
हफ्ते की शुरुआत ही धमाके से हुई। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डालकर आरोप लगाया कि सस्ती बीयर के कैन पर महंगे ब्रांड का रैपर लगाकर बेचा जा रहा है। आरोप यह कि एक्सपायरी के करीब पहुंच चुकी सस्ती गोल्डन प्राइड बीयर के कैन पर महंगी 7 हिल्स का रैपर चिपका दिया जाता है और फिर उसे महंगे दामों पर बेचा जाता है।
अब यह आरोप सही है या नहीं, यह जांच का विषय है। इस मामले में ज्यादा हो-हल्ला नहीं हुआ, क्योंकि इसके पीछे की कहानी सभी जानते हैं। आउटसोर्सिंग कंपनी के कर्मचारियों की यह कोई बड़ी हरकत नहीं है, वे इससे बड़े-बड़े कमल कर चुके हैं। शराब की कमाई में सभी लोग अपना हिस्सा लेने में लगे हैं। यही कारण रहा कि यह मुद्दा ज्यादा चल नहीं पाया, क्योंकि छोटे-छोटे मुद्दों के लिए विधानसभा में हंगामा हो जाता है, लेकिन इस पर किसी ने जवाब देना भी उचित नहीं समझा।
बीच हफ्ते में एक ऐसी रिपोर्ट आई जिसने माहौल थोड़ा गंभीर कर दिया।केंद्र सरकार की मिसिंग चिल्ड्रन रिपोर्ट के मुताबिक गुमशुदा बच्चों के मामलों में छत्तीसगढ़ छठवें स्थान पर है। छत्तीसगढ़ में एक साल में 982 बच्चे लापता हुए, जिनमें से करीब 400 अब तक नहीं मिले। पुलिस “ऑपरेशन मुस्कान” चला रही है।
नाम बहुत सुंदर है-मुस्कान, लेकिन जिन परिवारों के बच्चे गायब हैं, उनके लिए यह शब्द अभी भी थोड़ा दूर का सपना है। रिपोर्ट आने के बाद सिस्टम की मशीनरी तुरंत सक्रिय होती है। बैठकें होती हैं, निर्देश जारी होते हैं, फाइलें चलती हैं। वहीँ आम आदमी सोचता है कि काश बच्चे भी इतनी तेजी से मिल जाते जितनी तेजी से फाइलें चलती हैं।
दरअसल मानव तस्करी छत्तीसगढ़ की पुरानी बीमारी है, जो वर्षों बाद भी ठीक नहीं हो रही है। इसके लिए जिम्मेदार शासन प्रशासन है जो देश में बरामद बच्चों से ना तो कोई क्लू हासिल कर पाते हैं और ना ही पुराने केस को फ़ॉलोअप कर पाते हैं, जिसके कारण अपराधी हमेशा गिरफ्त से बाहर ही रहता है। वहीँ बच्चे गायब होते रहते हैं।
सप्ताह के बीच में अचानक हलचल मच गई जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को ईमेल के जरिए बम से उड़ाने की धमकी मिल गई। धमकी मिलते ही पूरा कोर्ट परिसर खाली कराया गया, जजों और कर्मचारियों को बाहर निकाला गया और डॉग स्क्वॉड तथा बम स्क्वॉड ने जांच शुरू कर दी। घंटों तक जांच चली। शहर में अफवाहें भी उड़ती रहीं, लेकिन अंत में वही हुआ जो अक्सर ऐसी खबरों में होता है। कोई बम नहीं मिला। फिर भी इस घटना ने यह जरूर बता दिया कि डिजिटल युग में अब डर भी डिजिटल हो गया है।
पहले धमकी चिट्ठियों में आती थी, अब इनबॉक्स में आती है। हाई कोर्ट को दस दिन में दूसरी बार बम से उड़ाने की धमकी मिली। उसी दिन लोअर कोर्ट में भी बम की धमकी आई थी। असल मुद्दा यह है कि बड़े से बड़े क्राइम सुलझाने वाली पुलिस अब तक धमकी देने वालों के आसपास भी नहीं पहुंच पाई है। साइबर पुलिस थाने में काम करने वाले कम से कम अगर ये कोशिश करें तो धमकी देने वालों तक आसानी से पहुंच सकते हैं और आने वाले समय में इस तरह के डर को दूर किया जा सकता है।
हफ्ते की सबसे चौंकाने वाली खबर दुर्ग जिले के समोदा गांव से आई। यहां पुलिस ने अवैध अफीम की खेती का खुलासा किया। जांच में पता चला कि इस खेती का कनेक्शन राजस्थान से जुड़ा हुआ है। पूर्व भाजपा नेता विनायक ताम्रकार पर आरोप है कि उन्होंने करीब 6 एकड़ जमीन में अफीम की खेती करवाई थी।
तकनीकी जानकारी राजस्थान से मिली, मजदूर भी बहार से बुलाए गए और तैयार माल को राजस्थान में बेचने की योजना थी। पूरे खेत को तार से घेरा गया था और बाउंसर उसकी रखवाली कर रहे थे। मतलब खेती कम और हाई-सिक्योरिटी प्रोजेक्ट ज्यादा लग रहा था। वहीँ दो दिन बाद बलरामपुर जिले में अफीम की खेती पकड़ी गई।
यहां कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा तब सामने आया जब एक सरकारी गिरदावरी रिपोर्ट में उसी जमीन पर उग रही अफीम को “अन्य अनाज” लिख दिया गया।अब यह गलती थी या कृषि विज्ञान का कोई नया प्रयोग, यह जांच का विषय है। लेकिन राजनीति के लिए यह एक शानदार मुद्दा बन गया। मुद्दे पर कांग्रेस काफी आक्रामक रही। विधानसभा में भी और विधानसभा के बहार भी। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत तो यहां तक कह दिए कि-सरकार धान के कटोरे को अफीम का कटोरा बनाने पर तुली है।
एक और रिपोर्ट सामने आई जिसमें बताया गया कि छत्तीसगढ़ में पिछले चार सालों में करीब दो लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। सबसे ज्यादा कटाई हसदेव के जंगलों में हुई है, जहां कोयला खनन के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ हटाए गए। सरकार का तर्क है कि बिजली और उद्योगों के लिए कोयला जरूरी है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जंगल ही नहीं रहेंगे तो विकास किसके लिए होगा।
सबसे रोचक तथ्य यह सामने आया कि पेड़ काटने के बदले नए पेड़ लगाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं बताया गया। यानी प्रकृति की बैलेंस शीट में घाटा तो दर्ज हो गया, लेकिन जमा कॉलम अभी खाली है।
सप्ताह के आखिर में छत्तीसगढ़ विधानसभा का माहौल भी काफी गर्म रहा। एलपीजी गैस सिलेंडर की कमी को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने इस मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव लाकर चर्चा की मांग की। सत्ता पक्ष की ओर से अजय चंद्राकर ने कहा कि गैस की कीमत तय करना केंद्र सरकार का विषय है। विपक्ष ने कहा-जनता की परेशानी का विषय कौन तय करेगा? इसके बाद सदन में वही हुआ जो अक्सर होता है। शोर, नारे, तकरार…और अंत में कार्यवाही स्थगित। सवाल वहीं का वहीं रह गया, लेकिन बहस पूरी हो गई।
इस हफ्ते छत्तीसगढ़ की खबरों में पूरा लोकतांत्रिक स्पेक्ट्रम दिखाई दिया। बीयर से शुरू हुई चर्चा अफीम तक पहुंची। जंगल से विधानसभा तक बहस चली और अदालत से संसद तक सवाल उठे। इन सबके बीच एक बात साफ दिखती है। छत्तीसगढ़ में मुद्दों की कमी नहीं है और वे हमेशा ख़बरों में छाए रहते हैं। तो फिर मिलते हैं अगले सप्ताह नए मुद्दों और नई डायरी के साथ।
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बीयर का रैपर और सियासत का स्वाद
अब यह आरोप सही है या नहीं, यह जांच का विषय है। इस मामले में ज्यादा हो-हल्ला नहीं हुआ, क्योंकि इसके पीछे की कहानी सभी जानते हैं। आउटसोर्सिंग कंपनी के कर्मचारियों की यह कोई बड़ी हरकत नहीं है, वे इससे बड़े-बड़े कमल कर चुके हैं। शराब की कमाई में सभी लोग अपना हिस्सा लेने में लगे हैं। यही कारण रहा कि यह मुद्दा ज्यादा चल नहीं पाया, क्योंकि छोटे-छोटे मुद्दों के लिए विधानसभा में हंगामा हो जाता है, लेकिन इस पर किसी ने जवाब देना भी उचित नहीं समझा।
गायब होते बच्चे और फाइलों में मुस्कान
नाम बहुत सुंदर है-मुस्कान, लेकिन जिन परिवारों के बच्चे गायब हैं, उनके लिए यह शब्द अभी भी थोड़ा दूर का सपना है। रिपोर्ट आने के बाद सिस्टम की मशीनरी तुरंत सक्रिय होती है। बैठकें होती हैं, निर्देश जारी होते हैं, फाइलें चलती हैं। वहीँ आम आदमी सोचता है कि काश बच्चे भी इतनी तेजी से मिल जाते जितनी तेजी से फाइलें चलती हैं।
दरअसल मानव तस्करी छत्तीसगढ़ की पुरानी बीमारी है, जो वर्षों बाद भी ठीक नहीं हो रही है। इसके लिए जिम्मेदार शासन प्रशासन है जो देश में बरामद बच्चों से ना तो कोई क्लू हासिल कर पाते हैं और ना ही पुराने केस को फ़ॉलोअप कर पाते हैं, जिसके कारण अपराधी हमेशा गिरफ्त से बाहर ही रहता है। वहीँ बच्चे गायब होते रहते हैं।
ईमेल से आया बम
पहले धमकी चिट्ठियों में आती थी, अब इनबॉक्स में आती है। हाई कोर्ट को दस दिन में दूसरी बार बम से उड़ाने की धमकी मिली। उसी दिन लोअर कोर्ट में भी बम की धमकी आई थी। असल मुद्दा यह है कि बड़े से बड़े क्राइम सुलझाने वाली पुलिस अब तक धमकी देने वालों के आसपास भी नहीं पहुंच पाई है। साइबर पुलिस थाने में काम करने वाले कम से कम अगर ये कोशिश करें तो धमकी देने वालों तक आसानी से पहुंच सकते हैं और आने वाले समय में इस तरह के डर को दूर किया जा सकता है।
खेत में मक्का नहीं, अफीम
तकनीकी जानकारी राजस्थान से मिली, मजदूर भी बहार से बुलाए गए और तैयार माल को राजस्थान में बेचने की योजना थी। पूरे खेत को तार से घेरा गया था और बाउंसर उसकी रखवाली कर रहे थे। मतलब खेती कम और हाई-सिक्योरिटी प्रोजेक्ट ज्यादा लग रहा था। वहीँ दो दिन बाद बलरामपुर जिले में अफीम की खेती पकड़ी गई।
यहां कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा तब सामने आया जब एक सरकारी गिरदावरी रिपोर्ट में उसी जमीन पर उग रही अफीम को “अन्य अनाज” लिख दिया गया।अब यह गलती थी या कृषि विज्ञान का कोई नया प्रयोग, यह जांच का विषय है। लेकिन राजनीति के लिए यह एक शानदार मुद्दा बन गया। मुद्दे पर कांग्रेस काफी आक्रामक रही। विधानसभा में भी और विधानसभा के बहार भी। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत तो यहां तक कह दिए कि-सरकार धान के कटोरे को अफीम का कटोरा बनाने पर तुली है।
जंगल कटे, तर्क उगे
सबसे रोचक तथ्य यह सामने आया कि पेड़ काटने के बदले नए पेड़ लगाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं बताया गया। यानी प्रकृति की बैलेंस शीट में घाटा तो दर्ज हो गया, लेकिन जमा कॉलम अभी खाली है।
गैस सिलेंडर और लोकतंत्र
इस हफ्ते छत्तीसगढ़ की खबरों में पूरा लोकतांत्रिक स्पेक्ट्रम दिखाई दिया। बीयर से शुरू हुई चर्चा अफीम तक पहुंची। जंगल से विधानसभा तक बहस चली और अदालत से संसद तक सवाल उठे। इन सबके बीच एक बात साफ दिखती है। छत्तीसगढ़ में मुद्दों की कमी नहीं है और वे हमेशा ख़बरों में छाए रहते हैं। तो फिर मिलते हैं अगले सप्ताह नए मुद्दों और नई डायरी के साथ।
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