समझें क्या है पूरा मामला
- मध्यप्रदेश में नए वक्फ बोर्ड के गठन को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।
- याचिका में 4 जुलाई के गठन आदेश पर सवाल उठाए गए हैं।
- दावा है कि राजपत्र प्रकाशन का पत्र एक दिन बाद 5 जुलाई को भेजा गया था।
- आरटीआई कागजों में तारीख बदलने का आरोप भी लगाया गया है।
- हाईकोर्ट ने शासन से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी।
वक्फ बोर्ड के गठन पर उठे गंभीर सवाल
जबलपुर। मध्यप्रदेश में नए वक्फ बोर्ड के गठन का मामला जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गया है। बशारत हुसैन और अन्य ने 4 जुलाई 2026 के आदेश को चुनौती दी है। याचिका चीफ जस्टिस अल्पेश वाई कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की बेंच में है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने शासन से जवाब मांगा है। शासन को जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर 2026 को होगी।
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पुराने बोर्ड का कार्यकाल अभी बाकी था
याचिका के अनुसार पुराना वक्फ बोर्ड 19 अप्रैल 2023 को बना था। उसका कार्यकाल 18 अप्रैल 2028 तक बताया गया है। यानी नए बोर्ड के गठन के समय पुराना कार्यकाल बाकी था। इसी बात को याचिकाकर्ता ने अपने मामले का अहम आधार बनाया है। उनका कहना है कि केवल खाली पद भरने की जरूरत थी। इसके बजाय सरकार ने नया बोर्ड गठित कर दिया।
चार सदस्यों के इस्तीफे के बाद क्या हुआ?
याचिका के अनुसार 3 जुलाई 2026 को चार सदस्यों ने इस्तीफा दिया। इनमें डॉ. सनवर पटेल और फैजान खान शामिल थे। सिस्टर फातिमा चौधरी ने भी इस्तीफा दिया था। डॉ. इना उर रहमान ने भी अपना पद छोड़ दिया था। याचिका के मुताबिक अगले ही दिन इस्तीफे स्वीकार किए गए। इसके बाद 4 जुलाई को नया बोर्ड बनाने का आदेश जारी हुआ।
इस्तीफा देने वाले सदस्य फिर बोर्ड में आए
याचिका में इस फैसले पर भी सवाल उठाया गया है। दावा है कि तीन पुराने सदस्यों को नए बोर्ड में फिर जगह मिली। इनमें डॉ. सनवर पटेल, फैजान खान और सिस्टर फातिमा चौधरी शामिल हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन्हें नया पांच साल का कार्यकाल मिला। इसी वजह से बोर्ड गठन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
वक्फ लॉ धारा 21 को लेकर है विवाद
याचिकाकर्ता ने वक्फ कानून की धारा 21 का हवाला दिया है। उनका कहना है कि इस्तीफे से खाली पद बनते हैं। ऐसी स्थिति में केवल उन खाली पदों को भरना चाहिए था। नए सदस्य को पुराने सदस्य का बचा कार्यकाल मिलना चाहिए था। याचिका में नए पांच साल के कार्यकाल को चुनौती दी गई है। हालांकि इस मुद्दे पर हाईकोर्ट का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
राजपत्र की तारीख ने बढ़ाया मामला
याचिका में राजपत्र प्रकाशन की तारीख को लेकर बड़ा सवाल उठाया गया है। दावा है कि बोर्ड का आदेश 4 जुलाई को राजपत्र में छप गया था। वहीं विभाग ने प्रकाशन के लिए पत्र 5 जुलाई को भेजा था। यह पत्र सरकारी मुद्रणालय को भेजे जाने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता ने पूछा है कि पत्र बाद में गया। फिर राजपत्र में आदेश पहले कैसे प्रकाशित हुआ?
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5 जुलाई की तारीख पर भी सवाल
याचिका में 5 जुलाई 2026 की तारीख का भी जिक्र है। याचिकाकर्ता के अनुसार उस दिन रविवार था। इसी दिन बोर्ड गठन आदेश के प्रकाशन के लिए पत्र भेजा गया। लेकिन राजपत्र में आदेश 4 जुलाई को प्रकाशित बताया गया है। इसी अंतर को याचिका में अहम सवाल बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है।
कागजों में तारीख बदलने का आरोप
बशारत हुसैन ने बोर्ड गठन से जुड़े दस्तावेज आरटीआई से मांगे थे। याचिका में आरटीआई से मिले कुछ कागजों का भी जिक्र है। दावा है कि कुछ दस्तावेजों में तारीख बदली हुई दिखाई देती है। आरोप है कि टाइप की गई 5 जुलाई की तारीख काटी गई। इसके बाद हाथ से 4 जुलाई लिखा गया। याचिकाकर्ता ने इसे भी मामले का अहम आधार बनाया है।
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नए बोर्ड के गठन की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल
याचिका में सिर्फ तारीखों पर सवाल नहीं उठाए गए हैं। बोर्ड बनाने के कानूनी अधिकार पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने धारा 13 और धारा 99 का हवाला दिया है। उनका कहना है कि पुराने बोर्ड को पहले कानून के अनुसार खत्म करना था। इसके बाद ही नए बोर्ड के गठन की प्रक्रिया शुरू हो सकती थी। याचिका में 4 जुलाई का आदेश इसी आधार पर चुनौती दिया गया है।
हाईकोर्ट से क्या मांग की गई है?
याचिकाकर्ता ने 4 जुलाई की अधिसूचना रद्द करने की मांग की है। उन्होंने केवल खाली पद भरने का निर्देश देने की मांग की है। तीन सदस्यों की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया गया है। याचिका में उनके पद पर बने रहने का आधार पूछा गया है। साथ ही आदेश पर रोक लगाने की मांग भी की गई है। अभी हाईकोर्ट ने इन मांगों पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल हाईकोर्ट ने शासन से जवाब मांगा है। सरकार का पक्ष सामने आने के बाद मामले की तस्वीर साफ होगी। राजपत्र की तारीख और विभागीय पत्र की जांच अहम होगी। आरटीआई दस्तावेजों में बदलाव के आरोप पर भी जवाब आ सकता है। अभी याचिकाकर्ता के आरोपों को अंतिम सच नहीं माना जा सकता। मामले में अगली सुनवाई 16 अक्टूबर 2026 को होगी।
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