भोपाल मेट्रो में 20 प्रतिशत काम पूरा, सांसद को याद आई अंडरग्राउंड मेट्रो

Ramanand Tiwari | Jan 23, 2026, 23:53 IST
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bhopal metro
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भोपाल मेट्रो परियोजना का 20% काम पूरा हो चुका है। अब मेट्रो के रूट को लेकर सियासत तेज हो गई है। सांसद आलोक शर्मा और विधायक भगवानदास सबनानी ने अंडरग्राउंड मेट्रो की मांग की है।

News in Short

  • भोपाल मेट्रो का 20% काम पूरा, अनुमानित लागत 7,500 करोड़।
  • सांसद आलोक शर्मा ने अब अंडरग्राउंड मेट्रो की मांग की।
  • विधायक भगवान दास सबनानी ने मेट्रो के एलिवेटेड प्लान पर सवाल उठाए।
  • मेट्रो अधिकारियों का कहना है कि रूट में बदलाव से 4 साल की देरी हो सकती है।
  • कांग्रेस ने भाजपा पर विकास में गंभीरता की कमी का आरोप लगाया।

News in Detail

भोपाल में करीब 7,500 करोड़ की मेट्रो परियोजना पर अब सियासत तेज हो गई है। काम शुरू हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है, 20% निर्माण भी पूरा हो गया। अब जाकर सांसद आलोक शर्मा को डीपीआर, रूट और अंडरग्राउंड मेट्रो याद आ रही है। यही सवाल अब सियासी बहस के केंद्र में है। अब तक सरकार क्यों सोती रही?

जब मौका था, तब आपत्ति क्यों नहीं?

भोपाल मेट्रो का डीपीआर, सर्वे और रूट चयन 2015 से 2018 के बीच हुआ। उस समय भाजपा की ही सरकार थी। आलोक शर्मा भोपाल के महापौर थे। स्टेकहोल्डर मीटिंग हुई। जनप्रतिनिधियों से सुझाव लिए गए सवाल यह है कि तब आपत्ति क्यों नहीं आई?

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स्टेकहोल्डर मीटिंग में क्या होता है?

ट्रैफिक, सुरक्षा, भविष्य की परेशानी सहमति बनने के बाद ही डीपीआर बनती है। फिर राज्य सरकार की अनुशंसा पर प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाता है।

भोपाल मेट्रो की जमीनी हकीकत

भोपाल मेट्रो का काम इस समय कछुआ चाल से चल रहा है।
रत्नागिरी से भदभदा रूट 20% काम पूरा ।
टेंडर – 14 दिसंबर 2024 कुल लागत एक हजार करोड़।
अब तक खर्च- 100–150 करोड़।
समयसीमा- 2027, लेकिन रफ्तार बेहद धीमी।

मेट्रो आधी बन गई तब आई याद

भारत माता चौराहे से लिली टॉकीज तक मेट्रो रूट को लेकर सांसद आलोक शर्मा ने अब अंडरग्राउंड मेट्रो की मांग कर दी है। उनका तर्क है कि राजभवन, न्यू मार्केट, सीएम हाउस, लाल परेड ग्राउंड जैसे वीआईपी इलाकों पर असर पड़ेगा।

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विधायक भगवान दास सबनानी का पक्ष

भोपाल उत्तर विधायक भगवान दास सबनानी ने मेट्रो के अंडरग्राउंड बनाम एलिवेटेड विवाद पर कहा कि भोपाल का मार्केट क्षेत्र घना है और सड़कें संकरी हैं। ऐसे में मेट्रो की योजना पहले और गंभीरता से बनानी चाहिए थी।

अंडरग्राउंड मेट्रो का विकल्प शुरुआत में ही सोचना चाहिए था। विधायक सबनानी ने कहा कि उन्हें एक बैठक में जरूर बुलाया गया था, जिसमें प्रभारी मंत्री भी मौजूद थे। इसके बाद कोई ठोस चर्चा नहीं हुई। विधायक बनने के बाद से उन्हें फिर कभी स्टेकहोल्डर बैठक या प्लानिंग मीटिंग में नहीं बुलाया गया।

डिपो चौराहे पर हुए भूमिपूजन पर आपत्ति जताते हुए विधायक ने कहा, मेट्रो से जुड़े लोगों ने बिना जानकारी दिए भूमिपूजन किया। जब उन्होंने सवाल उठाया कि जनप्रतिनिधियों को क्यों नहीं बुलाया गया, तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। उन्होंने यह भी कहा कि, जब मेट्रो प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया, तब जनप्रतिनिधियों से राय ली गई या नहीं, उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।

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सरकार को विचार करना चाहिए

इंदौर का उदाहरण देते हुए विधायक सबनानी ने कहा कि जब इंदौर में जनता की भावनाओं को देखते हुए मेट्रो को अंडरग्राउंड किया जा सकता है, तो भोपाल में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? सरकार को इस पर खुले मन से विचार करना चाहिए।

मेट्रो प्रबंधन का साफ जवाब

मेट्रो अधिकारियों का कहना है कि यह रूट ब्लू लाइन का हिस्सा है। 2018 में केंद्र सरकार से मंजूरी मिल चुकी है प्रोजेक्ट नोटिफाइड है। अब रूट बदला तो 4 साल और देरी तय यानी 2028 में भी मेट्रो अधर में लटक सकती है।

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अंडरग्राउंड मेट्रो का असली खर्च

वायाडक्ट + 1 स्टेशन 100 करोड़ (औसत) पूरा मौजूदा पैकेज 1000 करोड़
अंडरग्राउंड में सिर्फ 1 स्टेशन।
300–350 करोड़।
यानी जनता के पैसे पर भारी बोझ। राजनीति या विकास?

मेट्रो अधिकारियों का दावा है

जब डीपीआर बनी, तब सभी जनप्रतिनिधि बैठक में थे। अब अंडरग्राउंड की मांग बेबुनियाद और राजनीतिक लगती है।
सवाल यह भी है। क्या यह मुद्दा वोट बैंक के लिए उठाया गया है?

कांग्रेस का तीखा पलटवार

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सांसद आलोक शर्मा पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा भाजपा के किसी नेता को गंभीरता ही नहीं है। सत्ता का नशा बोल रहा है। जनता के खून-पसीने के पैसे की कद्र नहीं है। भाजपा नेताओं को विकास की गंभीरता ही नहीं है। टेक्निकल लोग तय करते हैं कि कितना खर्च होगा और कितना बचेगा। योजना उसी आधार पर बनती है। जिसे समझ होगी, वही बोलेगा।

मुख्य फैक्ट्स...

मेट्रो डीपीआर मंजूरी-2018, काम शुरू-दिसंबर 2024, अब तक प्रगति-15-20%।
अनुमानित लागत -7500 करोड़ (पूरी परियोजना) रूट बदलने पर देरी-कम से कम 4 साल।अब अंडरग्राउंड बनाम एलिवेटेड की राजनीति ने जनता के सवाल और बढ़ा दिए हैं। क्या यह विकास की चिंता है या सियासी दबाव? या फिर देर से जागी राजनीति?

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