मोहन कैबिनेट ने दी तबादला नीति 2026 को मंजूरी, 1 से 15 जून तक होंगे ट्रांसफर
Ramanand Tiwari | May 20, 2026, 13:57 IST
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मध्य प्रदेश की मोहन सरकार ने 2026 की तबादला नीति को हरी झंडी दे दी है। नई नियमों के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादले 1 जून से 15 जून के बीच किए जाएंगे।
मोहन कैबिनेट के बड़े फैसले:सीएम मोहन यादव की अध्यक्षता में 20 मई को कैबिनेट की बैठक हुई। कैबिनेट ने तबादला नीति को लेकर बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने 1 जून से 15 जून तक ट्रांसफर विंडो खोलने का निर्णय लिया है। खास बात यह है कि पिछले साल जहां तबादलों के लिए पूरा एक महीना दिया गया था।
वहीं इस बार समयसीमा घटाकर सिर्फ 15 दिन कर दी गई है। साथ ही बड़े विभागों को अपनी अलग ट्रांसफर नीति बनाने की छूट भी दी गई है।
हालांकि अंतिम मंजूरी जीएडी और मुख्यमंत्री स्तर से ही होगी। फैसले के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
मोहन सरकार ने साफ कर दिया है कि प्रदेश में तबादलों की प्रक्रिया 1 जून से शुरू होकर 15 जून तक चलेगी। यानी कर्मचारियों और अधिकारियों को इस बार सीमित समय में ही आवेदन और प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
पिछले वर्ष सरकार ने ट्रांसफर के लिए एक महीने का समय दिया था, लेकिन इस बार अवधि आधी कर दी गई है। इसे लेकर कैबिनेट में कुछ मंत्रियों ने समय बढ़ाने की मांग भी उठाई फिलहाल सरकार ने इसे मंजूरी नहीं दी।
नई ट्रांसफर नीति का सबसे चर्चित पहलू यह है कि बड़े विभाग अब अपनी जरूरत के हिसाब से अलग ट्रांसफर फ्रेमवर्क तैयार कर सकेंगे।
हालांकि विभागों को यह प्रस्ताव सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से भेजना होगा। अंतिम स्वीकृति मुख्यमंत्री स्तर पर ही मिलेगी। सरकार इसे प्रशासनिक लचीलापन बता रही है, लेकिन भविष्य में इसी व्यवस्था पर सवाल उठने की संभावना भी जताई जा रही है।
सरकार का दावा है कि इस बार ट्रांसफर प्रक्रिया (एमपी ट्रांसफर नीति) को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की जाएगी।
साथ ही ऑनलाइन सिस्टम को प्राथमिकता देने की बात कही गई है ताकि सिफारिश और दबाव की राजनीति कम हो सके। हालांकि राजनीतिक लॉबिंग और विभागीय दबाव की चर्चाएं अभी से शुरू हो गई हैं।
सरकार ने खास तौर कुछ संवेदनशील मामलों जैसे पति-पत्नी के आधार पर स्थानांतरण, गंभीर बीमारी के आधार पर ट्रांसफर और विशेष परिस्थितियों वाले आवेदन को सामान्य ट्रांसफर नीति से अलग रखा है।
सरकार ने ए-प्लस श्रेणी की लंबित फाइलों और पेंडेंसी को 1 मई तक निपटाने का लक्ष्य तय किया है। इससे विभागीय स्तर पर पहले से लंबित प्रशासनिक मामलों को तेजी से क्लियर करने की तैयारी शुरू हो गई है।
कैबिनेट बैठक में सिर्फ तबादला नीति ही चर्चा का केंद्र नहीं रही। सरकार ने लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के निरंतर चलने वाले विकास कार्यों को भी मंजूरी दी है। इसके अलावा कई सामाजिक योजनाओं को निरंतर जारी रखने पर सहमति बनी है।
इनमें वृद्धजन पेंशन योजना, महिला एवं बाल सुरक्षा योजनाएं, श्रमिक कल्याण योजनाएं शामिल हैं। साथ ही लोक सेवा गारंटी अधिनियम, अटल बिहारी सुशासन से जुड़े कार्यक्रम, पूर्व से संचालित निरंतर योजनाएं भी शामिल हैं।
तबादला नीति लागू होने से पहले ही सत्ता और संगठन के भीतर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि सीमित समयसीमा के कारण इस बार तबादलों में प्रतिस्पर्धा और दबाव दोनों ज्यादा देखने को मिल सकते हैं।
वहीं बड़े विभागों को अलग नीति बनाने की छूट मिलने से भविष्य में पारदर्शिता और समानता को लेकर विपक्ष सवाल उठा सकता है।
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वहीं इस बार समयसीमा घटाकर सिर्फ 15 दिन कर दी गई है। साथ ही बड़े विभागों को अपनी अलग ट्रांसफर नीति बनाने की छूट भी दी गई है।
हालांकि अंतिम मंजूरी जीएडी और मुख्यमंत्री स्तर से ही होगी। फैसले के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
सिर्फ 15 दिन खुली रहेगी तबादला विंडो
पिछले वर्ष सरकार ने ट्रांसफर के लिए एक महीने का समय दिया था, लेकिन इस बार अवधि आधी कर दी गई है। इसे लेकर कैबिनेट में कुछ मंत्रियों ने समय बढ़ाने की मांग भी उठाई फिलहाल सरकार ने इसे मंजूरी नहीं दी।
बड़े विभाग बना सकेंगे अपनी अलग नीति
हालांकि विभागों को यह प्रस्ताव सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से भेजना होगा। अंतिम स्वीकृति मुख्यमंत्री स्तर पर ही मिलेगी। सरकार इसे प्रशासनिक लचीलापन बता रही है, लेकिन भविष्य में इसी व्यवस्था पर सवाल उठने की संभावना भी जताई जा रही है।
ऑनलाइन प्रक्रिया और पारदर्शिता पर जोर
साथ ही ऑनलाइन सिस्टम को प्राथमिकता देने की बात कही गई है ताकि सिफारिश और दबाव की राजनीति कम हो सके। हालांकि राजनीतिक लॉबिंग और विभागीय दबाव की चर्चाएं अभी से शुरू हो गई हैं।
किन मामलों को नीति से बाहर रखा गया?
लंबित मामलों को निपटाने की तैयारी
30 हजार करोड़ के विकास कार्यों को मंजूरी
इनमें वृद्धजन पेंशन योजना, महिला एवं बाल सुरक्षा योजनाएं, श्रमिक कल्याण योजनाएं शामिल हैं। साथ ही लोक सेवा गारंटी अधिनियम, अटल बिहारी सुशासन से जुड़े कार्यक्रम, पूर्व से संचालित निरंतर योजनाएं भी शामिल हैं।
राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल
वहीं बड़े विभागों को अलग नीति बनाने की छूट मिलने से भविष्य में पारदर्शिता और समानता को लेकर विपक्ष सवाल उठा सकता है।
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