विक्रमादित्य की प्रार्थना पर डोंगरगढ़ में विराजीं मां बमलेश्वरी, मोदी भी टेक चुके हैं मत्था, नंगे पैर आते हैं दिग्विजय
Arun Tiwari | Mar 26, 2026, 17:41 IST
Maa Bamleshwari CG Dongargarh King Vikramaditya and pm modi prayers
छत्तीसगढ़ के डोगरगढ़ में मां बमलेश्वरी का मंदिर है। इस मंदिर की ऐतहासिक और पौराणिक मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि यहां आने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। उज्जैयनी के राजा विक्रमादित्य को माता ने दर्शन दिए थे।
RAIPUR : छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में मां बमलेश्वरी का मंदिर है। कहा जाता है कि यहां पर जो भी श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से जो मुराद मांगता है वो पूरी होती है। मां निसंतानों को संतान प्रदान करती है। मां बमलेश्वरी उज्जैनी के राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी रही हैं। माता ने विक्रमादित्य के तप से प्रसन्न होकर उनको दर्शन भी दिए थे। इस मंदिर का सियासतदारों से भी खास रिश्ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मां बमलेश्वरी के दरबार में मत्था टेक चुके हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इस मंदिर में नंगे पांव आते हैं।
छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में जिला मुख्यालय से करीब 38 किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ियों पर मां बम्लेश्वरी का भव्य मंदिर स्थित है। यहां मां के दो मंदिर हैं एक ऊंची पहाड़ी पर और दूसरा नीचे प्रवेश द्वार के पास। स्थानीय लोग नीचे वाले मंदिर में विराजित माता को छोटी बम्लाई और पहाड़ी पर स्थित मंदिर को बड़ी बम्लाई के नाम से जानते हैं।
ऊपर पहाड़ी वाले मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब एक हजार से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। हालांकि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहां रोपवे की भी व्यवस्था की गई है। खास बात यह है कि पहाड़ी वाले मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर प्राकृतिक गुफाएं मौजूद हैं। जो इस स्थल को और भी रहस्यमयी बनाती हैं।
कहानी के अनुसार लगभग ढाई हजार वर्ष पहले इस क्षेत्र को कामाख्या नगरी कहा जाता था। जहां राजा वीरसेन का शासन था। संतान न होने के कारण उन्होंने भगवान शिव और मां दुर्गा की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम मदनसेन रखा गया। मां दुर्गा के परम भक्त राजा वीरसेन ने इस स्थान पर मां बम्लेश्वरी का मंदिर बनवाया। बाद में उनके वंश में राजा कामसेन ने राज किया।
उनके दरबार में कामकंदला नाम की नृत्यांगना और माधवनल नाम के प्रसिद्ध गायक के बीच गहरा प्रेम था। परिस्थितियों के चलते माधवनल को कामाख्या नगरी छोड़नी पड़ी और वह राजा विक्रमादित्य के पास उज्जैन पहुंचा। उसकी प्रेम कथा सुनकर विक्रमादित्य ने कामाख्या नगरी पर आक्रमण कर दिया।
भीषण युद्ध में कामसेन पराजित हुए और पूरा नगर नष्ट हो गया लेकिन पहाड़ी और मां का मंदिर सुरक्षित रहा। युद्ध के बाद विक्रमादित्य ने माधवनल और कामकंदला के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए यह अफवाह फैलाई कि माधवनल युद्ध में मारे गए। यह सुनकर कामकंदला ने मंदिर के पास स्थित एक तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए। जब माधवनल को यह खबर मिली तो उसने भी अपने जीवन का अंत कर लिया।
इस दुखद घटना से व्यथित होकर राजा विक्रमादित्य ने मां बगलामुखी की कठोर साधना की। जब माता ने दर्शन नहीं दिए तो वे भी अपने प्राण त्यागने को तैयार हो गए। उसी समय मां बगलामुखी प्रकट हुईं। राजा ने वरदान में माधवनल और कामकंदला को पुनर्जीवन देने और माता से यहीं निवास करने की प्रार्थना की।
माना जाता है कि मां बगलामुखी ने इसी स्थान को अपना निवास बनाया और समय के साथ उनका नाम बम्लेश्वरी पड़ गया। आज भी यह मंदिर न सिर्फ श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि प्रेम, त्याग और आस्था की इस अनोखी कथा को अपने भीतर समेटे हुए है। पहाड़ों की ऊंचाई, गुफाओं की रहस्यमयता और सदियों पुरानी मान्यताएं इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान दिलाती हैं।
दो साल पहले विधानसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डोंगरगढ़ पहुंचे। यहां उन्होंने प्रसिद्ध मां बम्लेश्वरी मंदिर (Maa Bamleshwari temple)में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। यह दौरा प्रधानमंत्री का निजी कार्यक्रम था। बम्लेश्वरी मंदिर में पंडितों ने मंत्रोच्चार के साथ विशेष पूजा कराई। सुरक्षा कारणों से आम लोगों की एंट्री पूरी तरह प्रतिबंधित रही। मंदिर परिसर में करीब एक घंटे तक रहने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने सीढ़ियों पर खड़े होकर श्रद्धालुओं का अभिवादन भी किया।
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की भी मां बमलेश्वरी में गहरी आस्था है। वे अक्सर माता के दर्शन करने के लिए डोंगरगढ़ आते रहे हैं। दिग्विजय माता के दर्शन के लिए कई बार नंगे पैर भी मंदिर में पहुंचे हैं। वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जब एक ही राज्य था तब से मां बमलेश्वरी के दर्शन के लिए अक्सर डोंगरगढ़ आते थे। दिग्विजय सिंह के अलावा देश के कई राजनीतिज्ञ यहां माता का आशीर्वाद लेने आते रहते हैं।
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रहस्यमयी है मां बम्लेश्वरी मंदिर :
ऊपर पहाड़ी वाले मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब एक हजार से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। हालांकि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहां रोपवे की भी व्यवस्था की गई है। खास बात यह है कि पहाड़ी वाले मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर प्राकृतिक गुफाएं मौजूद हैं। जो इस स्थल को और भी रहस्यमयी बनाती हैं।
मां बमलेश्वरी की रोचक कथा :
उनके दरबार में कामकंदला नाम की नृत्यांगना और माधवनल नाम के प्रसिद्ध गायक के बीच गहरा प्रेम था। परिस्थितियों के चलते माधवनल को कामाख्या नगरी छोड़नी पड़ी और वह राजा विक्रमादित्य के पास उज्जैन पहुंचा। उसकी प्रेम कथा सुनकर विक्रमादित्य ने कामाख्या नगरी पर आक्रमण कर दिया।
भीषण युद्ध में कामसेन पराजित हुए और पूरा नगर नष्ट हो गया लेकिन पहाड़ी और मां का मंदिर सुरक्षित रहा। युद्ध के बाद विक्रमादित्य ने माधवनल और कामकंदला के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए यह अफवाह फैलाई कि माधवनल युद्ध में मारे गए। यह सुनकर कामकंदला ने मंदिर के पास स्थित एक तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए। जब माधवनल को यह खबर मिली तो उसने भी अपने जीवन का अंत कर लिया।
विक्रमादित्य का पश्चाताप :
माना जाता है कि मां बगलामुखी ने इसी स्थान को अपना निवास बनाया और समय के साथ उनका नाम बम्लेश्वरी पड़ गया। आज भी यह मंदिर न सिर्फ श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि प्रेम, त्याग और आस्था की इस अनोखी कथा को अपने भीतर समेटे हुए है। पहाड़ों की ऊंचाई, गुफाओं की रहस्यमयता और सदियों पुरानी मान्यताएं इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान दिलाती हैं।
मोदी भी टेक चुके हैं मत्था :
नंगे पैर आते हैं दिग्वजय :
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