Point Of View With Anand: क्यों खड़ी हो रही हैं नई सेनाएं? सिस्टम से उठता भरोसा या पहचान की लड़ाई... क्या कहेंगे आप
Anand Pandey | Apr 11, 2026, 18:17 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. सिस्टम पर भरोसा कम होते ही पहचान की लड़ाई शुरू होती है। क्या संगठन और सेनाओं से समाज को ताकत मिलती है या विभाजन होता है? thesootr के एडिटर इन चीफ आनंद पांडे के लेख से जानें समाज के भीतर बन रही सेनाओं की हकीकत...
point of view with anand...
युद्ध... इन दिनों हम हर तरफ युद्ध की खबरें देख रहे हैं। टीवी स्क्रीन से लेकर मोबाइल तक, हर जगह सेना और संघर्ष की तस्वीरें हैं। खाड़ी देशों में सेनाएं सीमा पर डटी हैं। भारत में भी हमारी सेनाएं पूरी मजबूती से अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं, लेकिन... एक और तरह की सेना चुपचाप खड़ी हो रही है।
यह सेना सीमा पर नहीं, समाज के भीतर बन रही है। यह सरकार नहीं बना रही है, इसे बना रहा है आम आदमी। चतुरंगिणी सेनाएं... संगठनों की सेनाएं... पहचान की सेनाएं।
नमस्कार, मैं हूं आनंद और आप देख रहे हैं द सूत्र का बेहद खास कार्यक्रम पॉइंट ऑफ व्यू...। आज के इस कार्यक्रम में हम इसी सवाल की तह तक जाएंगे। ...तो चलिए शुरू करते हैं।
दोस्तों, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक सेना बनाने की बात कही है, लेकिन देश में ऐसी अनगिनत सेनाएं और संगठन पहले से मौजूद हैं... करणी सेना, बजरंग दल, शिवसेना, हिंदू वाहिनी, ब्राह्मण सेना, भीम आर्मी, मराठा क्रांति मोर्चा, पटेल पाटीदार आंदोलन समिति, नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल, इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया, यंग मेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन, जमात-ए-इस्लामी हिंद, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन। मैं यहां सैकड़ों और नाम गिना सकता हूं।
क्या as an individual यानी व्यक्तिगत रूप से मेरी सुनवाई नहीं होगी? इस सवाल पर ज्यादातर लोग हामी भरेंगे। इसकी वजह यह है कि सिस्टम में आम आदमी की सुनवाई नहीं होती, इसलिए वह संगठनों की छांव में आना चाहता है और यही वजह है कि हमारे समाज में ऐसी सेनाएं आकार ले रही हैं।
हर बात को जातिगत रंग दे देना, चाहे बात मेरिट लिस्ट की हो, फिल्म की हो, पांडे जी वाली कहानी की हो या किसी प्रशासनिक अधिकारी के कदाचार की... यह एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। कोई गलती करता है और उसे जातिगत रंग दे दिया जाता है...। फलां दलित है, इसलिए उसे प्रताड़ित किया जा रहा है...। ऐसा कहकर बचाव की कोशिश होती है।
हर समुदाय के भीतर यह भावना पैदा की जा सकती है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है, वे पीछे छूट रहे हैं। इससे रक्षात्मक संगठन बनते हैं... जैसे धर्म की रक्षा, जाति के अधिकार, आरक्षण या प्रतिनिधित्व। यह भावना वास्तविक भी हो सकती है और कई बार राजनीतिक रूप से पैदा भी की जाती है।
इंसान को लगता है कि वह अकेला है, इसलिए कमजोर है। समूह में उसे ताकत मिलती है। संगठन आपको आवाज और पहचान देता है, एक तरह की सामूहिक शक्ति का एहसास कराता है, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
वहीं, राजनीतिक रूप से भी संगठनों की अहमियत बढ़ जाती है। Political mobilization एक बड़ा फैक्टर है। नेता और दल समूहों को संगठित करते हैं। पहचान के आधार पर वोट बैंक बनता है। संगठन फिर केवल सामाजिक नहीं रहते, बल्कि राजनीतिक टूल बन जाते हैं।
आज के दौर में WhatsApp, Facebook और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर एक जैसे विचार बार-बार दिखाई देते हैं। इससे “हम बनाम वे” की सोच मजबूत होती है। इसे Echo Chamber Effect भी कहा जाता है।
इसके पीछे सीधा सा तर्क है कि जब एक समुदाय का संगठन मजबूत होता है तो दूसरे समुदाय में प्रतिक्रिया होती है कि यदि उनके पास संगठन है, तो हमें भी बनाना चाहिए। यह एक तरह का chain reaction बन जाता है।
ज्यादातर संगठन कटुता बढ़ा रहे हैं। कई बार कानून को हाथ में लेने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे संगठन अपनी पहचान को या तो श्रेष्ठ बताते हैं या खतरे में दिखाकर आक्रामकता पैदा करते हैं। धीरे-धीरे वे खुद को कानून से ऊपर मानने लगते हैं और सड़क पर ताकत दिखाने को प्राथमिकता देते हैं।
यहां Mob Psychology सक्रिय हो जाती है, व्यक्ति अकेले में जो नहीं करेगा, वह समूह में कर देता है। ऐसे संगठनों से नफरत बढ़ती है। इनका नैरेटिव अक्सर “हम बनाम वे” या “हमारे अधिकार बनाम उनके अधिकार” होता है।
इससे समाज में In-group and Out-group Bias मजबूत होता है- यानी अपने समूह को सही मानना और दूसरे को संदेह या दुश्मन की नजर से देखना। इसके कारण संवाद कम होता है और टकराव बढ़ता है।
इससे बचने के लिए व्यक्ति स्तर पर सोच की ट्रेनिंग जरूरी है। सबसे पहला बचाव यही है कि अपनी पहचान पर गर्व रखें, लेकिन दूसरों को कमतर न मानें। हर चीज को “हम बनाम वे” के नजरिये से न देखें। यह “Critical Thinking” से आता है- यानी हर मैसेज, हर वीडियो, हर भाषण को सवाल करके समझना।
इसके साथ ही शिक्षा और संवाद बेहद जरूरी हैं। स्कूल और कॉलेज में केवल डिग्री नहीं, सामाजिक समझ भी सिखानी होगी। अलग-अलग समुदायों के बीच संवाद बढ़ाना होगा। जब लोग एक-दूसरे को समझते हैं, तो डर और गलतफहमियां कम होती हैं।
मजबूत और निष्पक्ष संस्थाएं भी बेहद जरूरी हैं। कानून का समान रूप से लागू होना, पुलिस और प्रशासन का निष्पक्ष होना अहम है। जब लोगों को भरोसा होता है कि सिस्टम न्याय देगा, तब वे टकराव का रास्ता कम चुनते हैं।
राजनीति और नेतृत्व की जिम्मेदारी भी बहुत अहम है। यहीं सबसे बड़ा फर्क पड़ता है। यदि नेता पहचान की राजनीति को भड़काते हैं तो समस्या बढ़ती है। यदि वे समावेशी भाषा बोलते हैं तो तनाव कम होता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात है साझा पहचान को मजबूत करना।
हम अपनी-अपनी पहचान के साथ जी सकते हैं, लेकिन हमें अपनी सबसे बड़ी पहचान नहीं भूलनी चाहिए।
हम हिंदू, मुस्लिम या किसी जाति से पहले एक समाज हैं। एक देश हैं। हम सबमें भारतीय होने की भावना है।
क्योंकि जब पहचानें टकराती हैं तो समाज टूटता है... और जब पहचानें जुड़ती हैं तो राष्ट्र बनता है।
तो साथियो! बंटेंगे तो टूटेंगे और एक रहेंगे तो नेक रहेंगे।
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आनंद पांडे | Anand Pandey | Journalist Anand Pandey | सोशल आइडेंटिटी
युद्ध... इन दिनों हम हर तरफ युद्ध की खबरें देख रहे हैं। टीवी स्क्रीन से लेकर मोबाइल तक, हर जगह सेना और संघर्ष की तस्वीरें हैं। खाड़ी देशों में सेनाएं सीमा पर डटी हैं। भारत में भी हमारी सेनाएं पूरी मजबूती से अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं, लेकिन... एक और तरह की सेना चुपचाप खड़ी हो रही है।
यह सेना सीमा पर नहीं, समाज के भीतर बन रही है। यह सरकार नहीं बना रही है, इसे बना रहा है आम आदमी। चतुरंगिणी सेनाएं... संगठनों की सेनाएं... पहचान की सेनाएं।
हाल ही में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भी चतुरंगिणी सभा सेना बनाने का ऐलान किया है। यह खबर आई... और लगभग गुजर भी गई, लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है कि आखिर एक संत को सेना बनाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? क्या यह हमारे सिस्टम पर कमजोर पड़ते भरोसे का संकेत है? क्या आम आदमी की सरकार और सिस्टम में सुनवाई नहीं हो रही है?
दोस्तों, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक सेना बनाने की बात कही है, लेकिन देश में ऐसी अनगिनत सेनाएं और संगठन पहले से मौजूद हैं... करणी सेना, बजरंग दल, शिवसेना, हिंदू वाहिनी, ब्राह्मण सेना, भीम आर्मी, मराठा क्रांति मोर्चा, पटेल पाटीदार आंदोलन समिति, नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल, इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया, यंग मेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन, जमात-ए-इस्लामी हिंद, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन। मैं यहां सैकड़ों और नाम गिना सकता हूं।
आखिर इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है?
हर बात को जातिगत रंग दे देना, चाहे बात मेरिट लिस्ट की हो, फिल्म की हो, पांडे जी वाली कहानी की हो या किसी प्रशासनिक अधिकारी के कदाचार की... यह एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। कोई गलती करता है और उसे जातिगत रंग दे दिया जाता है...। फलां दलित है, इसलिए उसे प्रताड़ित किया जा रहा है...। ऐसा कहकर बचाव की कोशिश होती है।
दरअसल, इंसान हमेशा से समूह में अपनी पहचान ढूंढता आया है। जाति, धर्म और भाषा ऐसी पहचान हैं, जो आसानी से मिल जाती हैं। जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी पहचान खतरे में है तो वह ऐसे संगठनों की ओर आकर्षित होता है। इसे मनोविज्ञान में Social Identity Theory कहते हैं।
इंसान को लगता है कि वह अकेला है, इसलिए कमजोर है। समूह में उसे ताकत मिलती है। संगठन आपको आवाज और पहचान देता है, एक तरह की सामूहिक शक्ति का एहसास कराता है, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
वहीं, राजनीतिक रूप से भी संगठनों की अहमियत बढ़ जाती है। Political mobilization एक बड़ा फैक्टर है। नेता और दल समूहों को संगठित करते हैं। पहचान के आधार पर वोट बैंक बनता है। संगठन फिर केवल सामाजिक नहीं रहते, बल्कि राजनीतिक टूल बन जाते हैं।
आज के दौर में WhatsApp, Facebook और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर एक जैसे विचार बार-बार दिखाई देते हैं। इससे “हम बनाम वे” की सोच मजबूत होती है। इसे Echo Chamber Effect भी कहा जाता है।
इसके पीछे सीधा सा तर्क है कि जब एक समुदाय का संगठन मजबूत होता है तो दूसरे समुदाय में प्रतिक्रिया होती है कि यदि उनके पास संगठन है, तो हमें भी बनाना चाहिए। यह एक तरह का chain reaction बन जाता है।
संस्थाओं या सिस्टम पर भरोसा कम होना भी एक बड़ा कारण है। जब लोगों को लगता है कि सरकार, पुलिस या न्याय व्यवस्था उनकी नहीं सुन रही तो वे अपना संगठन बनाकर समाधान ढूंढते हैं।
यहां Mob Psychology सक्रिय हो जाती है, व्यक्ति अकेले में जो नहीं करेगा, वह समूह में कर देता है। ऐसे संगठनों से नफरत बढ़ती है। इनका नैरेटिव अक्सर “हम बनाम वे” या “हमारे अधिकार बनाम उनके अधिकार” होता है।
इससे समाज में In-group and Out-group Bias मजबूत होता है- यानी अपने समूह को सही मानना और दूसरे को संदेह या दुश्मन की नजर से देखना। इसके कारण संवाद कम होता है और टकराव बढ़ता है।
इसका सीधा असर सामाजिक एकता पर पड़ता है। जब समाज छोटे-छोटे पहचान आधारित समूहों में बंट जाता है, तो “भारतीय” या “नागरिक” की साझा पहचान कमजोर पड़ जाती है। राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इसे fragmentation कहा जाता है- जहां समाज टुकड़ों में बंट जाता है।
इसके साथ ही शिक्षा और संवाद बेहद जरूरी हैं। स्कूल और कॉलेज में केवल डिग्री नहीं, सामाजिक समझ भी सिखानी होगी। अलग-अलग समुदायों के बीच संवाद बढ़ाना होगा। जब लोग एक-दूसरे को समझते हैं, तो डर और गलतफहमियां कम होती हैं।
मजबूत और निष्पक्ष संस्थाएं भी बेहद जरूरी हैं। कानून का समान रूप से लागू होना, पुलिस और प्रशासन का निष्पक्ष होना अहम है। जब लोगों को भरोसा होता है कि सिस्टम न्याय देगा, तब वे टकराव का रास्ता कम चुनते हैं।
राजनीति और नेतृत्व की जिम्मेदारी भी बहुत अहम है। यहीं सबसे बड़ा फर्क पड़ता है। यदि नेता पहचान की राजनीति को भड़काते हैं तो समस्या बढ़ती है। यदि वे समावेशी भाषा बोलते हैं तो तनाव कम होता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात है साझा पहचान को मजबूत करना।
हम अपनी-अपनी पहचान के साथ जी सकते हैं, लेकिन हमें अपनी सबसे बड़ी पहचान नहीं भूलनी चाहिए।
हम हिंदू, मुस्लिम या किसी जाति से पहले एक समाज हैं। एक देश हैं। हम सबमें भारतीय होने की भावना है।
क्योंकि जब पहचानें टकराती हैं तो समाज टूटता है... और जब पहचानें जुड़ती हैं तो राष्ट्र बनता है।
- चुनाव हमें करना है...
- हमें सेनाएं बनानी हैं...
- या समाज बनाना है...।
तो साथियो! बंटेंगे तो टूटेंगे और एक रहेंगे तो नेक रहेंगे।
ये भी पढ़ें...
Point Of View With Anand : बच्चे बनाम सोशल मीडिया... एक खतरनाक जाल, जिसे हमने खुद अपने घरों में बुला लिया
Point Of View With Anand : आंकड़ों की कालिख में डूबा सिस्टम... यह विकास नहीं, जनता के साथ धोखा है!
Point Of View With Anand : रील लाइफ कभी रियल नहीं हो सकती?
आनंद पांडे | Anand Pandey | Journalist Anand Pandey | सोशल आइडेंटिटी
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