31 साल बाद पूर्व सैनिक को मिलेगी अमान्य पेंशन, कोर्ट ने दिया आदेश

Mukesh Sharma | Jun 09, 2026, 18:17 IST
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पूर्व सैनिक को राहत
Photograph: (the sootr)

सेना के पूर्व सैनिक ओमप्रकाश को 31 साल बाद अमान्य पेंशन मिलेगी। यह राजस्थान हाई कोर्ट के एक आदेश से संभव हो पाएगा। कोर्ट ने सेना को ओमप्रकाश की अमान्य पेंशन और बकाया राशि देने का आदेश दिया है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश पर पूर्व सैनिक ओमप्रकाश को 31 साल बाद अमान्य पेंशन मिलेगी।
  • कोर्ट ने सेना को ओमप्रकाश की अमान्य पेंशन और बकाया राशि देने का आदेश दिया है।
  • कोर्ट ने बीमारी के दौरान मिली सजाओं को माना मानवीय भूल, एक्शन को ठहराया गलत
  • पेंशन से इनकार को बताया निरंतर होने वाला अन्याय, 14 साल की देरी से जुड़ी आपत्ति खारिज।
  • तीन महीने में बकाया चुकाने का आदेश, तय समय में भुगतान न होने पर लगेगा 6% ब्याज।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सेना के एक पूर्व सिपाही को अमान्य पेंशन (इन्वेलिड पेंशन) पाने के अधिकार को बरकरार रखा है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि कल्याणकारी योजनाओं की व्याख्या हमेशा उदार दृष्टिकोण के साथ की जानी चाहिए।

जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिसरवि चिरानिया की खंडपीठ ने पूर्व सिपाही ओम प्रकाश की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) की जयुपर क्षेत्रीय पीठ के आदेश को रद्ध कर दिया है।

यह है मामला

याचिकाकर्ता ओमप्रकाश को 10 साल, 11 महीने और 18 दिन की सेवा पूरी करने के बाद जून 1995 में आर्मी सर्विस कॉर्प्स से सेवामुक्त कर दिया गया था। सैन्य अधिकारियों ने उनके रिकॉर्ड पर पांच रेड इंक (लाल स्याही) प्रविष्टियां होने के कारण उन्हें सेना नियम, 1954 के तहत एक अवांछनीय सैनिक मानते हुए सेवामुक्त किया था।

सेवामुक्ति को चुनौती देने और विकलांगता या अमान्य पेंशन की मांग को लेकर ओम प्रकाश ने 2009 में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। बाद में इस मामले को सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) में स्थानांतरित कर दिया था। एएफटी ने अगस्त 2022 में मामला खारिज कर दिया था। एएफटी के आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से सेना के लिए पेंशन विनियम-1961 के नियम 197 और 198 के तहत केवल अमान्य पेंशन की मंजूरी तक ही मामले को सीमित रखा। क्योंकि सेवामुक्ति को तीन दशक से अधिक का समय बीत चुका था, इसलिए उसने इसे चुनौती नहीं दी।

बीमारी में दी थीं चार सजा

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के मेडिकल रिकार्ड के आधार पर पाया कि वह दो बार अस्पताल में भर्ती हुआ था। उसे न्यूरोटिक बीमारी है और वह रेडियल नर्व पाल्सी (दाएं) था।

उसे पांच अनुशानात्मक सजाओं में से चार सजाएं इसी बीमारी की अवधि में दी थीं। हाईकोर्ट ने इसे सैन्य अधिकारियों की गंभीर लापरवाही और दुर्भावना से माना है।

कोर्ट ने कहा कि सैन्य अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को सेवामुक्त करने से पहले उसे रिलीज मेडिकल बोर्ड के समक्ष पेश नहीं किया। उसकी बीमारी छिपाने के लिए सेवा प्रमाण पत्र में मेडिकल हिस्ट्री का कॉलम खाली ही छोड़ दिया था।

बीमारी के कारण हुई थीं गलती

कोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता से बीमारी के कारण ही छोटी-छोटी अनुशानात्मक गलतियां हुई थीं। इसलिए उसके साथ सजा देने के स्थान पर सहानुभू​ति का व्यवहार होना चाहिए था।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर कहा है कि चार या ज्यादा रेड इंक की प्रविष्टि मिलना सेवामुक्ति के लिए अनिवार्य आदेश नहीं है,बल्कि यह सैनिक को सेवा मुक्ति के विचार के दायरे में लाता है।

पेंशन से इनकार अन्याय

कोर्ट ने मामला दायर करने में 14 साल की देरी पर आपत्ति को खारिज करते हुए कहा ​है कि पेंशन से इनकार करना अन्याय है। कोर्ट ने कहा है कि जहां एक नियमित पेंशन के लिए न्यूनतम सेवा अवधि 15 वर्ष अनिवार्य है। वहीं नियम 198 स्पष्ट रूप से अमान्य पेंशन के लिए केवल 10 वर्ष की सेवा की आवश्यकता निर्धारित करता है। इसे याचिकाकर्ता ने सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था।

कोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता वर्ष 2009 में हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तारीख से तीन वर्ष पहले से अपनी अमान्य पेंशन का बकाया पाने का हकदार है। कोर्ट ने सेना व सरकार को जून 2026 तक के सभी बकाए की गणना करके तीन महीने की अवधि के भीतर भुगतान करने को कहा है। इसके साथ ही जुलाई 2026 से नियमित रूप से मासिक पेंशन देने को कहा है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्धारित तीन महीनों के भीतर बकाए का भुगतान न करने की स्थिति में, वास्तविक भुगतान की तारीख तक बकाया राशि पर 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा।

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