MP में बिजली बिल बढ़ाने की तैयारी? 15 से 20% तक बढ़ोतरी पर मंथन

Ramanand Tiwari | Sept 03, 2026, 08:30 IST
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MP में बिजली बिल बढ़ाने की तैयारी
MP में बिजली बिल बढ़ाने की तैयारी

मध्यप्रदेश में 2027-28 से बिजली दरों में 15 से 20% तक बढ़ोतरी की आशंका ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। 8 सितंबर की जनसुनवाई के बाद प्रस्तावित टैरिफ पर तस्वीर साफ होगी।

समझें क्या है पूरा मामला

  • 2027-28 से नई बिजली दरें लागू करने की तैयारी है।
  • बिजली दरों में 15 से 20% बढ़ोतरी संभव है।
  • घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
  • वितरण हानि और लागत को लेकर सवाल उठे हैं।
  • तीन साल में बिजली दरों पर 207 आपत्तियां आईं।

8 सितंबर को जनसुनवाई के बाद तस्वीर साफ

मध्यप्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय जेब पर भारी पड़ सकता है। 2027-28 से लागू होने वाले प्रस्तावित टैरिफ में बिजली दरों में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका सामने आई है। हालांकि अंतिम फैसला अभी बाकी है और 8 सितंबर की जनसुनवाई इसके लिए अहम पड़ाव होगी।

लेकिन इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ बिजली महंगी होने का नहीं है। सवाल यह भी है कि बिजली वितरण व्यवस्था की खामियों और बढ़ती लागत का हिसाब आखिर कौन देगा?

बिजली महंगी होने से पहले उठ रहा बड़ा सवाल

टैरिफ बढ़ाने के पीछे वितरण कंपनियों की लागत, परिचालन खर्च, वित्तीय स्थिति, पूंजी पर प्रतिलाभ और अन्य शुल्क जैसे कई आधार बताए जाते हैं। लेकिन उपभोक्ता पक्ष की चिंता इससे आगे की है।

अगर बिजली वितरण में नुकसान कम करने, नेटवर्क सुधारने और प्रबंधन को बेहतर बनाने की जरूरत है, तो उसका आर्थिक भार सीधे उपभोक्ता की जेब पर डालना कितना उचित होगा? यही सवाल प्रस्तावित टैरिफ को लेकर होने वाली जनसुनवाई में महत्वपूर्ण रहने वाला है।

वितरण हानि पर भी जवाबदेही जरूरी

बिजली वितरण व्यवस्था में होने वाली तकनीकी और व्यावसायिक हानियां लंबे समय से बड़ा मुद्दा रही हैं। केंद्र की आरडीएसएस जैसी योजनाओं का उद्देश्य वितरण व्यवस्था को मजबूत करना और नुकसान कम करना है।

ऐसे में उपभोक्ता संगठनों की दलील यह हो सकती है कि पहले नेटवर्क और प्रबंधन में सुधार हो, फिर बढ़ती लागत का भार तय किया जाए। यानी सवाल सिर्फ बिजली कितनी महंगी होगी? का नहीं है। सवाल यह भी है कि महंगी बिजली की वजह क्या है?

उद्योगों के सामने मिनिमम चार्ज की चुनौती

औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए टैरिफ का दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है। उद्योगों का तर्क रहा है कि उत्पादन कम होने या मशीनें बंद रहने की स्थिति में भी स्थायी और न्यूनतम शुल्क का भार बना रहता है। ऐसे में वास्तविक बिजली खपत कम होने के बावजूद बिल अपेक्षाकृत अधिक रह सकता है।

उद्योग संगठन चाहते हैं कि न्यूनतम शुल्क की व्यवस्था को वास्तविक खपत और उपयोग की स्थिति से अधिक तार्किक तरीके से जोड़ा जाए। बिजली लागत बढ़ने का असर उत्पादन लागत पर पड़ेगा और उसका प्रभाव आगे बाजार तक पहुंच सकता है।

करोड़ों उपभोक्ता, लेकिन आपत्तियां सिर्फ 207

इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू उपभोक्ताओं की भागीदारी है। पिछले तीन वर्षों में प्रस्तावित टैरिफ को लेकर आयोग के सामने कुल 207 आपत्तियां और सुझाव दर्ज हुए। 2024-25 में 69, 2025-26 में 84 और 2026-27 में 54 आपत्तियां आईं। आंकड़ा बताता है कि बिजली जैसे सीधे घरेलू बजट से जुड़े मुद्दे पर सार्वजनिक भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत सीमित है।

पश्चिम क्षेत्र से सबसे ज्यादा आपत्तियां

क्षेत्रवार आंकड़ों में पश्चिम क्षेत्र सबसे आगे रहा। पिछले तीन वर्षों में यहां से 107 आपत्ति और सुझाव दर्ज हुए। पूर्व और मध्य क्षेत्र से 49-49 आपत्तियां आईं। यह स्थिति एक अहम सवाल खड़ा करती है क्या आम उपभोक्ता टैरिफ प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं रखते या फिर बिजली बिल से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी का तंत्र अभी भी कमजोर है?

8 सितंबर को होगी असली परीक्षा

अब सबकी निगाह 8 सितंबर की जनसुनवाई पर है। इस दौरान आपत्तिकर्ताओं और संबंधित पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी। इसके बाद मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग प्रस्तावित टैरिफ में बदलाव करता है, संशोधन करता है या किसी अन्य रूप में मंजूरी देता है, यह आगे स्पष्ट होगा।

फिलहाल बिजली उपभोक्ताओं के सामने बड़ा सवाल यही है कि बढ़ती लागत का पूरा भार बिजली बिलों पर डाला जाएगा या फिर बिजली कंपनी की कार्यक्षमता, वितरण हानि और प्रबंधन की कमियों की भी समीक्षा होगी। 8 सितंबर की जनसुनवाई इस बहस का अहम पड़ाव बन सकती है।

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