Point Of View With Anand : अब 'माइनस 40' लाने वाले डॉक्टर भी सर्जरी करेंगे!
Anand Pandey | Jan 16, 2026, 17:02 IST
Photograph: (thesootr)
NEET PG 2025 के लिए कटऑफ में भारी कटौती से माइनस 40 परसेंटाइल वाले भी डॉक्टर बन सकेंगे। यह फैसला देश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए खतरे की घंटी है। the sootr के एडिटर इन चीफ आनंद पांडे के लेख से जानिए इस खतरनाक फैसले के बारे में विस्तार से ।
point of view with anand...
जनाब! अस्पताल में डॉक्टर साहब से दवाईयों का पर्चा लिखवाते वक्त या ऑपरेशन करवाने से पहले उनसे ये सवाल जरूर पूछ लीजिए कि नीट पीजी में उनके कितने नंबर आए थे? कहीं ऐसा न हो कि डॉक्टर साहब माइनस 40 परसेंटाइल हासिल करके डॉक्टर बने हों, यदि ऐसा हो तो कतई उनसे इलाज न कराएं। मेरी यह आपको सलाह और चेतावनी दोनों हैं। अब मैं ये बात क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको लेख को अंत तक पढ़ना होगा।
नमस्कार! मैं हूं आनंद और आप पढ़ रहे हैं Point Of View. आज की खबर कोई सामान्य खबर नहीं है। यह खबर डराने वाली है। दोस्तों, आज भारत उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ सामाजिक न्याय का नारा है और दूसरी तरफ इंसानी जिंदगियों के साथ किया जा रहा सबसे बड़ा प्रयोग। यह प्रयोग किसी लैब में नहीं हो रहा, यह प्रयोग आने वाले सालों में अस्पतालों में होगा। ऑपरेशन थिएटरों में होगा और इसकी कीमत हर मरीज चुकाएगा।
देश की सबसे डरावनी खबर यह नहीं है कि महंगाई बढ़ रही है। बेरोजगारी बढ़ रही है या सीमाओं पर तनाव है। सबसे चिंताजनक खबर यह है कि भारत अब ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने जा रहा है, जिनकी योग्यता पर सवाल नहीं, सीधा खतरे का निशान लगने वाला है।
अब हालात यह हैं कि 800 नंबर की NEET पीजी में माइनस 40 नंबर लाने वाले उम्मीदवार भी भारत की सबसे बड़ी मेडिकल पढ़ाई में दाखिला ले सकेंगे। यहां सबसे बड़ी मेडिकल पढ़ाई से मेरा मतलब MD यानी Doctor of Medicine और MS मतलब Master of Surgery से है। यह बात सुनकर यदि आपके रोंगटे खड़े नहीं होते तो यह समझ लीजिए कि आपने अभी इस फैसले की भयावहता को ठीक से समझा ही नहीं है।
दरअसल, NBEMS ने NEET पीजी 2025 के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में भारी कटौती की है। जनरल और EWS कैटेगरी के लिए जहां पहले 50 परसेंटाइल यानी 276 नंबर अनिवार्य थे, अब उसे घटाकर 7 परसेंटाइल कर दिया गया है, यानी सिर्फ 103 नंबर। दिव्यांग सामान्य वर्ग के लिए यह सीमा 45 परसेंटाइल यानी 255 नंबर से गिराकर 5 परसेंटाइल यानी 90 नंबर कर दी गई है। और सबसे बड़ा, सबसे खतरनाक फैसला OBC, SC और ST वर्ग के लिए लिया गया है, जहां पहले 40 परसेंटाइल यानी 235 नंबर की जरूरत थी, अब परसेंटाइल शून्य यानी जीरो कर दी गई है। शून्य परसेंटाइल का सीधा मतलब है कि माइनस 40 नंबर पर भी उम्मीदवार तीसरे राउंड की काउंसलिंग में शामिल हो सकते हैं और स्पेशलिस्ट डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर सकते हैं।
आंकड़े कहते हैं कि देश में इस वक्त NEET पीजी की कुल 70 हजार 645 सीटें हैं। इनमें से 33 हजार 416 सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं। 21 हजार 418 सीटें प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में हैं 10 हजार 621 सीटें कॉलेज ऑफ फिजिक्स फिजिशियंस एंड सर्जन्स यानी CPS में हैं और 14 हजार 190 सीटें डिप्लोमेट ऑफ नेशनल बोर्ड यानी DNB में हैं। इन कुल सीटों में से लगभग 25 फीसदी सीटें खाली रह गईं और इसी को आधार बनाकर कटऑफ गिराने का फैसला लिया गया। यह बताता है कि बड़ी संख्या में छात्र पीजी स्तर की पढ़ाई के लिए अकादमिक और क्लीनिकल रूप से तैयार नहीं हैं। लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार करने के बजाय सिस्टम ने आसान रास्ता चुनकर योग्यता की परिभाषा ही बदल दी है।
दोस्तों, यह वही NEET PG है, जिसे न्यूनतम योग्यता की कसौटी माना जाता था। जिसका मतलब था कि MBBS के बाद जो छात्र इस परीक्षा को पास कर रहा है, वह स्पेशलाइजेशन की जिम्मेदारी उठाने लायक है। आज वही परीक्षा न्यूनतम योग्यता नहीं, न्यूनतम औपचारिकता बनकर रह गई है। फेल होना अब अयोग्यता नहीं रहा, बल्कि प्रवेश का एक वैकल्पिक रास्ता बन चुका है।
इस फैसले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। शिवसेना (UBT) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि 800 में से माइनस 40 नंबर लाने पर भी डॉक्टर की पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री मिल सकती है और सिर्फ सीटें भरने के चक्कर में देश ऐसे स्पेशलिस्ट तैयार करेगा, जिनके हाथ में इंसानी जिंदगियां होंगी। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करना होगा, ताकि कमी पूरी करने के नाम पर गुणवत्ता से समझौता न किया जाए।
इस बयान के जवाब में कांग्रेस नेता उदित राज ने जो कहा, उसने पूरी बहस को शिक्षा से हटाकर जाति के दलदल में धकेल दिया है। उनका कहना है कि चतुर्वेदी हैं तो चतुर्वेदी ही हैं, उसी से पता चल जाता है कि वे आरक्षण पर कहां खड़ी होंगी। यानी सवाल योग्यता का था, जवाब जाति पर दिया गया। यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है। यहां जब भी शिक्षा, स्वास्थ्य या प्रशासन की गुणवत्ता पर सवाल उठता है, उसे तुरंत जाति के चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है, ताकि असली मुद्दा ही गायब हो जाए।
यहीं से आरक्षण व्यवस्था पर भी सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। आरक्षण का विचार कभी गलत नहीं था। उसका मकसद उन वर्गों को अवसर देना था, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से शिक्षा और संसाधनों से दूर रखा गया। लेकिन आज जो हो रहा है, वह अवसर देना नहीं है। यह बिना तैयारी, बिना बुनियाद और बिना न्यूनतम क्षमता के लोगों को सबसे संवेदनशील पेशे में धकेल देना है।
जिस छात्र को स्कूल स्तर पर सही शिक्षा नहीं मिली, जिसे कॉलेज में ठीक से ट्रेनिंग नहीं मिली, जिसे MBBS के दौरान क्लीनिकल समझ नहीं बन पाई, उसे सीधे MD और MS की कुर्सी पर बैठा देना उस छात्र के साथ भी अन्याय है। क्योंकि वह जिंदगी भर अपनी कमी ढोता रहेगा। और मरीज के साथ तो यह सीधा अपराध है, क्योंकि उसे यह जानने का कोई तरीका नहीं होगा कि जो हाथ उसका इलाज कर रहे हैं, वे वास्तव में सक्षम हैं या नहीं।
NEET का मतलब था न्यूनतम योग्यता, लेकिन हमारे नीति-निर्माताओं ने उसे बना दिया, न्यूनतम शर्म। आज हालत यह है कि पास होने वाले बाहर हैं और फेल होने वाले मेडिकल कॉलेज में हैं। यह सिर्फ मेरिट की हत्या नहीं है, यह मेहनत का सार्वजनिक अपमान है।
वहीं यदि आरक्षण की बात करें तो इसका मतलब था, सीढ़ी पकड़ाकर ऊपर लाना। लेकिन आज यह बन चुका है, बिना सीढ़ी चढ़ाए छत पर फेंक देना। जिस छात्र को स्कूल में सही शिक्षा नहीं मिली, उसे सीधे ऑपरेशन थिएटर में डाल देना। उस छात्र के साथ भी क्रूरता है, और मरीज के साथ तो सीधा अपराध।
सिस्टम जानता है कि कमजोर शिक्षा, कमजोर डॉक्टर, ज्यादा मौतें...फिर भी चुप है। क्यों? क्योंकि वोट बैंक ज्यादा कीमती है और मरीज की जान सस्ती। यह नीति नहीं, राजनीतिक कायरता है। याद रखिए, अयोग्य डॉक्टर किसी एक जाति का नहीं होता। वह हर जाति के मरीज को मारता है। यह बहस आरक्षण की नहीं, यह बहस है, जिंदा रहने के अधिकार की। अगर अब भी हम चुप रहे तो अगली बार अस्पताल में डॉक्टर नहीं, सिस्टम आपका पोस्टमार्टम करेगा।
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point of view with anand | द सूत्र | मध्यप्रदेश | प्वाइंट ऑफ व्यू | Journalist Anand Pandey | आनंद पांडे | पत्रकार आनंद पांडेय | प्वाइंट ऑफ व्यू विद आनंद
जनाब! अस्पताल में डॉक्टर साहब से दवाईयों का पर्चा लिखवाते वक्त या ऑपरेशन करवाने से पहले उनसे ये सवाल जरूर पूछ लीजिए कि नीट पीजी में उनके कितने नंबर आए थे? कहीं ऐसा न हो कि डॉक्टर साहब माइनस 40 परसेंटाइल हासिल करके डॉक्टर बने हों, यदि ऐसा हो तो कतई उनसे इलाज न कराएं। मेरी यह आपको सलाह और चेतावनी दोनों हैं। अब मैं ये बात क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको लेख को अंत तक पढ़ना होगा।
नमस्कार! मैं हूं आनंद और आप पढ़ रहे हैं Point Of View. आज की खबर कोई सामान्य खबर नहीं है। यह खबर डराने वाली है। दोस्तों, आज भारत उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ सामाजिक न्याय का नारा है और दूसरी तरफ इंसानी जिंदगियों के साथ किया जा रहा सबसे बड़ा प्रयोग। यह प्रयोग किसी लैब में नहीं हो रहा, यह प्रयोग आने वाले सालों में अस्पतालों में होगा। ऑपरेशन थिएटरों में होगा और इसकी कीमत हर मरीज चुकाएगा।
देश की सबसे डरावनी खबर यह नहीं है कि महंगाई बढ़ रही है। बेरोजगारी बढ़ रही है या सीमाओं पर तनाव है। सबसे चिंताजनक खबर यह है कि भारत अब ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने जा रहा है, जिनकी योग्यता पर सवाल नहीं, सीधा खतरे का निशान लगने वाला है।
जी हां, NEET पीजी 2025 के लिए नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज यानी NBEMS ने जो फैसला लिया है, वह सिर्फ परीक्षा का कटऑफ बदलने का फैसला नहीं है, यह पूरे चिकित्सा तंत्र की रीढ़ तोड़ने वाला कदम है।
दरअसल, NBEMS ने NEET पीजी 2025 के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में भारी कटौती की है। जनरल और EWS कैटेगरी के लिए जहां पहले 50 परसेंटाइल यानी 276 नंबर अनिवार्य थे, अब उसे घटाकर 7 परसेंटाइल कर दिया गया है, यानी सिर्फ 103 नंबर। दिव्यांग सामान्य वर्ग के लिए यह सीमा 45 परसेंटाइल यानी 255 नंबर से गिराकर 5 परसेंटाइल यानी 90 नंबर कर दी गई है। और सबसे बड़ा, सबसे खतरनाक फैसला OBC, SC और ST वर्ग के लिए लिया गया है, जहां पहले 40 परसेंटाइल यानी 235 नंबर की जरूरत थी, अब परसेंटाइल शून्य यानी जीरो कर दी गई है। शून्य परसेंटाइल का सीधा मतलब है कि माइनस 40 नंबर पर भी उम्मीदवार तीसरे राउंड की काउंसलिंग में शामिल हो सकते हैं और स्पेशलिस्ट डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर सकते हैं।
यह फैसला 2025-26 के एकेडमिक सेशन के लिए लिया गया है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि पहले दो राउंड की काउंसलिंग के बाद भी अपेक्षित तादाद में कैंडिडेट नहीं मिले और करीब 18 हजार पीजी सीटें खाली रह गईं। यानी समस्या यह नहीं मानी गई कि उम्मीदवार तैयार क्यों नहीं हैं, समस्या यह मानी गई कि सीटें खाली क्यों हैं। और जब सोच का सेंटर सीट हो जाए तो मरीज की जान अपने आप हाशिए पर चली जाती है।
दोस्तों, यह वही NEET PG है, जिसे न्यूनतम योग्यता की कसौटी माना जाता था। जिसका मतलब था कि MBBS के बाद जो छात्र इस परीक्षा को पास कर रहा है, वह स्पेशलाइजेशन की जिम्मेदारी उठाने लायक है। आज वही परीक्षा न्यूनतम योग्यता नहीं, न्यूनतम औपचारिकता बनकर रह गई है। फेल होना अब अयोग्यता नहीं रहा, बल्कि प्रवेश का एक वैकल्पिक रास्ता बन चुका है।
इस फैसले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। शिवसेना (UBT) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि 800 में से माइनस 40 नंबर लाने पर भी डॉक्टर की पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री मिल सकती है और सिर्फ सीटें भरने के चक्कर में देश ऐसे स्पेशलिस्ट तैयार करेगा, जिनके हाथ में इंसानी जिंदगियां होंगी। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करना होगा, ताकि कमी पूरी करने के नाम पर गुणवत्ता से समझौता न किया जाए।
इस बयान के जवाब में कांग्रेस नेता उदित राज ने जो कहा, उसने पूरी बहस को शिक्षा से हटाकर जाति के दलदल में धकेल दिया है। उनका कहना है कि चतुर्वेदी हैं तो चतुर्वेदी ही हैं, उसी से पता चल जाता है कि वे आरक्षण पर कहां खड़ी होंगी। यानी सवाल योग्यता का था, जवाब जाति पर दिया गया। यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है। यहां जब भी शिक्षा, स्वास्थ्य या प्रशासन की गुणवत्ता पर सवाल उठता है, उसे तुरंत जाति के चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है, ताकि असली मुद्दा ही गायब हो जाए।
फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन यानी FAIMA ने इस फैसले का विरोध किया है। FAIMA ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को चिट्ठी लिखकर चेताया है कि यह फैसला मेडिकल एजुकेशन को बर्बाद कर देगा। संगठन का कहना है कि यह कदम प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को सीधे-सीधे फायदा पहुंचाएगा, जहां अरबों रुपए खेल है। जब कटऑफ गिरता है तो फीस भरने वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ती है और गुणवत्ता का सवाल पीछे छूट जाता है। FAIMA ने यहां तक चेतावनी दी है कि यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो देशव्यापी विरोध किया जाएगा।
जिस छात्र को स्कूल स्तर पर सही शिक्षा नहीं मिली, जिसे कॉलेज में ठीक से ट्रेनिंग नहीं मिली, जिसे MBBS के दौरान क्लीनिकल समझ नहीं बन पाई, उसे सीधे MD और MS की कुर्सी पर बैठा देना उस छात्र के साथ भी अन्याय है। क्योंकि वह जिंदगी भर अपनी कमी ढोता रहेगा। और मरीज के साथ तो यह सीधा अपराध है, क्योंकि उसे यह जानने का कोई तरीका नहीं होगा कि जो हाथ उसका इलाज कर रहे हैं, वे वास्तव में सक्षम हैं या नहीं।
यह कहना जरूरी है कि अयोग्य डॉक्टर किसी एक जाति का नहीं होता। वह हर जाति के मरीज को नुकसान पहुंचाता है। अस्पताल में भर्ती मरीज की कोई जाति नहीं होती, वहां सिर्फ उसकी हालत होती है। मौत के सामने कोई आरक्षण नहीं चलता। फिर इलाज में यह प्रयोग क्यों? यह न्याय नहीं है? यह मरीजों की हत्या की सरकारी तैयारी है। मेरा सीधा सवाल है कि जिस छात्र को बायोलॉजी तक की बुनियाद नहीं आती, क्या उसे इंसान का सीना चीरने का लाइसेंस दिया जाना चाहिए? अगर जवाब हां है तो फिर अस्पतालों में मौतों के लिए रोना बंद कर दीजिए।
वहीं यदि आरक्षण की बात करें तो इसका मतलब था, सीढ़ी पकड़ाकर ऊपर लाना। लेकिन आज यह बन चुका है, बिना सीढ़ी चढ़ाए छत पर फेंक देना। जिस छात्र को स्कूल में सही शिक्षा नहीं मिली, उसे सीधे ऑपरेशन थिएटर में डाल देना। उस छात्र के साथ भी क्रूरता है, और मरीज के साथ तो सीधा अपराध।
क्या डॉक्टर भगवान है या प्रयोगशाला का स्टूडेंट? आज भारत के अस्पताल एक्सपेरिमेंटल लैब बनते जा रहे हैं। मरीज वहां इलाज कराने जाता है और बन जाता है प्रैक्टिकल का मटेरियल। जब ऑपरेशन फेल होता है तो जवाब मिलता है कि कॉम्प्लिकेशन हो गया। नहीं साहब, कॉम्प्लिकेशन नहीं, अयोग्यता हो गई है।
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