Point Of View With Anand : आंकड़ों की कालिख में डूबा सिस्टम... यह विकास नहीं, जनता के साथ धोखा है!
Anand Pandey | Feb 14, 2026, 17:22 IST
Photograph: (thesootr)
मध्यप्रदेश के आंकड़े विकास के दावों को झूठा साबित कर रहे हैं। पानी, शिक्षा और सुरक्षा व्यवस्था की हालत बेहद खराब है। thesootr के एडिटर इन चीफ आनंद पांडे के लेख से जानिए, आंकड़ों की हकीकत को उजागर करती तस्वीर...
सोशल मीडिया में दिखता है कि मुल्क रोशन है,
मगर चिराग तले अंधेरा आज भी बहुत गहरा है।
हां, ऐसा ही है...। सरकारी फाइलों में तस्वीर साफ है, लेकिन हकीकत धूल में लिपटी है। सोशल मीडिया में भले ही विकास के गीत गाए जा रहे हों, योजनाओं की सफलता के ढोल पीटे जा रहे हों, लेकिन जमीन पर हालात स्याह हैं। आम आदमी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहा है। चिराग तले अंधेरा होने की कहावत अब पुरानी हो चुकी है, क्योंकि अब अंधेरा सिर्फ नीचे नहीं रहा, चारों तरफ फैल रहा है। सरकारी कागजों में चमक है, लेकिन जनता की जिंदगी में घुटन है। और सिस्टम? वह तो जनता को जीने नहीं, धीरे-धीरे खत्म होने के लिए छोड़ चुका है।
मध्यप्रदेश अब देश में बदनाम हो रहा है। पानी में जहर है। शिक्षा व्यवस्था बर्बाद हो रही है और सुरक्षा... वह तो भगवान भरोसे ही है। स्याह आंकड़े सिर्फ खराब प्रदर्शन नहीं हैं, ये कलंक हैं, जो हुक्मरानों की नाकामी को चीख-चीखकर बयां कर रहे हैं।
नमस्कार! मैं हूं आनंद और आप पढ़ रहे हैं 'द सूत्र' का बेहद खास आर्टिकल पॉइंट ऑफ व्यू। आज के इस एपिसोड में हम आंकड़ों की बात कर रहे हैं। ऐसे ही आंकड़ों के बूते सरकारें उजली तस्वीर पेश करती हैं। आज सरकारी कागजों में तो चमक है, लेकिन जमीनी सच्चाई इसके इतर है। हाल ही में कुछ मामलों में मध्यप्रदेश पर बदनुमा दाग लगा है। पिछले दिनों प्रदेश संसद में गूंजा था और इसकी वजह गलत थी। खराब आंकड़े थे।
क्योंकि यदि पानी ही जहर बन गया तो बाकी विकास की बातें जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने से ज्यादा कुछ नहीं हैं।
Functionality Assessment Report के मुताबिक, सिर्फ 63.3 प्रतिशत पानी के सैंपल पास हुए हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 76 प्रतिशत है। यानी बड़ी आबादी तक दूषित पानी पहुंच रहा है। यह आंकड़ा किसी विपक्षी नेता या पार्टी की साजिश नहीं है, सिस्टम के अपने आंकड़े हैं, जो बता रहे हैं कि हालात कितने जानलेवा हैं। ये सैंपल सितंबर-अक्टूबर 2024 में 15 हजार से ज्यादा ग्रामीण घरों से लिए गए थे।
सबसे ज्यादा शर्मनाक अस्पतालों की हालत है। जहां लोगों को बचाने की जिम्मेदारी है, वहां सिर्फ 12 प्रतिशत पानी के सैंपल जांच में पास हुए हैं। यानी 88 प्रतिशत अस्पताल मरीजों को दूषित पानी पिला रहे हैं। सोचिए... ऑपरेशन के बाद का मरीज, आईसीयू में भर्ती लोग, नवजात बच्चे… सब इसी पानी पर निर्भर हैं। यह खराब व्यवस्था नहीं, यह सीधे जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।
स्कूलों में 26.7 प्रतिशत पानी के सैंपल फेल हैं। बच्चे रोज जहर पीकर पढ़ाई कर रहे हैं और सिस्टम सो रहा है। आदिवासी बहुल अनूपपुर और डिंडौरी जिले में एक भी सुरक्षित सैंपल नहीं मिला हैं... हां, एक भी नहीं। बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा में आधे से ज्यादा सैंपल दूषित मिले हैं। ये आंकड़े कलंक हैं, जो मध्यप्रदेश को देश भर में बदनाम कर रहे हैं। लोग परेशान हैं, बीमार हैं, मर रहे हैं और सरकार? वह तो योजनाओं की चमक में अंधी हो चुकी है।
क्योंकि अगर आने वाली पीढ़ी को ही सिस्टम ने कुचल दिया तो भविष्य का ढांचा खुद-ब-खुद धराशायी हो जाएगा।
बचे हुए स्कूलों की हालत भी अच्छी नहीं है। 21 हजार 193 मिडिल स्कूलों में 20 से कम बच्चे हैं। 29 हजार 486 स्कूलों में 40 से कम छात्र हैं। 8 हजार 533 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और 28 हजार 716 स्कूलों में सिर्फ दो शिक्षक हैं। यह शिक्षा व्यवस्था नहीं, यह मरता हुआ ढांचा है।
और बजट? वह तो हर साल अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रहा है। 2010-11 में शिक्षा का बजट 6 हजार 374 करोड़ रुपए था, जो साल 2025-26 में बढ़कर 36 हजार 581 करोड़ रुपए हो गया है, लेकिन इसी बीच सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 1 करोड़ 33 लाख से घटकर 79 लाख 39 हजार रह गई है। यानी 54 लाख से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूल के सिस्टम से बाहर धकेल दिए गए हैं। यह सिस्टम की असफलता है।
मैं कहता हूं कि यह स्थिति चिंताजनक नहीं, क्रूर है। सोचिए...27 हजार स्कूलों में आज भी शौचालय नहीं हैं, जिनमें 9 हजार से ज्यादा गर्ल्स स्कूल हैं। इसका सीधा असर बच्चियों पर पड़ रहा है, जो मजबूरी में पढ़ाई छोड़ रही हैं, जीवन बर्बाद कर रही हैं।
रही सही कसर सामाजिक तनाव वाली घटनाएं पूरी कर रही हैं। बैतूल जिले के धाबा गांव में अब्दुल नईम द्वारा बनाए गए निजी स्कूल पर बुलडोजर चलाने का मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है।
सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने इस मुद्दे को उठाया है। नईम ने अपनी जमीन पर 20 लाख से यह स्कूल बनवाया था। इसका मकसद बच्चों को बेहतर शिक्षा देना था, लेकिन मदरसा होने की अफवाहों पर प्रशासन ने बिना जांच के बुलडोजर चला दिया। यह कार्रवाई शिक्षा पर कलंक है, जहां पहले से स्कूलों की कमी है।
स्कूल शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 83 हजार 249 प्राइमरी स्कूलों में से 211 के पास कोई भवन नहीं है, कई खुले में चल रहे हैं। ऐसे में नईम की पहल सराहनीय थी, लेकिन अफवाहों ने इसे बर्बाद कर दिया। यह सिस्टम की सांप्रदायिक सड़ांध है, जो मध्यप्रदेश को देश में और बदनाम कर रही है!
यह तो और ज्यादा डरावनी है। साल 2020 में 48 हजार अनट्रेस्ड मिसिंग पर्सन थे, जो 2023 में बढ़कर 60 हजार हो गए।
आखिर यह सब किस विकास का हिस्सा है? अगर पानी जहर है, स्कूल तबाह हो रहे हैं, लोग गायब हो रहे हैं तो विकास का दावा जनता को ठगने से ज्यादा क्या है? योजनाओं की चमक पोस्टरों में है, लेकिन जमीन पर लोग डर, बीमारी और असुरक्षा के बीच जीने को मजबूर हैं।
ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, यह लोगों की जिंदगी का हिसाब है, बच्चों के भविष्य का सवाल है, महिलाओं की सुरक्षा का सवाल है। अगर सिस्टम अब भी नहीं जागा तो आने वाला समय और ज्यादा खतरनाक होगा। क्योंकि मुल्क को रोशन दिखाया जा सकता है, लेकिन जब व्यवस्था अंधेरे में डूब जाती है, तब वही अंधेरा आने वाली पीढ़ियों का भविष्य निगल जाता है।
Point Of View With Anand Anand Pandey | Journalist Anand Pandey आनंद पांडे
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मगर चिराग तले अंधेरा आज भी बहुत गहरा है।
हां, ऐसा ही है...। सरकारी फाइलों में तस्वीर साफ है, लेकिन हकीकत धूल में लिपटी है। सोशल मीडिया में भले ही विकास के गीत गाए जा रहे हों, योजनाओं की सफलता के ढोल पीटे जा रहे हों, लेकिन जमीन पर हालात स्याह हैं। आम आदमी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहा है। चिराग तले अंधेरा होने की कहावत अब पुरानी हो चुकी है, क्योंकि अब अंधेरा सिर्फ नीचे नहीं रहा, चारों तरफ फैल रहा है। सरकारी कागजों में चमक है, लेकिन जनता की जिंदगी में घुटन है। और सिस्टम? वह तो जनता को जीने नहीं, धीरे-धीरे खत्म होने के लिए छोड़ चुका है।
मध्यप्रदेश अब देश में बदनाम हो रहा है। पानी में जहर है। शिक्षा व्यवस्था बर्बाद हो रही है और सुरक्षा... वह तो भगवान भरोसे ही है। स्याह आंकड़े सिर्फ खराब प्रदर्शन नहीं हैं, ये कलंक हैं, जो हुक्मरानों की नाकामी को चीख-चीखकर बयां कर रहे हैं।
नमस्कार! मैं हूं आनंद और आप पढ़ रहे हैं 'द सूत्र' का बेहद खास आर्टिकल पॉइंट ऑफ व्यू। आज के इस एपिसोड में हम आंकड़ों की बात कर रहे हैं। ऐसे ही आंकड़ों के बूते सरकारें उजली तस्वीर पेश करती हैं। आज सरकारी कागजों में तो चमक है, लेकिन जमीनी सच्चाई इसके इतर है। हाल ही में कुछ मामलों में मध्यप्रदेश पर बदनुमा दाग लगा है। पिछले दिनों प्रदेश संसद में गूंजा था और इसकी वजह गलत थी। खराब आंकड़े थे।
सबसे पहले पानी की बात...
देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी से 33 लोगों की मौत हो जाती है और सिस्टम बस कुछ दिन हिलता है, फिर सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश शुरू हो जाती है, लेकिन यह सिर्फ एक शहर की दास्तां नहीं है, पूरे प्रदेश की हकीकत है। जल जीवन मिशन की रिपोर्ट खुद कह रही है कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में हर तीसरा गिलास पानी पीने लायक नहीं है। लोग रोज जहर पी रहे हैं।
सबसे ज्यादा शर्मनाक अस्पतालों की हालत है। जहां लोगों को बचाने की जिम्मेदारी है, वहां सिर्फ 12 प्रतिशत पानी के सैंपल जांच में पास हुए हैं। यानी 88 प्रतिशत अस्पताल मरीजों को दूषित पानी पिला रहे हैं। सोचिए... ऑपरेशन के बाद का मरीज, आईसीयू में भर्ती लोग, नवजात बच्चे… सब इसी पानी पर निर्भर हैं। यह खराब व्यवस्था नहीं, यह सीधे जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।
स्कूलों में 26.7 प्रतिशत पानी के सैंपल फेल हैं। बच्चे रोज जहर पीकर पढ़ाई कर रहे हैं और सिस्टम सो रहा है। आदिवासी बहुल अनूपपुर और डिंडौरी जिले में एक भी सुरक्षित सैंपल नहीं मिला हैं... हां, एक भी नहीं। बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा में आधे से ज्यादा सैंपल दूषित मिले हैं। ये आंकड़े कलंक हैं, जो मध्यप्रदेश को देश भर में बदनाम कर रहे हैं। लोग परेशान हैं, बीमार हैं, मर रहे हैं और सरकार? वह तो योजनाओं की चमक में अंधी हो चुकी है।
अब शिक्षा की बारी...
पिछले एक दशक में देश में 93 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं। संसद में यह आंकड़ा चीख रहा है। मध्यप्रदेश में हालत और ज्यादा खराब हैं। साल 2013-14 में 1 लाख 14 हजार 972 सरकारी स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर 82 हजार 128 रह गए। यानी 32 हजार 844 स्कूलों में ताला डल गया। यह सिर्फ संख्या नहीं, लाखों बच्चों के सपनों की हत्या है।
और बजट? वह तो हर साल अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रहा है। 2010-11 में शिक्षा का बजट 6 हजार 374 करोड़ रुपए था, जो साल 2025-26 में बढ़कर 36 हजार 581 करोड़ रुपए हो गया है, लेकिन इसी बीच सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 1 करोड़ 33 लाख से घटकर 79 लाख 39 हजार रह गई है। यानी 54 लाख से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूल के सिस्टम से बाहर धकेल दिए गए हैं। यह सिस्टम की असफलता है।
मैं कहता हूं कि यह स्थिति चिंताजनक नहीं, क्रूर है। सोचिए...27 हजार स्कूलों में आज भी शौचालय नहीं हैं, जिनमें 9 हजार से ज्यादा गर्ल्स स्कूल हैं। इसका सीधा असर बच्चियों पर पड़ रहा है, जो मजबूरी में पढ़ाई छोड़ रही हैं, जीवन बर्बाद कर रही हैं।
रही सही कसर सामाजिक तनाव वाली घटनाएं पूरी कर रही हैं। बैतूल जिले के धाबा गांव में अब्दुल नईम द्वारा बनाए गए निजी स्कूल पर बुलडोजर चलाने का मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है।
सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने इस मुद्दे को उठाया है। नईम ने अपनी जमीन पर 20 लाख से यह स्कूल बनवाया था। इसका मकसद बच्चों को बेहतर शिक्षा देना था, लेकिन मदरसा होने की अफवाहों पर प्रशासन ने बिना जांच के बुलडोजर चला दिया। यह कार्रवाई शिक्षा पर कलंक है, जहां पहले से स्कूलों की कमी है।
स्कूल शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 83 हजार 249 प्राइमरी स्कूलों में से 211 के पास कोई भवन नहीं है, कई खुले में चल रहे हैं। ऐसे में नईम की पहल सराहनीय थी, लेकिन अफवाहों ने इसे बर्बाद कर दिया। यह सिस्टम की सांप्रदायिक सड़ांध है, जो मध्यप्रदेश को देश में और बदनाम कर रही है!
अब सुरक्षा की तस्वीर...
इस खराब आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है। इन 60 हजार में करीब 39 हजार वयस्क महिलाएं हैं, 3 हजार 725 नाबालिग लड़कियां और 1 हजार 110 लड़के हैं। यानी कुल 60 हजार में से करीब 44 हजार महिलाएं और बच्चे... यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, समाज के सबसे कमजोर वर्ग की असुरक्षा का खुला घाव है। हर साल ऑपरेशन मुस्कान चलाया जाता है, लेकिन जमीन पर यह समस्या के मुकाबले बहुत छोटा साबित हो रहा है।
ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, यह लोगों की जिंदगी का हिसाब है, बच्चों के भविष्य का सवाल है, महिलाओं की सुरक्षा का सवाल है। अगर सिस्टम अब भी नहीं जागा तो आने वाला समय और ज्यादा खतरनाक होगा। क्योंकि मुल्क को रोशन दिखाया जा सकता है, लेकिन जब व्यवस्था अंधेरे में डूब जाती है, तब वही अंधेरा आने वाली पीढ़ियों का भविष्य निगल जाता है।
Point Of View With Anand Anand Pandey | Journalist Anand Pandey आनंद पांडे
ये खबर भी पढ़िए...
Point Of View With Anand : रील लाइफ कभी रियल नहीं हो सकती?
Point Of View With Anand : अब 'माइनस 40' लाने वाले डॉक्टर भी सर्जरी करेंगे!
Point Of View With Anand : ठंड मौसम में नहीं, सिस्टम में जम गई है...
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