Gen-Z ने उड़ाई सियासत की नींद, साधने में जुटी संघ, सरकार और बीजेपी की टीम
Arun Tiwari | Aug 20, 2026, 15:34 IST
जेन-ज़ी-राजनीति-बीजेपी-आरएसएस-रणनीति
जंतर-मंतर से रांची तक जेन-जी के डिजिटल अभियानों ने सियासत की नींद उड़ा दी है। इस युवा पीढ़ी को साधने के लिए केंद्र सरकार, बीजेपी और आरएसएस ने अपनी रणनीतियों में बदलाव किया है।
RAIPUR : जंतर-मंतर से रांची तक GEN-Z के आंदोलनों ने सत्ता और संगठनों को एक बात साफ बता दी है कि आज का युवा सिर्फ भाषण सुनने वाला नहीं, सवाल पूछने वाला और सोशल मीडिया पर अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचाने वाला वर्ग है।
यही वजह है कि अब केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों तक इनसे संवाद करने की तैयारी में है, बीजेपी सोशल मीडिया रणनीति बदल रही है और आरएसएस युवाओं को अपने साथ जोड़ने का रोडमैप बना रहा है। यही नहीं छत्तीसगढ़ सरकार अफसरों की रैंकिंग तक सोशल मीडिया एक्टिविटी से जोड़ रही है।
कुछ साल पहले तक राजनीति में युवाओं की चर्चा का मतलब अक्सर रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और युवा मतदाताओं तक सीमित रहता था। अब तस्वीर बदल गई है। जेन-जी यानी इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हुई पीढ़ी राजनीतिक बहस को सिर्फ चुनाव के समय नहीं देखती। वह रोज सरकार, नेताओं और व्यवस्था को देखती है, सवाल करती है और पसंद या नापसंद का इजहार भी तुरंत कर देती है।
जंतर-मंतर से लेकर रांची तक हुए छात्र और युवा आंदोलनों ने इस बदलाव को और स्पष्ट कर दिया। आंदोलनों की पहुंच सिर्फ सड़क तक नहीं रही। उनकी तस्वीरें, वीडियो, पोस्ट, मीम और लाइव अपडेट कुछ ही समय में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचने लगे। यही नहीं जेन जी अपने दम पर फैसले करवा रही है और फैसले बदलवा रही है।
मामला केवल इतना नहीं है कि युवा किसी सरकार के पक्ष में हैं या विरोध में। असली चिंता यह है कि युवाओं का मूड बहुत तेजी से बदल सकता है और सोशल मीडिया उस मूड को आंदोलन में बदलने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि अब संघ,बीजेपी और सरकार इस पीढ़ी तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में युवाओं से सीधे संवाद की रणनीति पर चर्चा हुई। इसके तहत ‘एक दिन, एक विश्वविद्यालय’ जैसे अभियान का खाका तैयार किया गया है। इसमें केंद्रीय मंत्री अलग-अलग निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों का दौरा कर छात्रों से संवाद करेंगे। मकसद सिर्फ भाषण देना नहीं बताया गया है।
छात्रों की राय और उनके मुद्दे जानने पर भी जोर है। मंत्री युवाओं को यह बताने की कोशिश करेंगे कि सरकार के कार्यकाल में उनके लिए कौन-कौन से फैसले लिए गए, कौन-सी योजनाएं बनीं और उनका कितना असर हुआ।
यानी सरकार अब यह मानकर चल रही है कि युवाओं से संवाद का सबसे प्रभावी रास्ता उनके बीच जाकर बातचीत करना है। विश्वविद्यालय इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां बड़ी संख्या में जेन-जी और जेन-अल्फा से जुड़े युवा मौजूद हैं। यही युवा आगे नौकरी, शिक्षा, राजनीति, कारोबार और सामाजिक मुद्दों पर राय बनाने वाले हैं।
इस पूरी रणनीति का दूसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सोशल मीडिया है। कैबिनेट बैठक में मंत्रियों की सोशल मीडिया सक्रियता की रिपोर्ट भी पेश की गई। रिपोर्ट में इंस्टाग्राम समेत दूसरे प्लेटफॉर्म पर उनकी सक्रियता, पोस्ट का प्रदर्शन, लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स में हुई बढ़ोतरी जैसे पैमानों को आधार बनाया गया।
इसमें प्रधानमंत्री सोशल मीडिया सक्रियता में सबसे आगे रहे। उनके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और नितिन गडकरी का स्थान बताया गया। सहयोगी दलों में चिराग पासवान का प्रदर्शन बेहतर रहा।
इसका सीधा संदेश है कि अब नेता सिर्फ क्या बोलते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, वे कहां बोलते हैं और उनकी बात कितने युवाओं तक पहुंचती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। जेन-जी को साधने की राजनीति इसलिए पारंपरिक जनसभाओं से निकलकर इंस्टाग्राम, वीडियो, शॉर्ट कंटेंट और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच गई है।
जेन-जी के बढ़ते प्रभाव का असर सिर्फ दिल्ली की राजनीति तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी सरकारी अधिकारियों के कामकाज में सोशल मीडिया को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है। जिलों में अब तक प्रिंट मीडिया की खबरों पर ज्यादा निगरानी रहती थी। अब सोशल मीडिया पर आने वाली खबरों और विभागों की डिजिटल मौजूदगी को भी ट्रैक किया जाएगा।
सचिव और कलेक्टरों की रैंकिंग के लिए 100 अंकों की मार्किंग प्रणाली तय की गई है। इसमें 15 अंक प्रेस रिलीज, 15 अंक सक्सेस स्टोरी, 30 अंक सोशल मीडिया और सबसे ज्यादा 40 अंक एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर के लिए रखे गए हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर विभाग के खिलाफ कोई नकारात्मक खबर चलती है तो उसका जवाब भी तय समय में देना होगा। सोशल मीडिया की किसी गलत रिपोर्ट पर छह घंटे में जवाब देने की बात कही गई है।
प्रिंट मीडिया की नकारात्मक खबर का जवाब उसी दिन देना होगा। इससे साफ है कि सरकार के लिए सोशल मीडिया अब केवल सूचना देने का माध्यम नहीं रहा। यह प्रशासन की छवि, जवाबदेही और अफसरों के प्रदर्शन का हिस्सा बन रहा है।
दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी युवाओं पर विशेष फोकस कर रहा है। 19 से 21 अगस्त के बीच विशाखापत्तनम में हो रही अखिल भारतीय समन्वय बैठक में युवाओं को केंद्र में रखकर रोडमैप तैयार किए जाने की बात सामने आई है। बैठक में संघ के शीर्ष पदाधिकारियों के साथ भाजपा और एबीवीपी समेत 32 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
करीब 327 प्रतिनिधियों के आने की उम्मीद है। बैठक में युवा आंदोलनों, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं, रोजगार और स्वरोजगार जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। युवाओं को नशे से दूर रखने और संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को युवा-केंद्रित बनाने पर भी जोर है। संघ प्रमुख भी कह चुके हैं कि Gen z की बातों को सुनना होगा उनको समझना होगा। संघ (RSS) अपनी समन्वय बैठक जेन ज़ी को साधने के रोडमैप भी बना रहा है।
‘ज्वॉइन आरएसएस’ के जरिए जनवरी से जुलाई 2025 के बीच 55,423 लोगों ने जुड़ने के लिए पंजीकरण कराया था। 2026 की इसी अवधि में यह संख्या बढ़कर 1,23,287 हो गई। यानी करीब 2.2 गुना बढ़ोतरी।
जुलाई 2025 में 9,718 पंजीकरण हुए थे, जबकि जुलाई 2026 में यह संख्या 24,086 तक पहुंच गई। इनमें करीब 65 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम उम्र के बताए गए हैं। संघ के लिए यह आंकड़ा उत्साह बढ़ाने वाला है, लेकिन इसके साथ चुनौती भी है इस नए युवा वर्ग को समझना और उसके साथ संवाद बनाए रखना।
इसका सबसे बड़ा कारण है इस पीढ़ी का अलग तरीके से सोचने और प्रतिक्रिया देने का अंदाज है। जेन-जी किसी मुद्दे पर पहले से तय राजनीतिक खांचे में हमेशा फिट नहीं बैठती। एक मुद्दे पर सरकार का समर्थन करने वाला युवा दूसरे मुद्दे पर उसी सरकार से सवाल कर सकता है। वह किसी पार्टी का स्थायी समर्थक होने के बजाय मुद्दे के आधार पर प्रतिक्रिया दे सकता है।
एक युवा के हाथ में स्मार्टफोन है। उसके पास कैमरा है, इंटरनेट है और अपनी बात सीधे लाखों लोगों तक पहुंचाने का प्लेटफॉर्म है। उसे किसी अखबार या टीवी चैनल के अगले दिन का इंतजार नहीं करना पड़ता।
किसी कॉलेज में फीस, परीक्षा, नौकरी, भर्ती, पुलिस कार्रवाई या किसी सरकारी फैसले को लेकर असंतोष पैदा हुआ तो उसका वीडियो कुछ घंटों में वायरल हो सकता है। यही कारण है कि जेन-जी की नाराजगी को नजरअंदाज करना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मुश्किल है।
राजनीतिक दलों के लिए युवाओं का महत्व हमेशा रहा है। लेकिन आज जेन-जी को केवल वोट बैंक की तरह देखना शायद पर्याप्त नहीं है। यह वर्ग परिवार और दोस्तों की राजनीतिक राय को प्रभावित करता है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनाता है। किसी नेता की लोकप्रियता बढ़ा सकता है और किसी बयान को विवाद में भी बदल सकता है।
एक वीडियो, एक पोस्ट या एक हैशटैग किसी स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय बहस बना सकता है। यही कारण है कि सरकार, भाजपा और संघ तीनों अलग-अलग रास्तों से इसी वर्ग तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार विश्वविद्यालयों में जा रही है।
बीजेपी सोशल मीडिया और संगठनात्मक स्तर पर रणनीति बना रही है। संघ अपने शताब्दी वर्ष में युवाओं को कार्यक्रमों और संगठन से जोड़ने पर जोर दे रहा है। छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक स्तर पर सोशल मीडिया मॉनिटरिंग को मजबूत किया जा रहा है। इन सभी प्रयासों की दिशा अलग दिख सकती है, लेकिन लक्ष्य एक ही है, युवा जिस जगह मौजूद है, वहीं जाकर उससे संवाद करना।
हालांकि जेन-जी को साधने की कोई भी रणनीति सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रह सकती। इस पीढ़ी की सबसे बड़ी चिंता उसके भविष्य को लेकर है। नौकरी मिलेगी या नहीं? प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी?
पेपर लीक और भर्ती में देरी जैसी समस्याओं का क्या होगा? पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार कहां मिलेगा? महंगाई और प्रतियोगिता के बीच स्वतंत्र जीवन शुरू करना कितना आसान होगा? यही वे सवाल हैं जिन पर युवा सड़क पर भी उतर सकता है और सोशल मीडिया पर भी।
विश्वविद्यालयों में जाकर संवाद करने की रणनीति तभी सफल होगी जब बातचीत केवल सरकार की उपलब्धियां बताने तक सीमित न रहे, बल्कि युवाओं की शिकायतें भी सुनी जाएं। क्योंकि जेन-जी को सिर्फ ‘साधना’ शायद आसान नहीं है। उसे समझना ज्यादा जरूरी है।
जंतर मंतर और रांची के आंदोलनों ने जो संकेत दिए हैं, उसके बाद सत्ता और राजनीतिक संगठनों ने शायद यह समझ लिया है कि आने वाले वर्षों की राजनीति का बड़ा हिस्सा डिजिटल और युवा केंद्रित होगा। जिस पीढ़ी ने टीवी से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन पर दुनिया देखी है, उसे पुराने राजनीतिक तरीकों से प्रभावित करना आसान नहीं होगा।
वह सवाल पूछेगी, जवाब मांगेगी, तुलना करेगी और अगर जवाब पसंद नहीं आया तो उसे सार्वजनिक भी करेगी। इसीलिए आज जेन-जी पर सरकार की नजर है, राजनीतिक दलों की नजर है, संघ की नजर है और प्रशासन भी उसके डिजिटल व्यवहार को समझने की कोशिश कर रहा है। जेन-जी ने सबकी नींद इसलिए नहीं उड़ाई है कि वह सिर्फ विरोध करती है।
उसकी असली ताकत यह है कि वह चुप नहीं रहती। और राजनीति में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर उस आवाज से होती है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि आज जेन-जी केवल एक उम्र-समूह नहीं रही। वह सत्ता और राजनीति के लिए एक संकेत बन चुकी है। युवाओं से संवाद करो, उन्हें सुनो और उनकी भाषा में बात करो, क्योंकि आने वाले समय का राजनीतिक एजेंडा काफी हद तक वही तय करने वाले हैं।
जेन-जी प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया से तय होगा सीजी अफसरों का रिपोर्ट कार्ड
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यही वजह है कि अब केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों तक इनसे संवाद करने की तैयारी में है, बीजेपी सोशल मीडिया रणनीति बदल रही है और आरएसएस युवाओं को अपने साथ जोड़ने का रोडमैप बना रहा है। यही नहीं छत्तीसगढ़ सरकार अफसरों की रैंकिंग तक सोशल मीडिया एक्टिविटी से जोड़ रही है।
जेन-जी अचानक इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई:
जंतर-मंतर से लेकर रांची तक हुए छात्र और युवा आंदोलनों ने इस बदलाव को और स्पष्ट कर दिया। आंदोलनों की पहुंच सिर्फ सड़क तक नहीं रही। उनकी तस्वीरें, वीडियो, पोस्ट, मीम और लाइव अपडेट कुछ ही समय में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचने लगे। यही नहीं जेन जी अपने दम पर फैसले करवा रही है और फैसले बदलवा रही है।
मामला केवल इतना नहीं है कि युवा किसी सरकार के पक्ष में हैं या विरोध में। असली चिंता यह है कि युवाओं का मूड बहुत तेजी से बदल सकता है और सोशल मीडिया उस मूड को आंदोलन में बदलने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि अब संघ,बीजेपी और सरकार इस पीढ़ी तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
मोदी सरकार ने बनाया ‘एक दिन, एक विश्वविद्यालय’ का प्लान:
छात्रों की राय और उनके मुद्दे जानने पर भी जोर है। मंत्री युवाओं को यह बताने की कोशिश करेंगे कि सरकार के कार्यकाल में उनके लिए कौन-कौन से फैसले लिए गए, कौन-सी योजनाएं बनीं और उनका कितना असर हुआ।
यानी सरकार अब यह मानकर चल रही है कि युवाओं से संवाद का सबसे प्रभावी रास्ता उनके बीच जाकर बातचीत करना है। विश्वविद्यालय इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां बड़ी संख्या में जेन-जी और जेन-अल्फा से जुड़े युवा मौजूद हैं। यही युवा आगे नौकरी, शिक्षा, राजनीति, कारोबार और सामाजिक मुद्दों पर राय बनाने वाले हैं।
सोशल मीडिया अब सिर्फ प्रचार नहीं,राजनीतिक मोर्चा भी:
इसमें प्रधानमंत्री सोशल मीडिया सक्रियता में सबसे आगे रहे। उनके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और नितिन गडकरी का स्थान बताया गया। सहयोगी दलों में चिराग पासवान का प्रदर्शन बेहतर रहा।
इसका सीधा संदेश है कि अब नेता सिर्फ क्या बोलते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, वे कहां बोलते हैं और उनकी बात कितने युवाओं तक पहुंचती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। जेन-जी को साधने की राजनीति इसलिए पारंपरिक जनसभाओं से निकलकर इंस्टाग्राम, वीडियो, शॉर्ट कंटेंट और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच गई है।
छत्तीसगढ़ में भी बदला सरकारी सिस्टम:
सचिव और कलेक्टरों की रैंकिंग के लिए 100 अंकों की मार्किंग प्रणाली तय की गई है। इसमें 15 अंक प्रेस रिलीज, 15 अंक सक्सेस स्टोरी, 30 अंक सोशल मीडिया और सबसे ज्यादा 40 अंक एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर के लिए रखे गए हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर विभाग के खिलाफ कोई नकारात्मक खबर चलती है तो उसका जवाब भी तय समय में देना होगा। सोशल मीडिया की किसी गलत रिपोर्ट पर छह घंटे में जवाब देने की बात कही गई है।
प्रिंट मीडिया की नकारात्मक खबर का जवाब उसी दिन देना होगा। इससे साफ है कि सरकार के लिए सोशल मीडिया अब केवल सूचना देने का माध्यम नहीं रहा। यह प्रशासन की छवि, जवाबदेही और अफसरों के प्रदर्शन का हिस्सा बन रहा है।
संघ भी युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने में जुटा:
करीब 327 प्रतिनिधियों के आने की उम्मीद है। बैठक में युवा आंदोलनों, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं, रोजगार और स्वरोजगार जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। युवाओं को नशे से दूर रखने और संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को युवा-केंद्रित बनाने पर भी जोर है। संघ प्रमुख भी कह चुके हैं कि Gen z की बातों को सुनना होगा उनको समझना होगा। संघ (RSS) अपनी समन्वय बैठक जेन ज़ी को साधने के रोडमैप भी बना रहा है।
संघ से युवाओं को जोड़ने की रणनीति:
जुलाई 2025 में 9,718 पंजीकरण हुए थे, जबकि जुलाई 2026 में यह संख्या 24,086 तक पहुंच गई। इनमें करीब 65 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम उम्र के बताए गए हैं। संघ के लिए यह आंकड़ा उत्साह बढ़ाने वाला है, लेकिन इसके साथ चुनौती भी है इस नए युवा वर्ग को समझना और उसके साथ संवाद बनाए रखना।
आखिर जेन-जी से इतनी बेचैनी क्यों:
दूसरी खासियत है इसकी डिजिटल ताकत:
किसी कॉलेज में फीस, परीक्षा, नौकरी, भर्ती, पुलिस कार्रवाई या किसी सरकारी फैसले को लेकर असंतोष पैदा हुआ तो उसका वीडियो कुछ घंटों में वायरल हो सकता है। यही कारण है कि जेन-जी की नाराजगी को नजरअंदाज करना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मुश्किल है।
जेन-जी सिर्फ वोट बैंक नहीं, ‘मूड मेकर’ भी है:
एक वीडियो, एक पोस्ट या एक हैशटैग किसी स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय बहस बना सकता है। यही कारण है कि सरकार, भाजपा और संघ तीनों अलग-अलग रास्तों से इसी वर्ग तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार विश्वविद्यालयों में जा रही है।
बीजेपी सोशल मीडिया और संगठनात्मक स्तर पर रणनीति बना रही है। संघ अपने शताब्दी वर्ष में युवाओं को कार्यक्रमों और संगठन से जोड़ने पर जोर दे रहा है। छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक स्तर पर सोशल मीडिया मॉनिटरिंग को मजबूत किया जा रहा है। इन सभी प्रयासों की दिशा अलग दिख सकती है, लेकिन लक्ष्य एक ही है, युवा जिस जगह मौजूद है, वहीं जाकर उससे संवाद करना।
असली सवाल रोजगार और भविष्य का:
पेपर लीक और भर्ती में देरी जैसी समस्याओं का क्या होगा? पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार कहां मिलेगा? महंगाई और प्रतियोगिता के बीच स्वतंत्र जीवन शुरू करना कितना आसान होगा? यही वे सवाल हैं जिन पर युवा सड़क पर भी उतर सकता है और सोशल मीडिया पर भी।
मंत्रियों का जेनज़ी से संवाद:
आने वाले समय की राजनीति में जेन-जी तय करेगी एजेंडा:
वह सवाल पूछेगी, जवाब मांगेगी, तुलना करेगी और अगर जवाब पसंद नहीं आया तो उसे सार्वजनिक भी करेगी। इसीलिए आज जेन-जी पर सरकार की नजर है, राजनीतिक दलों की नजर है, संघ की नजर है और प्रशासन भी उसके डिजिटल व्यवहार को समझने की कोशिश कर रहा है। जेन-जी ने सबकी नींद इसलिए नहीं उड़ाई है कि वह सिर्फ विरोध करती है।
उसकी असली ताकत यह है कि वह चुप नहीं रहती। और राजनीति में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर उस आवाज से होती है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि आज जेन-जी केवल एक उम्र-समूह नहीं रही। वह सत्ता और राजनीति के लिए एक संकेत बन चुकी है। युवाओं से संवाद करो, उन्हें सुनो और उनकी भाषा में बात करो, क्योंकि आने वाले समय का राजनीतिक एजेंडा काफी हद तक वही तय करने वाले हैं।
FAQ
- 'एक दिन, एक विश्वविद्यालय' अभियान किस मंत्रालय/सरकार की रणनीति का हिस्सा है?
उत्तर: केंद्र (मोदी) सरकार। इसका उद्देश्य केंद्रीय मंत्रियों द्वारा निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों में जाकर जेन-जी (Gen Z) युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करना है। - छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा अधिकारियों के कामकाज के आंकलन (मार्किंग) के लिए कितने अंकों का सिस्टम तय किया गया है?
उत्तर: 100 अंक। (अंक विभाजन: ATR - 40 अंक, सोशल मीडिया - 30 अंक, प्रेस रिलीज - 15 अंक, सक्सेस स्टोरी - 15 अंक)। - जॉइन आरएसएस' (Join RSS) डिजिटल प्लेटफॉर्म के आंकड़ों के अनुसार संघ से जुड़ने वाले युवाओं की भागीदारी में क्या रुझान देखा गया है?
उत्तर: पंजीकरण में बढ़ोतरी: जनवरी से जुलाई 2025 के दौरान जहां 55,423 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, वहीं वर्ष 2026 की इसी अवधि में यह संख्या बढ़कर 1,23,287 हो गई (लगभग 2.2 गुना वृद्धि)। युवाओं की हिस्सेदारी: संगठन से जुड़ने के लिए डिजिटल रजिस्ट्रेशन कराने वाले कुल लोगों में से लगभग 65 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम उम्र के (युवा/Gen Z) हैं।
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