पचमढ़ी की चट्टानों में छुपा है 6.6 करोड़ साल पुराना राज, डायनासोर एरा से है कनेक्शन

Kaushiki | Sept 23, 2026, 12:51 IST
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Pachmarhi Rock History
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IISER भोपाल के वैज्ञानिकों ने पचमढ़ी में 6.6 करोड़ साल पुरानी चट्टानों की खोज की है। ये पत्थर उस दौर के हैं जब ज्वालामुखी विस्फोट से डायनासोर विलुप्त हो रहे थे। इन पत्थरों में पृथ्वी के प्राचीन मैग्नेटिक फील्ड बदलने के भी सबूत मिले हैं।

Pachmarhi Rock History: मध्य प्रदेश का बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन पचमढ़ी अपनी वादियों के लिए प्रसिद्ध है। हर साल लाखों पर्यटक यहां की हरियाली और झरने देखने आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन सुंदर पत्थरों पर बैठकर आप नजारे देखते हैं, उनका इतिहास कितना पुराना है? भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल के वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक ऐसी चौंकाने वाली रिसर्च की है, जो हमें करोड़ों साल पीछे ले जाती है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, पचमढ़ी की चट्टानें आज से लगभग 6.6 करोड़ साल पुरानी हैं। यह वही दौर था जब पृथ्वी पर से डायनासोर हमेशा के लिए विलुप्त हो रहे थे। इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि यह नई खोज हमारे देश के इतिहास और पृथ्वी के विकास क्रम को समझने में कैसे मदद करेगी।

Pachmarhi Rocks History
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पचमढ़ी का इतिहास

पचमढ़ी को सतपुड़ा की रानी भी कहा जाता है। यह खूबसूरत हिल स्टेशन नर्मदापुरम जिले में समुद्र तल से 1100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। पचमढ़ी की खोज 1857 में ब्रिटिश कैप्टन जेम्स फोरसिथ ने की थी। आजादी के बाद साल 1967 तक ये मध्य प्रदेश का समर कैपिटल भी रहा था। अब इस जियोलाजिकल एक्सप्लोरेशन के बाद पचमढ़ी का महत्व और बढ़ गया है।

अब पर्यटक यहां की वादियों का आनंद लेने के साथ-साथ करोड़ों साल पुरानी चट्टानों का इतिहास भी जान सकेंगे। मान्यताओं के मुताबिक, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां कुछ समय बिताया था। साल 1857 में ब्रिटिश कैप्टन जेम्स फोरसिथ ने इस घाटी की खोज की थी।

Pachmarhi Rock History
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6.6 करोड़ साल पुराना ज्वालामुखी कनेक्शन

आज से लगभग 6.6 करोड़ साल पहले भारत के मध्य और पश्चिमी हिस्से में भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट हो रहे थे। चारों तरफ जहरीली गैसें और गर्म लावा फैला हुआ था। उसी समय पृथ्वी पर क्रिटेशियस मास एक्सटिंक्शन नाम का डेसट्रक्टिव फेज चल रहा था।

इसी दौर में भयानक तबाही के कारण डायनासोर का नामोनिशान मिट गया था। पचमढ़ी की ये चट्टानें उसी ठंडे हुए प्राचीन लावे यानी मैग्मा से बनी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये पत्थर उस महाविनाश के साइलेंट विटनेस हैं।

मध्य प्रदेश में गूंजती थी डायनासोरों की दहाड़, 6.5 करोड़ साल पुराना अंडा  प्रदर्शित
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मैग्नेटिक फील्ड बदलने के अनोखे सबूत

IISER भोपाल के प्रोफेसर ज्योतिर्मय मल्लिक की टीम ने इस जटिल रिसर्च को पूरा किया है। इसमें मुंबई के Indian Institute of Geomagnetism के वैज्ञानिक भी शामिल थे। वैज्ञानिकों ने पचमढ़ी के पत्थरों की गहराई से जांच की।

उन्हें इन पत्थरों के अंदर विपरीत दिशा वाले चुंबकीय संकेत (Magnetic Field Signatures) मिले हैं। इसका मतलब है कि उस दौर में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव आपस में बदल रहे थे। इन पत्थरों ने उस बदलाव को अपने अंदर हमेशा के लिए कैद कर लिया है।

साढ़े सात करोड़ साल पहले साथ दफन 'रोमियो जूलियट' डायनासोर मिले - 7 crore  year old dinosaur residue found - AajTak
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ये खोज हमारे किस काम आएगी

अब सवाल उठता है कि करोड़ों साल पुरानी चट्टानों की इस खोज से हमें क्या फायदा होगा। यह रिसर्च एजुकेशन और एनवायरनमेंट के लिहाज से बहुत जरूरी है। यह रिसर्च हमें यह समझने में मदद करती है कि हमारी पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ।

एंसिएंट टिम्स में किस तरह क्लाइमेट चेंज हुआ था। इससे ये जानने में आसानी होगी कि कैसे एक बड़े नेचुरल चेंज के कारण विशालकाय जीव पृथ्वी से हमेशा के लिए खत्म हो गए थे।

पचमढ़ी में अब जियो-टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा। इससे विद्यार्थी और शोधकर्ता यहां आकर पत्थरों के इतिहास के बारे में प्रैक्टिकल ज्ञान ले सकेंगे। iiser bhopal | Pachmarhi

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