प्लास्टिक कार्ड गायब, एमपी परिवहन विभाग ने लोगों को PDF देकर 100 करोड़ रुपए से ज्यादा वसूले!
Ramanand Tiwari | May 15, 2026, 14:12 IST
mp transport department card fee collection issue
मध्यप्रदेश परिवहन विभाग की कारगुजारी सामने आई है। जिस स्मार्ट कार्ड का टेंडर दो साल से नहीं हुआ है, उसके नाम पर हर आवेदक से 200 रुपए वसूले जा रहे हैं। लोगों को प्लास्टिक कार्ड की जगह सिर्फ PDF भेजी जा रही है। पढ़िए 'द सूत्र' की यह खास खबर...
मध्यप्रदेश को अजब-गजब प्रदेश यूं ही नहीं कहा जाता। यहां ऐसे मामले सामने आते हैं, जिन्हें सुनकर आम आदमी भी पूछने लगता है कि आखिर सिस्टम चल कैसे रहा है? अब परिवहन विभाग का यह मामला ही देख लीजिए। प्रदेशभर में लोगों से ड्राइविंग लाइसेंस, वाहन रजिस्ट्रेशन, रिन्यूवल और दूसरी सेवाओं के नाम पर कार्ड फीस लगातार वसूली जा रही है, लेकिन बदले में लोगों को प्लास्टिक कार्ड नहीं, सिर्फ मोबाइल पर PDF भेजी जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कार्ड के नाम पर जनता से 200 रुपए लिए जा रहे हैं, उसका टेंडर ही पिछले करीब दो साल से नहीं हुआ है। यानी कार्ड बन ही नहीं रहे, फिर भी फीस वसूली पूरी ताकत से जारी है। जनता पैसा पूरा दे रही है, पर सुविधा आधी भी नहीं मिल रही है।
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मध्यप्रदेश परिवहन विभाग 200 रुपए कार्ड फीस वसूली को लेकर विवाद में घिर गया है। कार्ड प्रिंटिंग से जुड़ा पुराना टेंडर करीब दो साल पहले खत्म हो चुका है। इसके बाद नया टेंडर नहीं हुआ। इसके बावजूद एमपी परिवहन विभागने फीस लेना बंद नहीं किया है।
लाइसेंस, रिन्यूवल, रजिस्ट्रेशन और अन्य सेवाओं में आज भी लोगों से स्मार्ट कार्ड के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं। अनुमान है कि विभाग एक साल में ही 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की वसूली कर चुका है। बड़ा सवाल यह है कि जब कार्ड बन ही नहीं रहे तो आखिर यह पैसा किस चीज का लिया जा रहा है?
इस मामले में परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह का बयान भी सवाल खड़े करता है। मंत्री का कहना है कि जब टेंडर नहीं हुआ है तो कार्ड कैसे देंगे? हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि टेंडर होने के बाद कार्ड बनाकर दिए जाएंगे।
अब जनता पूछ रही है कि जब विभाग को पहले से पता था कि कार्ड नहीं बन रहे, तब भी 200 रुपए क्यों लिए गए? क्या लोगों को यह बताया गया कि उन्हें प्लास्टिक कार्ड नहीं मिलेगा? क्या फीस कम की गई? क्या वसूली रोकी गई? इन सवालों का सीधा जवाब अब तक नहीं मिला है।
जब मंत्री से पूछा गया कि कार्ड के नाम पर जनता से करोड़ों रुपए वसूले जा चुके हैं तो यह पैसा आखिर जा कहां रहा है, तब भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला। मंत्री ने सिर्फ इतना कहा कि अभी पैसा इकट्ठा हो रहा है, बाद में कार्ड दे दिए जाएंगे।
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ग्वालियर जिले के रवि वर्मा ने आरटीओ से अपनी कार का रजिस्ट्रेशन कराया। उनसे प्लास्टिक कार्ड के नाम पर 200 रुपए लिए गए, लेकिन कार्ड नहीं मिला।
विदिशा जिले के रहने वाले राजेंद्र ने भी अपनी नई कार का रजिस्ट्रेशन कराया। उन्हें सिर्फ PDF कॉपी दी गई, जबकि फीस प्लास्टिक कार्ड की पूरी वसूली गई।
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ग्वालियर की सोनल कठुरिया के साथ भी यही हुआ। उनसे भी परिवहन विभाग ने 200 रुपए वसूले, पर प्लास्टिक कार्ड की जगह मोबाइल पर PDF भेज दी गई।
मध्यप्रदेश परिवहन विभाग पहले भी विवादों में रह चुका है। चर्चित सौरभ शर्मा कांड के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर पहले ही सवाल उठे थे। अब स्मार्ट कार्ड फीस वसूली का मामला सामने आने के बाद विभाग की वित्तीय पारदर्शिता पर फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
लोग पूछ रहे हैं कि जब नियमों के नाम पर जनता से तुरंत पैसे लिए जा सकते हैं, तो फिर सुविधा नहीं देने पर फीस बंद क्यों नहीं की गई? आखिर विभाग ने लोगों को पहले से सच क्यों नहीं बताया?
यह मामला सिर्फ 200 रुपए की फीस का नहीं रह गया है। सवाल जवाबदेही का है। सवाल पारदर्शिता का है। सवाल इस बात का है कि क्या सरकार जनता से ऐसी सेवाओं के लिए भी पैसा वसूल सकती है, जो उसे मिल ही नहीं रही हैं?
परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के बयान ने विवाद कम करने के बजाय और बढ़ा दिया है। जनता से लगातार वसूली हो रही है, पर सुविधा अधूरी है। ऐसे में अब सरकार को साफ-साफ बताना होगा कि बिना कार्ड दिए फीस वसूली कब तक चलेगी और जनता के पैसों का पूरा हिसाब आखिर क्या है?
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कार्ड के नाम पर जनता से 200 रुपए लिए जा रहे हैं, उसका टेंडर ही पिछले करीब दो साल से नहीं हुआ है। यानी कार्ड बन ही नहीं रहे, फिर भी फीस वसूली पूरी ताकत से जारी है। जनता पैसा पूरा दे रही है, पर सुविधा आधी भी नहीं मिल रही है।
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दो साल पहले खत्म हो चुका टेंडर
लाइसेंस, रिन्यूवल, रजिस्ट्रेशन और अन्य सेवाओं में आज भी लोगों से स्मार्ट कार्ड के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं। अनुमान है कि विभाग एक साल में ही 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की वसूली कर चुका है। बड़ा सवाल यह है कि जब कार्ड बन ही नहीं रहे तो आखिर यह पैसा किस चीज का लिया जा रहा है?
क्या कहते हैं परिवहन मंत्री, जानिए...
अब जनता पूछ रही है कि जब विभाग को पहले से पता था कि कार्ड नहीं बन रहे, तब भी 200 रुपए क्यों लिए गए? क्या लोगों को यह बताया गया कि उन्हें प्लास्टिक कार्ड नहीं मिलेगा? क्या फीस कम की गई? क्या वसूली रोकी गई? इन सवालों का सीधा जवाब अब तक नहीं मिला है।
जब मंत्री से पूछा गया कि कार्ड के नाम पर जनता से करोड़ों रुपए वसूले जा चुके हैं तो यह पैसा आखिर जा कहां रहा है, तब भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला। मंत्री ने सिर्फ इतना कहा कि अभी पैसा इकट्ठा हो रहा है, बाद में कार्ड दे दिए जाएंगे।
ग्राउंड पर लोगों की नाराजगी
केस 01
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ग्वालियर जिले के रवि वर्मा ने आरटीओ से अपनी कार का रजिस्ट्रेशन कराया। उनसे प्लास्टिक कार्ड के नाम पर 200 रुपए लिए गए, लेकिन कार्ड नहीं मिला।
केस 02
केस 03
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ग्वालियर की सोनल कठुरिया के साथ भी यही हुआ। उनसे भी परिवहन विभाग ने 200 रुपए वसूले, पर प्लास्टिक कार्ड की जगह मोबाइल पर PDF भेज दी गई।
कितना बड़ा है यह खेल
प्रदेशभर में लोग एक जैसी परेशानी झेल रहे हैं। पैसा प्लास्टिक कार्ड का लिया जा रहा है, पर सुविधा डिजिटल कॉपी देकर पूरी मान ली जा रही है। यदि इस पूरे खेल का गणित देखें तो मामला और बड़ा दिखाई देता है। प्रदेश के एक छोटे जिले में हर दिन औसतन 300 आवेदन आते हैं। हर आवेदन पर कार्ड के नाम पर 200 रुपए फीस ली जाती है। यानी सिर्फ एक छोटे जिले में प्रतिदिन करीब 60 हजार रुपए की वसूली होती है। महीने में यह रकम लगभग 15 लाख और सालभर में करीब 1.8 करोड़ रुपए तक पहुंच जाती है। अब यही हिसाब प्रदेश के 55 जिलों पर लगाया जाए तो यह राशि सालाना करीब 100 करोड़ रुपए तक पहुंचती दिखाई देती है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में हर दिन करीब 2000 लोग लाइसेंस, रिन्यूवल और रजिस्ट्रेशन से जुड़े कामों के लिए पहुंचते हैं। सिर्फ बड़े शहरों से ही सालाना लगभग 50 करोड़ रुपए तक फीस वसूली का अनुमान है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह वसूली एक-दो महीने नहीं, बल्कि करीब दो साल से लगातार जारी है।
सौरभ शर्मा केस से बदनाम हुआ विभाग
लोग पूछ रहे हैं कि जब नियमों के नाम पर जनता से तुरंत पैसे लिए जा सकते हैं, तो फिर सुविधा नहीं देने पर फीस बंद क्यों नहीं की गई? आखिर विभाग ने लोगों को पहले से सच क्यों नहीं बताया?
आखिर किसकी है यह जवाबदेही?
परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के बयान ने विवाद कम करने के बजाय और बढ़ा दिया है। जनता से लगातार वसूली हो रही है, पर सुविधा अधूरी है। ऐसे में अब सरकार को साफ-साफ बताना होगा कि बिना कार्ड दिए फीस वसूली कब तक चलेगी और जनता के पैसों का पूरा हिसाब आखिर क्या है?
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