लोकायुक्त रिश्वत कांड के बाद भोपाल-रीवा-सागर के SP बदले, पहले दो DSP नप चुके
Amresh Kushwaha | Jun 06, 2026, 08:57 IST
lokayukta dg action dismissal sp transferred mp
मध्य प्रदेश लोकायुक्त डीजी योगेश देशमुख ने रिश्वत कांड के बाद बड़ा एक्शन लेते हुए भोपाल, रीवा और सागर के एसपी को बदल दिया है। साथ ही, हेड कॉन्स्टेबल यशवंत ठाकुर और ड्राइवर अमित विश्वकर्मा को बर्खास्त किया गया है।
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली सबसे बड़ी संस्था लोकायुक्त खुद इस वक्त घूसखोरी के भवर से जूझ रही है। लोकायुक्त के भीतर चल रहे घूसखोरी के खेल का भंडाफोड़ होने के बाद विभाग में लगातार बड़े एक्शन लिए जा रहे हैं।
घूसखोरी की आंच अब जिले के कप्तानों तक पहुंच गई है। लोकायुक्त महानिदेशक (DG) योगेश देशमुख ने एक बड़ा कदम उठाते हुए भोपाल, रीवा और सागर संभाग के पुलिस अधीक्षकों (SP) का तबादला कर दिया है।
इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा जब भ्रष्टाचार को मिटाने की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी और कर्मचारी खुद केस रफा-दफा करने के एवज में लाखों की डील करते कैमरे में कैद हो गए थे।
लोकायुक्त मुख्यालय से जारी आदेश के तहत शुक्रवार, 05 जून को तीन संभागों के पुलिस अधीक्षकों (SP) का फेरबदल कर दिया गया। इसमें भोपाल संभाग के एसपी दुर्गेश कुमार राठौर को हटाकर सागर भेजा गया है।
वहीं, सागर में पदस्थ एसपी योगेश्वर शर्मा को वहां से हटाकर रीवा संभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। रीवा में तैनात एसपी सुनील पाटीदार को अब भोपाल संभाग का नया कप्तान (SP) बनाया गया है। विभाग के भीतर महज दो दिनों के भीतर दो डीएसपी (DSP), तीन हेड कॉन्स्टेबल, एक कॉन्स्टेबल और एक ड्राइवर पर गाज गिर चुकी है। बताया जा रहा है कि निचले अमले पर निगरानी न कर पाने की वजह से इन पर एक्शन लिया गया है।
यह पूरा मामला केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें डीएसपी स्तर के अधिकारियों तक फैली हुई थीं। गुरुवार, 04 जून को जांच में डीएसपी (DSP) स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत का खुलासा हुआ था।
लोकायुक्त डीजी योगेश देशमुख ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए डीएसपी मंजू सिंह और डीएसपी बीएम द्विवेदी को तत्काल प्रभाव से लोकायुक्त संगठन से हटाकर पुलिस मुख्यालय (PHQ) अटैच कर दिया था। इसके साथ ही इन दोनों राजपत्रित अधिकारियों (Gazetted Officers) के निलंबन का औपचारिक प्रस्ताव डीजीपी कैलाश मकवाना को भेज दिया गया है।
लोकायुक्त डीजी ने इस भ्रष्टाचार कांड में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए तीसरी बार बड़ी दंडात्मक कार्रवाई की है। विभाग ने हेड कॉन्स्टेबल यशवंत सिंह ठाकुर और संविदा वाहन चालक अमित विश्वकर्मा को सेवा से सीधे बर्खास्त कर दिया है। दोनों आरोपियों को बर्खास्तगी के साथ ही आरोप पत्र भी थमा दिया गया है।
इस बर्खास्तगी के पीछे की वजह बेहद गंभीर है। आरोपी ड्राइवर अमित विश्वकर्मा ने केस को रफा-दफा करने के लिए डीएसपी बीएम द्विवेदी के नाम पर पांच लाख रुपए और डीएसपी मंजू सिंह के नाम पर तीन लाख रुपए की मांग की थी।
वहीं, हेड कॉन्स्टेबल यशवंत ठाकुर का एक ऑडियो/वीडियो सामने आया था। इसमें वह वॉइस टेस्ट की ट्रांस्क्रिप्ट में हेरफेर करने के लिए आरोपी को बुंदेलखंडी बोली में अभ्यास करने की सलाह दे रहा था।
इस पूरे रैकेट का पर्दाफाश एक मीडिया हाउस के खोजी स्टिंग ऑपरेशन के जरिए हुआ था। मीडिया के संवाददाताओं ने लोकायुक्त की कार्रवाई में फंसे आरोपियों के रिश्तेदारों के रूप में अपनी पहचान बनाई और करीब डेढ़ महीने तक लोकायुक्त दफ्तर के चक्कर काटे।
इस लंबी अवधि की रेकी के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जो सरकारी कर्मचारी लोकायुक्त के ट्रैप में फंस चुके थे, उन्हें बचाने और कोर्ट के चक्करों से मुक्ति दिलाने के नाम पर विभाग के ही अंदर एक समानांतर वसूली गैंग चल रहा था।
स्टिंग ऑपरेशन के दौरान यह पूरी तरह साफ हो गया कि लोकायुक्त के ये भ्रष्ट कारिंदे मुख्य रूप से तीन तरह के कामों के लिए मोटी रकम वसूलते थे:
इस मामले में कार्रवाई का सिलसिला बुधवार, 03 जून से शुरू हुआ था। शुरुआती कदम के तहत लोकायुक्त डीजी ने हेड कॉन्स्टेबल रामदास कुर्मी, यशवंत सिंह ठाकुर और कॉन्स्टेबल गौरव साहू को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया था। इसके साथ ही हेड कॉन्स्टेबल बृजबिहारी पांडेय और संविदा चालक अमित विश्वकर्मा के निलंबन की भी अनुशंसा की गई थी। इसके बाद अब उन्हें बर्खास्त किया जा चुका है।
बता दें कि लोकायुक्त मध्यप्रदेश में सरकारी भ्रष्टाचार की जांच करने वाली स्वतंत्र संस्था है। यह सरकारी कर्मचारियों पर घूसखोरी के मामलों में ट्रैप (जाल बिछाकर पकड़ना) की कार्रवाई करती है।
वहीं इस मामले में खुद लोकायुक्त के कर्मचारी और अफसर ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए। यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि जो संस्था भ्रष्टाचार रोकने के लिए है,उसी में घूस का खेल चल रहा था।
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घूसखोरी की आंच अब जिले के कप्तानों तक पहुंच गई है। लोकायुक्त महानिदेशक (DG) योगेश देशमुख ने एक बड़ा कदम उठाते हुए भोपाल, रीवा और सागर संभाग के पुलिस अधीक्षकों (SP) का तबादला कर दिया है।
इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा जब भ्रष्टाचार को मिटाने की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी और कर्मचारी खुद केस रफा-दफा करने के एवज में लाखों की डील करते कैमरे में कैद हो गए थे।
भोपाल, सागर और रीवा के एसपी बदले
वहीं, सागर में पदस्थ एसपी योगेश्वर शर्मा को वहां से हटाकर रीवा संभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। रीवा में तैनात एसपी सुनील पाटीदार को अब भोपाल संभाग का नया कप्तान (SP) बनाया गया है। विभाग के भीतर महज दो दिनों के भीतर दो डीएसपी (DSP), तीन हेड कॉन्स्टेबल, एक कॉन्स्टेबल और एक ड्राइवर पर गाज गिर चुकी है। बताया जा रहा है कि निचले अमले पर निगरानी न कर पाने की वजह से इन पर एक्शन लिया गया है।
घूसखोरी की आंच डीएसपी तक
लोकायुक्त डीजी योगेश देशमुख ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए डीएसपी मंजू सिंह और डीएसपी बीएम द्विवेदी को तत्काल प्रभाव से लोकायुक्त संगठन से हटाकर पुलिस मुख्यालय (PHQ) अटैच कर दिया था। इसके साथ ही इन दोनों राजपत्रित अधिकारियों (Gazetted Officers) के निलंबन का औपचारिक प्रस्ताव डीजीपी कैलाश मकवाना को भेज दिया गया है।
हेड कॉन्स्टेबल और ड्राइवर सीधे नौकरी से बर्खास्त
इस बर्खास्तगी के पीछे की वजह बेहद गंभीर है। आरोपी ड्राइवर अमित विश्वकर्मा ने केस को रफा-दफा करने के लिए डीएसपी बीएम द्विवेदी के नाम पर पांच लाख रुपए और डीएसपी मंजू सिंह के नाम पर तीन लाख रुपए की मांग की थी।
वहीं, हेड कॉन्स्टेबल यशवंत ठाकुर का एक ऑडियो/वीडियो सामने आया था। इसमें वह वॉइस टेस्ट की ट्रांस्क्रिप्ट में हेरफेर करने के लिए आरोपी को बुंदेलखंडी बोली में अभ्यास करने की सलाह दे रहा था।
स्टिंग ऑपरेशन से हुआ भंडाफोड़
इस लंबी अवधि की रेकी के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जो सरकारी कर्मचारी लोकायुक्त के ट्रैप में फंस चुके थे, उन्हें बचाने और कोर्ट के चक्करों से मुक्ति दिलाने के नाम पर विभाग के ही अंदर एक समानांतर वसूली गैंग चल रहा था।
तीन फॉमूर्ले पर वसूली
- क्लीन चिट (Clean Chit): आरोपी को केस से पूरी तरह बरी करने के लिए।
- खात्मा रिपोर्ट (Closure Report): मामले की फाइल को तकनीकी रूप से बंद करने के एवज में।
- वॉइस सैंपल (Voice Sample Modification): रिश्वत लेते वक्त रिकॉर्ड हुई आवाज के मिलान की प्रक्रिया को पूरी तरह प्रभावित करने के लिए।
कार्रवाई की पूरी क्रोनोलॉजी
लोकायुक्त और उसका काम
वहीं इस मामले में खुद लोकायुक्त के कर्मचारी और अफसर ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए। यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि जो संस्था भ्रष्टाचार रोकने के लिए है,उसी में घूस का खेल चल रहा था।
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