महाराष्ट्र बिजली कंपनी को रायगढ़ के दलालों ने लगाया 100 करोड़ का चूना, बेच दी फॉरेस्ट की जमीन
Arun Tiwari | May 28, 2026, 14:58 IST
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रायगढ़ में महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी के साथ करीब 100 करोड़ की जमीन धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि भूमाफिया, दलालों और राजस्व-वन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से फॉरेस्ट की 500 एकड़ जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कर कंपनी को बेच दी गई।
Raipur. छत्तीसगढ़ के भू माफिया और दलालों ने महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी को 100 करोड़ का चूना लगा दिया। महाराष्ट्र की बिजली कंपनी महाजेनको को रायगढ़ के दलालों ने फॉरेस्ट की 500 एकड़ जमीन बेच दी। यह जमीन छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सीमा से लगी, वो जमीन है जिसका कोई राजस्व रिकॉर्ड नहीं है।
यह जंगल की जमीन है और यहां पर सैकड़ों सालों से आदिवासी रहते आ रहे हैं। दलालों ने तहसीलदार,वन अधिकारी और पटवारी से सांठगांठ कर महाजेनको को 100 करोड़ में यह जमीन बेच दी।
इस जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कर दी गई। सालों से ये सिंडिकेट कैंपा के पैसे की भी बंदरबांट कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने अब 100 करोड़ के इस घोटाले की जांच बैठाई है।
यह पूरा घोटाला 100 करोड़ की 500 एकड़ जमीन से जुड़ा है। यह जमीन महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी महाजेनको ने रायगढ़ जिले में खरीदी है। महाजेनको को रायगढ़ जिले के गारे पेलमा में कोल ब्लॉक आवंटित हुआ है।
इसकी एमडीओ अडानी कंपनी है। इस कोल ब्लॉक की ऐवज में बिजली कंपनी ने पेड़ लगाने के लिए 500 एकड़ जमीन खरीदी। छत्तीसगढ़ के दलालों और भूमाफिया ने राजस्व और वन अधिकारियों से सांठ गांठ कर महाजेनको को 100 करोड़ का चूना लगा दिया।
इन लोगों ने बिजली कंपनी को उस जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कर दी जो फॉरेस्ट की जमीन है और इस पर सालों से आदिवासी रहते आ रहे हैं।
छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला उड़ीसा की सीमा से लगा हुआ है। यहां के 10-12 गांव जो 10 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर बसे हुए हैं, वे न तो छत्तीसगढ़ में आते हैं और न ही उड़ीसा में। सरकारी रिकॉर्ड में इनको मसाहती गांव घोषित किया हुआ है इसलिए इनका कोई राजस्व रिकॉर्ड नहीं है।
यहां पर सालों से आदिवासी लोग रहते हैं जो वहीं पर खेती कर अपना जीवन यापन करते हैं। भूमाफिया और दलालों ने इसी 500 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री महाजेनको को कर दी। इस फर्जी रजिस्ट्री में पटवारी से लेकर तहसीलदार और वन अधिकारी का सिंडीकेट शामिल है।
हैरानी की बात ये है कि पटवारी, तहसीलदार और वन अधिकारियों ने यह लिखकर भी दे दिया कि वे भौतिक रुप से यह जमीन देखकर आए हैं। यानी जो जमीन है ही नहीं उसका भौतिक सत्यापन हो गया और उसकी रजिस्ट्री भी कर दी गई। जाहिर है जमीन के इन 100 करोड़ की बंदरबांट इन सबके बीच में हो गई।
इस घोटाले की पूरी स्क्रिप्ट तैयार की गई। पर्यावरण मंजूरी के लिए लगने वाली जमीन की तलाश कर रहे महाजेनको के अधिकारियों की मुलाकात इन दलालों से कराई गई। इन्होंने ही कंपनी के लिए कंसल्टेंट नियुक्त किया। इस कंसल्टेंट ने उन अखबारों में जमीन संबंधी विज्ञापन छपवाए जिनका सुर्कलेशन जीरो है।
विज्ञापन के बाद जिन एजेंसियों ने अपनी रुचि दिखाई वे इन दलालों की ही फर्जी एजेंसी थीं। महाजेनको ने 11 सेल कंपनियों से 100 करोड़ में 500 एकड़ जमीन खरीदी। इस पूरे गड़बड़ घोटाले में महाजेनको के अधिकारी, छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग के पटवारी,तहसीलदार, एसडीएम और डीएफओ शामिल हैं।
इस पूरे मामले में सवाल यह भी है कि आखिर यहां के लिए आ रहा कैंपा का पैसा कहां जा रहा है। जब किसी सड़क, खदान, बांध, रेलवे, उद्योग या दूसरी परियोजना के लिए जंगल की जमीन का उपयोग किया जाता है, तब जितना वन क्षेत्र प्रभावित होता है, उसकी भरपाई के लिए परियोजना एजेंसी से एक राशि ली जाती है।
यही पैसा कैंपा फंड में जमा होता है। कैंपा का उद्देश्य जंगलों की क्षति की भरपाई करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। इसके तहत कई काम किए जाते हैं। जैसे पौधारोपण करना, कटे हुए जंगलों की भरपाई करना, वन्यजीव संरक्षण, जंगलों में जल संरक्षण और मिट्टी संरक्षण कार्य, वन क्षेत्रों में सड़क, चौकी, फेंसिंग जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना और स्थानीय वनवासियों और ग्रामीणों से जुड़े संरक्षण कार्य करना।
इसके लिए कंपनी से हर साल करोड़ों रुपए का फंड आता है। अब यह पैसा कहां जा रहा है यह किसी को पता नहीं है। जाहिर है इस फंड की भी बंदरबांट हो रही है।
यहा पूरा मामला हाल ही में सामने आया है जब महाराष्ट्र सरकार ने इसकी जांच बैठाई है। महाराष्ट्र सरकार के इंडस्ट्री एवं एनर्जी डिपार्टमेंट ने बिजली कंपनी के एमडी को ऑर्डर जारी कर इस पूरे घोटाले की जांच करने को कहा है।
छत्तीसगढ़ के विसिल ब्लोअर नरेश गुप्ता ने इस पूरे मामले की शिकायत प्रधानमंत्री ऑफिस से की। पीएमओ ने महाराष्ट्र सरकार को इस मामले की जांच कराने के निर्देश दिए हैं।
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यह जंगल की जमीन है और यहां पर सैकड़ों सालों से आदिवासी रहते आ रहे हैं। दलालों ने तहसीलदार,वन अधिकारी और पटवारी से सांठगांठ कर महाजेनको को 100 करोड़ में यह जमीन बेच दी।
इस जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कर दी गई। सालों से ये सिंडिकेट कैंपा के पैसे की भी बंदरबांट कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने अब 100 करोड़ के इस घोटाले की जांच बैठाई है।
छत्तीसगढ़ में मिला महाराष्ट्र को धोखा :
इसकी एमडीओ अडानी कंपनी है। इस कोल ब्लॉक की ऐवज में बिजली कंपनी ने पेड़ लगाने के लिए 500 एकड़ जमीन खरीदी। छत्तीसगढ़ के दलालों और भूमाफिया ने राजस्व और वन अधिकारियों से सांठ गांठ कर महाजेनको को 100 करोड़ का चूना लगा दिया।
इन लोगों ने बिजली कंपनी को उस जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कर दी जो फॉरेस्ट की जमीन है और इस पर सालों से आदिवासी रहते आ रहे हैं।
आदिवासियों की जमीन की फर्जी रजिस्ट्री :
यहां पर सालों से आदिवासी लोग रहते हैं जो वहीं पर खेती कर अपना जीवन यापन करते हैं। भूमाफिया और दलालों ने इसी 500 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री महाजेनको को कर दी। इस फर्जी रजिस्ट्री में पटवारी से लेकर तहसीलदार और वन अधिकारी का सिंडीकेट शामिल है।
हैरानी की बात ये है कि पटवारी, तहसीलदार और वन अधिकारियों ने यह लिखकर भी दे दिया कि वे भौतिक रुप से यह जमीन देखकर आए हैं। यानी जो जमीन है ही नहीं उसका भौतिक सत्यापन हो गया और उसकी रजिस्ट्री भी कर दी गई। जाहिर है जमीन के इन 100 करोड़ की बंदरबांट इन सबके बीच में हो गई।
ऐसे अखबारों में विज्ञापन जिनका जीरो सर्कुलेशन :
विज्ञापन के बाद जिन एजेंसियों ने अपनी रुचि दिखाई वे इन दलालों की ही फर्जी एजेंसी थीं। महाजेनको ने 11 सेल कंपनियों से 100 करोड़ में 500 एकड़ जमीन खरीदी। इस पूरे गड़बड़ घोटाले में महाजेनको के अधिकारी, छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग के पटवारी,तहसीलदार, एसडीएम और डीएफओ शामिल हैं।
कहां जा रहा है कैंपा का पैसा :
यही पैसा कैंपा फंड में जमा होता है। कैंपा का उद्देश्य जंगलों की क्षति की भरपाई करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। इसके तहत कई काम किए जाते हैं। जैसे पौधारोपण करना, कटे हुए जंगलों की भरपाई करना, वन्यजीव संरक्षण, जंगलों में जल संरक्षण और मिट्टी संरक्षण कार्य, वन क्षेत्रों में सड़क, चौकी, फेंसिंग जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना और स्थानीय वनवासियों और ग्रामीणों से जुड़े संरक्षण कार्य करना।
इसके लिए कंपनी से हर साल करोड़ों रुपए का फंड आता है। अब यह पैसा कहां जा रहा है यह किसी को पता नहीं है। जाहिर है इस फंड की भी बंदरबांट हो रही है।
महाराष्ट्र सरकार ने बैठाई जांच :
छत्तीसगढ़ के विसिल ब्लोअर नरेश गुप्ता ने इस पूरे मामले की शिकायत प्रधानमंत्री ऑफिस से की। पीएमओ ने महाराष्ट्र सरकार को इस मामले की जांच कराने के निर्देश दिए हैं।
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