एमपी के आयुष विभाग में अफसरों की मनमानी? नियमितीकरण से ट्रांसफर तक नियमों की अनदेखी के आरोप

Atul Dwivedi | Oct 27, 2026, 18:28 IST
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एमपी के आयुष विभाग में नियमों से खिलवाड़।
एमपी के आयुष विभाग में नियमों से खिलवाड़।

द सूत्र ने खुलासा किया कि कैसे मध्य प्रदेश के आयुष विभाग में, नियमों को ताक पर रखकर काम हो रहा है। जिन अधिकारियों के अनुभव प्रमाण-पत्र जांच समिति ने फर्जी पाए, वे लोग भी मजे से नौकरी कर रहे हैं। दूसरी तरफ द सूत्र आयुष विभाग की एक और बड़ी लापरवाही आपको बताने जा रहा है।

इस बार तो विभाग ने बिल्कुल हद कर दी है। विभाग ने अपने ही कर्मचारियों के लिए दोहरा रवैया अपनाया, जिसकी वजह से उसकी जमकर किरकिरी हुई है।

मामला यहीं नहीं रुका। बात हाईकोर्ट तक गई थी। लेकिन उसके बाद भी विभाग न जाने क्यों गलती पर गलती करता रहा। इस बार मामला आयुष विभाग में काम कर रहे संविदा कर्मचारियों का है। इन संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण में विभाग ने कई गलतियां कीं, आरोप है जहां मंजूरी लेनी थी वहां मंजूरी नहीं ली गई। हाईकोर्ट के आदेश के बाद विभाग के अधिकारी बिना सोचे-समझे काम करते रहे। जिन मामलों को मंत्रिपरिषद के सामने रखा जाना चाहिए था, उन्हें वहां तक पहुंचाया ही नहीं गया। इसके अलावा आयुष विभाग के अधिकारियों ने ऐसे फैसले भी लिए, जिनकी वजह से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा। इतना ही नहीं आयुष विभाग में एक और नया खेल चल रहा है। दावा है कि यहां कर्मचारियों के ट्रांसफर हो जाते हैं और मंत्री जी को खबर तक नहीं होती।

आयुष विभाग में फर्जी सर्टिफिकेट पर नियुक्तियां: जांच कमेटी की रिपोर्ट को मंत्री ने किया खारिज, मचा बवाल | Appointments on Fake Certificates in AYUSH Department: Minister Rejects Investigation Committee's Report, Controversy Erupts
एमपी आयुष विभाग में नियुक्तियों पर उठे सवाल, जांच कमेटी ने प्रमाण पत्रों में गड़बड़ी बताई, मंत्री ने कहा- सब सही
26 Oct 2026 ,
By Atul Dwivedi
मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों में फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर आप आराम से नौकरी कर सकते हैं। यकीन न हो तो मध्यप्रदेश के आयुष विभाग को देख लीजिए। यहां परीक्षा के बाद जॉइन हुए अधिकारियों के दस्तावेजों और अनुभव प्रमाण पत्रों की जांच हुई। जांच कमेटी ने पाया कि कुछ अधिकारियों के सर्टिफिकेट सही नहीं हैं। यानी मामला गड़बड़ है, कार्रवाई होनी चाहिए।
मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों में फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर आप आराम से नौकरी कर सकते हैं। यकीन न हो तो मध्यप्रदेश के आयुष विभाग को देख लीजिए। यहां परीक्षा के बाद जॉइन हुए अधिकारियों के दस्तावेजों और अनुभव प्रमाण पत्रों की जांच हुई। जांच कमेटी ने पाया कि कुछ अधिकारियों के सर्टिफिकेट सही नहीं हैं। यानी मामला गड़बड़ है, कार्रवाई होनी चाहिए।

मामला शुरू कैसे हुआ?

दरअसल आयुष विभाग का एक मामला हाईकोर्ट पहुंचा था। मामले के हाईकोर्ट पहुंचने की वजह थी विभाग का नियमितीकरण का एक आदेश। दरअसल आयुष विभाग ने 2006 में जिन 30 संविदा कंपाउंडरों की नियुक्ति की, उन्हें 2009 में नियमित कर दिया गया था। इन संविदा कंपाउंडरों की नियुक्ति धार, झाबुआ और खरगोन में की गई थी। तब विभाग ने इन 30 संविदा कंपाउंडरों को इनकी संविदा नियुक्ति की तारीख से नियमित माना, न कि 2009 से।

इसी मामले को लेकर याचिकाकर्ता गोविंद डावर हाईकोर्ट पहुंचे थे। प्रथम नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण का दावा पेश किया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि उनकी नियुक्ति साल 2002 में आयुर्वेदिक कंपाउंडर के तौर पर हुई थी, इसलिए उन्हें भी साल 2002 से नियमितीकरण का फायदा मिलना चाहिए। हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता का आवेदन मिलने के दो महीने के अंदर, नियमितीकरण पर फैसला किया जाए। इसके बाद विभाग ने 2024 में याचिकाकर्ता को नियमित करने का आदेश जारी किया था। लेकिन विभाग से यहीं सबसे बड़ी चूक हुई, क्योंकि इस दौरान सामान्य प्रशासन विभाग के 5 जून 2018 और 22 जुलाई 2023 के निर्देशों को ध्यान में नहीं रखा गया था।

क्या कहते हैं निर्देश?

मध्य प्रदेश सरकार के कार्य-आवंटन नियमों के तहत, संविदा कर्मचारियों की सेवा शर्तों और नियमितीकरण से जुड़ी नीतियां, सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकार में आती हैं। आयुष विभाग सीधे पहली संविदा नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण जैसी नई सेवा शर्त तय नहीं कर सकता है। मध्य प्रदेश सरकार के नियम कहते हैं कि अगर किसी फैसले से सरकार पर बड़ा आर्थिक बोझ आता है, तो उसके लिए निर्धारित मंजूरी लेना जरूरी है। लेकिन विभाग के अधिकारी अपने स्तर पर ही मामले को सुलाझाते रहे। आरोप है कि आयुष विभाग ने हाईकोर्ट के फैसलों पर न तो कानूनी राय ली, और न ही दूसरे कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल किया, जबकि कोर्ट के फैसले सरकार के खिलाफ थे।

हाईकोर्ट ने अपने निर्देश में यह कहा था।
हाईकोर्ट ने अपने निर्देश में यह कहा था।

नियमितीकरण के 14 आदेश जारी

दावे तो यहां तक किए जा रहे हैं कि विभाग ने अलग-अलग महीनों में नियमितीकरण के 14 आदेश जारी किए थे। आरोप है कि आदेश जारी करने के बाद आयुष विभाग ने 2025 में शासन से इसकी मंजूरी मांगी थी। यानी आदेश पहले दे दिया, मंजूरी बाद में मांगी गई थी। अब दावा किया जा रहा है कि सरकार ने विभाग से उन अधिकारियों की जानकारी मांगी है, जो नियमितीकरण का प्रस्ताव बनाने की प्रक्रिया में शामिल थे; किन अधिकारियों ने मंजूरी दी और किस स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ। यह जानकारी भी मांगी गई है कि दोषी अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई थी?

हालांकि, मामले की जानकारी के लिए द सूत्र ने संचालनालय आयुष विभाग के प्रमुख सचिव शोभित जैन से संपर्क किया, तो उन्होंने फोन नहीं उठाया।

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पहले ट्रांसफर पर भी उठे सवाल

आयुष विभाग कर्मचारियों के ट्रांसफर को लेकर भी सवालों के घेरे में रहा है। आरोप है कि जुलाई 2025 में ट्रांसफर के दौरान नियमों के विरुद्ध जाकर ट्रांसफर किए गए थे। आरोप है कि कई कर्मचारियों के ट्रांसफर उस वक्त बिना आयुष मंत्री की सहमति के हुए थे। दावा यह भी है कि विभाग के अधिकारियों ने खाली पद न होते हुए भी, एक ही जगह पर एक से ज्यादा कर्मचारियों के ट्रांसफर कर दिए थे।
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