एमपी में क्या फर्जी जाति प्रमाण पत्र से बन रहे अधिकारी, SDM, SDOP, जेल अधीक्षक तक पर उठे सवाल
Sanjay Gupta | Mar 05, 2026, 15:37 IST
mp fake caste certificate scam sdm sdop investigation
एमपी में क्या जाति प्रमाण पत्र के जरिए अधिकारी बन रहे हैं। प्रदेश के अधिकारियों को लेकर यह सवाल विधानसभा में उठाया गया है। इसमें एसडीएम, एसडीओपी से लेकर जेल अधीक्षक तक दायरे में आए हैं।
INDORE. एमपी में आदिवासी यानी एससी और एसटी के फर्जी जाति प्रमाण पत्र से नौकरी लेने का मामला फिर गरमा गया है। मध्यप्रदेश विधानसभा में इसे लेकर मनावर विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने सवाल उठाया था।
इसमें नामजद अधिकारियों के नाम लेकर इनकी जानकारी भी मांगी गई है। विधायक का कहना है कि जाति प्रमाण पत्र के 1950 के क्राइटेरिया का पालन किए बिना यह प्रमाण पत्र बने हैं। इन सभी की छानबीन समिति से जांच की बात उठाई गई है।
विधायक ने इंदौर में एसडीएम रह चुके और अभी झाबुआ में पदस्थ संयुक्त कलेक्टर अक्षय मरकाम के प्रमाण पत्र पर सवाल उठाया है। इसके साथ ही भोपाल सेंट्रल जेल अधीक्षक राकेश कुमार मांगरे, धामनोद धार जिला एसपी कार्यालय में पदस्थ एसडीओपी मोनिका सिंह के प्रमाण पत्र को लेकर भी सवाल उठाया है। इन सभी के प्रमाण पत्र, मूल निवासी प्रमाण पत्र न अन्य जानकारियां मांगी गई हैं।
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विधायक अलावा के सवाल पर सीएम मोहन यादव ने जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि सभी के प्रमाण पत्रों की जांच संबंधित विभाग की छानबीन समिति के जरिए अलग-अलग की जाती है।
इसमें एसटी विभाग, एससी कल्याण विभाग, ओबीसी व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की अलग-अलग छानबीन समिति है। वहीं तीनों अधिकारियों मरकाम, मांगरे और सिंह के फर्जी प्रमाण पत्र पर सीएम ने जवाब दिया कि इनकी जानकारी एकत्र की जा रही है।
फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए आरक्षक बनने का मुद्दा भी ग्वालियर हाईकोर्ट में उठा है। एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट ने यह याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया था कि 11 आरक्षकों ने अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के तहत फर्जी प्रमाण पत्र से आरक्षक पद हासिल किया है। इनकी जानकारी कलेक्टोरेट में है ही नहीं। इस पर ग्वालियर हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए हैं।
साल 2025 में एसटीएफ ने भी 25 अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा एसटी-एससी के फर्जी प्रमाण पत्र से नौकरी हासिल करने का खुलासा किया था। ये प्रमाण पत्र ग्वालियर, भिंड, मुरैना से बने थे।
इनके जरिए चयनित हुए अधिकारी राजस्व, पुलिस, मेडिकल व पीडब्ल्यूडी जैसे विभागों में पदस्थ हुए थे। जांच में आया था कि यह सभी इंदौर, शाजापुर, ग्वालियर, विदिशा, नर्मदापुरम जैसे जिलों में पदस्थ हैं।
इन सभी में एसडीएम संयुक्त कलेक्टर मरकाम का केस काफी चर्चित रहा है। यह लगातार उठता रहा है। विधायक अलावा पहले भी इन्हें लेकर जानकारी मांग चुके हैं। आरोप है कि इनके पिता स्वर्गीय नागेशवर गुप्ता इंदौर तहसील राऊ को भुंजिया जनजाति का मानते हुए प्रमाण पत्र जारी किया गया था।
यह राज्य सेवा परीक्षा 2015 की चयनसूची में 15वें नंबर पर आकर डिप्टी कलेक्टर बने थे। साथ ही, इनका चयन एसटी कैटेगरी में हुआ था। इन्हें लेकर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के जरिए भी शिकायतें हुई हैं कि वह सामान्य वर्ग से हैं, लेकिन मरकाम उपनाम लगाया जो एसटी में आता है।
उन्होंने दो अगस्त 2013 में नाम परिवर्तन की अधिसूचना जारी करवाई और अक्षय गुप्ता से अक्षय मरकाम बने। वह 2014 में डीएसपी पद पर चयनित हुए थे और फिर 2015 में डिप्टी कलेक्टर बने।
मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण पत्र के लिए 1950 का क्राइटेरिया यह है कि आवेदक या उसके पूर्वजों (पिता/दादा) को 1950 या उससे पहले से ही एमपी का स्थायी निवासी होना चाहिए। यदि 1950 के दस्तावेज नहीं हैं, तो राजस्व अधिकारी मौके पर जाकर या जांच के आधार पर जाति की पुष्टि कर सकते हैं।
यदि परिवार के किसी सदस्य (पिता, भाई, बहन, दादा) को पहले से ही 1996 के बाद अनुविभागीय अधिकारी (SDO) द्वारा जारी स्थायी जाति प्रमाण पत्र मिला है, तो उसे भी मान्य किया जाता है।
ओबीसी के लिए (OBC) के लिए यह निवास अवधि आमतौर पर 1984 या उससे पहले से मध्यप्रदेश में निवास होना चाहिए। कौन सी जाति एसटी, एससी, ओबीसी में है यह अधिसूचित है।
संबंधित जिले में एरिया का एसडीओ के पास इसके आवेदन होते हैं। वह सभी दस्तावेज देखने के बाद इन्हें जारी करता है। कोई भी प्रमाण पत्र एसडीओ के जरिए जारी हुआ या नहीं यह वहां रखे रिकार्ड से चेक किया जा सकता है।
विधायक अलावा से द सूत्र ने बात की। इस पर उन्होंने कहा कि फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर कुछ लोग आदिवासी समुदाय का हक मार रहे हैं। इसे लेकर कई अधिकारियों पर लगातार सवाल उठे हैं, शिकायतें हुई हैं लेकिन इसमें कार्रवाई नहीं हो रही है। जबकि यह आपराधिक मामला है। इसलिए जिन्हें लेकर शिकायतें आई थीं और शंका थी उन्हें लेकर सवाल पूछा था। वहीं, अभी प्रमाण पत्रों को लेकर विस्तृत जानकारी नहीं दी गई। हमारा कहना है कि शिकायत है तो इसकी छानबीन समिति से जांच होना चाहिए और उन्हें नौकरी से बाहर कर केस दर्ज किया जाना चाहिए।
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इसमें नामजद अधिकारियों के नाम लेकर इनकी जानकारी भी मांगी गई है। विधायक का कहना है कि जाति प्रमाण पत्र के 1950 के क्राइटेरिया का पालन किए बिना यह प्रमाण पत्र बने हैं। इन सभी की छानबीन समिति से जांच की बात उठाई गई है।
इन अधिकारियों के प्रमाण पत्र पर उठाए सवाल
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सीएम ने दिया इन पर जवाब
इसमें एसटी विभाग, एससी कल्याण विभाग, ओबीसी व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की अलग-अलग छानबीन समिति है। वहीं तीनों अधिकारियों मरकाम, मांगरे और सिंह के फर्जी प्रमाण पत्र पर सीएम ने जवाब दिया कि इनकी जानकारी एकत्र की जा रही है।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने भी दिए आदेश
एसटीएफ की जांच में 25 राडार पर आए थे
इनके जरिए चयनित हुए अधिकारी राजस्व, पुलिस, मेडिकल व पीडब्ल्यूडी जैसे विभागों में पदस्थ हुए थे। जांच में आया था कि यह सभी इंदौर, शाजापुर, ग्वालियर, विदिशा, नर्मदापुरम जैसे जिलों में पदस्थ हैं।
एसडीएम मरकाम का केस बार-बार उठा
यह राज्य सेवा परीक्षा 2015 की चयनसूची में 15वें नंबर पर आकर डिप्टी कलेक्टर बने थे। साथ ही, इनका चयन एसटी कैटेगरी में हुआ था। इन्हें लेकर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के जरिए भी शिकायतें हुई हैं कि वह सामान्य वर्ग से हैं, लेकिन मरकाम उपनाम लगाया जो एसटी में आता है।
उन्होंने दो अगस्त 2013 में नाम परिवर्तन की अधिसूचना जारी करवाई और अक्षय गुप्ता से अक्षय मरकाम बने। वह 2014 में डीएसपी पद पर चयनित हुए थे और फिर 2015 में डिप्टी कलेक्टर बने।
साल 1950 का क्राइटेरिया यह है
यदि परिवार के किसी सदस्य (पिता, भाई, बहन, दादा) को पहले से ही 1996 के बाद अनुविभागीय अधिकारी (SDO) द्वारा जारी स्थायी जाति प्रमाण पत्र मिला है, तो उसे भी मान्य किया जाता है।
ओबीसी के लिए (OBC) के लिए यह निवास अवधि आमतौर पर 1984 या उससे पहले से मध्यप्रदेश में निवास होना चाहिए। कौन सी जाति एसटी, एससी, ओबीसी में है यह अधिसूचित है।
संबंधित जिले में एरिया का एसडीओ के पास इसके आवेदन होते हैं। वह सभी दस्तावेज देखने के बाद इन्हें जारी करता है। कोई भी प्रमाण पत्र एसडीओ के जरिए जारी हुआ या नहीं यह वहां रखे रिकार्ड से चेक किया जा सकता है।
यह बोले विधायक अलावा
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