अफसरों और नेताओं की मिलीभगत से बेच खाईं सरकारी जमीनें, जानिए जयपुर के पॉश इलाकों में कैसे खड़ी हो गईं भ्रष्टाचार की ऊंची इमारतें
Mukesh Sharma | Apr 23, 2026, 19:13 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान की राजधानी जयपुर में सरकारी जमीनों को हड़पने का खूब खेल चल रहा है। मंदिर माफी की जमीन से लेकर नदी के पेटे तक को बेच डाला गया। गंभीर बात यह है कि भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी ऊंची इमारतों को सरकार विकास से जोड़कर देख रही है।
Jaipur: राजस्थान की राजधानी जयपुर विकास के नाम पर सरकारी जमीन की सामूहिक डकैती का केंद्र बन गई है। सेठों, भूमाफिया और हाउसिंग सोसायटियों ने नेताओं और अफसरों के गठजोड़ से जयपुर में सरकारी जमीनों को हड़पने का खूब खेल रचा। देखते-देखते शहर की बेशकीमती जमीनों पर ऊंची इमारतें खड़ी होती गईं।
ऐसा नहीं है कि सरकारी जमीनों को हड़पने का यह खेल कोई एक दिन में खेला गया। पूरी भूमिका तैयार की गईं, फिर उस पर कब्जा जमाकर बड़ी-बड़ी इमारतें बना दी गईं। मिलीभगत का आलम यह है कि मंदिर माफी की हजारों बीघा जमीन से लेकर द्रव्यवती नदी के बहाव क्षेत्र तक, सब कुछ भू-माफियाओं की भेंट चढ़ चुका है।
पृथ्वीराज नगर, लालकोठी योजना और गोकुल वाटिका जैसे मामले चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि कैसे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सख्त आदेशों को फाइलों के अंबार में दबाकर प्राइम लैंड पर अवैध कब्जे करवाए गए। हाल यह रहा है कि बजाज नगर एनक्लेव की जमीन की नीलामी बंद कमरे में हो गई और जेडीए अफसरों सहित बाकी अफसरों ने आपस में जमीन बांट ली।
हैरान करने वाला यह तथ्य है कि लोकायुक्त के दफ्तर से जमीन के कब्जे दिलवाने और खाली करवाने के काम हुए। कोर्ट ने भी मंदिर की जमीन पर कब्जा करने के मामले में कुछ नहीं किया। कहने को तो कोर्ट नागरिकों के संविधानिक अधिकारों की रक्षा करने को है, लेकिन, जैसे ही प्रभावशाली लोगों का मामला आया है न्यायपालिका के सुर बदल गए।
राजस्थान में जयपुर का पृथ्वीराज नगर का मामला भूमाफियाओं के समक्ष सरकार के घुटने टेकने का प्रत्यक्ष और ज्वलंत उदाहरण है। जेडीए ने 22 गांव की करीब 11,500 बीघा जमीन अवाप्त की थी। सरकार इस अवाप्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा जीत गई थी। लेकिन, भू-माफियाओं ने आमजन के नाम पर जेडीए को जमीन का कब्जा नहीं लेने दिया।
23 सितंबर,2002 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जमीन को अवाप्ति से मुक्त कर दिया। हाई कोर्ट ने स्व:प्रेरणा से संज्ञान लेकन अवाप्ति से मुक्त करने के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद हाईकोर्ट ने योजना की पूरी जमीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं होने, निर्माण होने पर जिम्मेदार अफसरों को व्यक्तिगत रुप से जिम्मेदार मानने जैसे निर्देश भी दिए।
भू-माफियाओंं ने गृह निर्माण सहकारी समितियों और जेडीए के गठजोड़ ने हाईकोर्ट के आदेश-निर्देशों को खुलेआम ठेंगा दिखाकर धडल्ले से जमीन बेची और निर्माण भी जारी रहा। कोई कानून, नियम या अदालती आदेश भू-माफियाओं को सरकार की जमीन को खुलेआम खुर्द-बुर्द होने से नहीं रोक सका। वर्ष 2008 में राज्य सरकार ने अवाप्ति से मुक्ति की अधिसूचना को वापस ले लिया तो हाई कोर्ट ने जनहित याचिका का भी निपटारा कर दिया।
इसके बाद सरकार ने जनहित के नाम पर पृथ्वीराज नगर में गृह निर्माण सहकारी समितियों से उनकी सृजित की गई आवासीय योजनाओं का नियमन करना शुरु कर दिया। सरकार ने अपनी ही जमीन के पट्टे औन-पौने दामों में देने शुरु कर दिए। लूट का यह खेल आज तक जारी है।
जयपुर की लाल कोठी योजना 60 से अधिक साल से महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयों और भ्रष्टाचार की जांच का केंद्र रही है। मूल रूप से इस योजना का उद्देश्य नई विधानसभा और विधायक आवास जैसी सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए जगह उपलब्ध कराना था। बाद में यह प्रभावशाली व्यक्तियों को अवैध भूमि आवंटन के कारण विवादों में घिर गई।
साल 1960 में सरकार ने ग्राम भोजपुरा व चक सुदर्शनपुरा की 552 बीघा जमीन अवाप्त की थी। यहां नया विधानसभा भवन और विधायक आवास बनने के साथ अन्य विकास होने थे। 1964 में भू-अवाप्ति अधिकारी ने गैर-कानूनी रुप से जमीन मालिकों और यहां जमीन खरीदने वालों केा मुआवजे में एक से दो हजार वर्गगज के भूखंड आवंटित कर दिए। कई बरसों तक मामला अदालती लड़ाई में उलझा रहा और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में राधेश्याम और 1997 में दौलतमल जैन के मामलों में मुआवजे के रुप में दिए भूखंडों के आवंटन को सिरे से ही गैर-कानूनी घेाषित कर दिया था।
इस मामले में राजस्थान के लोकायुक्त ने अपनी 12 नवंबर 1992 की एक जांच रिपोर्ट में तत्कालीन शहरी विकास एवं आवास मंत्री श्रीमती कमला, तत्कालीन जेडीए आयुक्त एमडी कोरानी और उपायुक्त सुभभन मित्रा जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों को लालकोठी योजनो में गैर-कानूनी रुप से भूखंड आवंटित करने का दोषी माना था। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में भी पेश हुई थी।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की काट करने के लिए समझौते के तहत कुछ जमीन लेकर बाकी आवंटी को देने का रास्ता निकाल लिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार योजना में सभी प्रकार के कब्जे गैर-कानूनी हैं। लेकिन, जेडीए ने किसी भी भूखंडधारी को नहीं हटाया बल्कि आज तक उन्हें पट्टे दिए जा रहे हैं।
ऐसा ही एक मामला जयपुर की महंगे इलाके जेएलएन मार्ग स्थित गोकुल वाटिका कॉलोनी का है। कुछ कथित गांधीवादियों ने एक सहकारी खेती की सोसायटी रजिस्टर्ड करवाकर सहकारी खेती के लिए सरकार से जमीन ली थी।
समय के साथ जब जमीन की कीमतें बढ़ी तो इन गांधीवादियों ने यहां आवासीय कॉलोनी बना दी। इसके लिए सहकारी कृषि समिति को गैर-कानूनी रुप से गृह निर्माण सहकारी में बदल दिया। इस कारनामे में नेताओं और अफसरों की भूमिका प्रमुख रही।
आज इस कॉलोनी में शहर के धन्ना सेठों के साथ राजस्थान के पूर्व मुख्य सचिव डीबी गुप्ता सहित अनेक आईएएस व आईपीएस अफसरों के आलीशान बंगले हैं। यह हाल तो तब है, जब सहकारिता विभाग की जांच में धोखाधड़ी का पर्दाफाश हो गया था।
बताया जाता है कि गांधीवादियों के साथ जमीन हड़पने में पूर्व मुख्य सचिव की भूमिका प्रमुख रही है। गोकुल वाटिका कॉलोनी बसाने वालों ने गांधीवादी नेता दिवंगत गोकुलभाई भट्ट की स्मृति में बनी समग्र सेवा संघ की 2 बीघा 1 बिस्वा जमीन हड़प ली और बेच दिया। इसके विरोध में समग्र सेवा संघ ने हाईकोर्ट की शरण ली। साल 2014 में समग्र सेवा संघ की जमीन छीन ली गई और जेडीए का कब्जा करवा दिया। इसके खिलाफ भी समग्र सेवा संघ ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
इस बीच 2 बीघा 1 बिस्वा जमीन कुछ प्रभावशाली धनपतियो को भूखंड के रुप में बेची जा चुकी थी। बाद में 2022 में अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए समग्र सेवा संघ को सरकार से समझौता करने को बाध्य किया गया। समझौते में समग्र सेवा संघ को हाईकोर्ट में दायर अपनी दो याचिकाएं वापिस लेनी पड़ी और दो बीघा एक बिस्वा जमीन भी छोड़नी पड़ी।
समग्र सेवा संघ को 7 बीघा जमीन पर ही संतोष करना पड़ा। यानी फर्जी गोकुल वाटिका गृह निर्माण सहकारी समिति के अवैध कब्जे को सरकार के दबाव में समग्र सेवा संघ को छोड़ना पड़ गया। आज इस छोड़ी गई जमीन पर आलीशान बंगले बने हुए हैं।
जयपुर में उद्योगपति, नेता और अफसरों की मिलीभगत से बेशकीमती जमीन की लूट का नायाब नमूना ज्वैल आॅफ इंडिया नाम से बनी बहुमंजिला आवासीय योजना है। संभवत: जयपुर के सर्वाधिक महंगे फ्लैट वाली यह योजना सरकारी जमीन पर बनी है। इंडस्ट्री के लिए आवंटित इस 205 बीघा से ज्यादा जमीन को हड़पने का खेल लंबे समय से सफलतापूर्वक चल रहा है।
यह जमीन कैपस्टन मीटर को आवंटित हुई थी। कैपस्टन मीटर के मालिक जयपुरिया परिवार ने अपने ही परिवार की दूसरी कंपनियों को जमीन के अलग-अलग टुकडे सब-लीज पर दे दिए। सरकार ने इस जमीन को अवाप्त कर लिया और फिर अवाप्ति से मुक्त भी कर दिया।
अवाप्ति से मुक्ति के खेल में सरकार ने बिना एक पैसा लिए अलग-अलग कंपनियों और संस्थाओं को जमीन दे दी। जेडीए की फाइल से दस्तावेज गायब कर दिए गए। जेडीए ने आज तक दस्तावेज चोरी की रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई। आरटीआई में सूचना उपलब्ध नहीं करवाई गई।
इसी खेल में कंपनी जय ड्रिंक्स को औद्योगिक उपयोग के लिए जमीन दी थी। जमीन पर उद्योग बंद हो गया और भ्रष्टाचार की बदौलत औद्योगिक जमीन का व्यावसायिक पट्टा दे दिया। बाद में यहां आलीशान फ्लैट खडे कर दिए। आज इस योजना में राजस्थान के दो पूर्व मुख्य सचिव सहित अनेकों आईएएस और आईपीएस के फ्लैट हैं। वे इनसे लाखों रुपये किराए की कमाई कर रहे हैं।
सरकार की नाक के नीचे सांगानेर क्षेत्र में राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर 87 कॉलोनियां बस गईं, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। हाउसिंग बोर्ड के लिए अवाप्त यह जमीन दुर्गापुरा से लेकर सांगानेर में एयरपोर्ट के सामने वाले इलाके तक फैली है। राजस्थान सरकार ने पिछले साल इन अवैध कॉलोनियों को नियमित करने का आदेश निकाल दिया। इस आदेश पर फिलहाल हाई कोर्ट ने रोक लगा रखी है।
इसी जमीन के बी-टू बायपास स्थित एक जमीन पर हाउसिंग बोर्ड को पिछले दिनों जरुर हाई कोर्ट से राहत मिली और बोर्ड ने जमीन के कुछ हिस्से पर कब्जा भी लिया है। लेकिन, एकलपीठ के आदेश पर खंडपीठ ने रोक फिलहाल रोक लगा दी है।
जयपुर में टोंक रोड पर बरसों पहले रीको ने जैम स्टोन पार्क के लिए जमीन आवंटित की थी। स्टोन पार्क तो कब का बंद हो गया, लेकिन रीको की जमीन पर कब्जे हो गए। सरकार चुपचाप देख रही है।
इसी प्रकार रेलवे स्टेशन के नजदीक पोद्दार मिल हुआ करती थी। यह मिल आजादी के पहले स्थापित हुई थी और कई सालों तक चली थी। लेकिन बाद में कंपनी अवसायन में चली गई, लेकिन इसके बावजूद मिल मालिकों ने सरकारी की मिलीभगत से जमीन के बड़े हिस्से को मल्टी-स्टोरी फ्लैट्स बनाने के लिए बेच दिया।
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम-1955 में स्पष्ट प्रावधान है कि नदी के पेटे में आने वाले किनारों, नाले, झील या तालाब के नजदीक स्थित खातेदारी जमीन पर निर्माण करना सरकार की अनुमति के बिना प्रतिबंधित है।
नदी के किनारे स्थित खातेदारी जमीन पर पक्का निर्माण करने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वह भूमि नदी के बहाव क्षेत्र या गैर मुमकिन किस्म में दर्ज न हो। बिना रूपांतरण (Conversion) के निर्माण, जो जल स्रोत को नुकसान पहुंचाए, पूरी तरह से अवैध है।
कानूनी प्रावधानों के बावजूद कभी जयपुर शहर का प्रमुख जल स्त्रोत रही द्रव्यवती नदी के बहाव क्षेत्र और किनारों की जमीन पर सरकारी मिलीभगत से खुलेआम कब्जे हो रहे हैं। नदी बचाने के लिए राजस्थान हाई कोर्ट में पिछले 19 साल से एक जनहित याचिका पेडिंग है।
हाई कोर्ट ने इस पर अनेक आदेश भी दिए हैं, लेकिन स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही है। नदी किनारे की जमीन का आवंटन जारी है। स्कूल, अस्पताल, मकान, दुकान और दूसरी किस्म के निर्माण खुलेआम हो रहे हैं। हाईकोर्ट में मामला इतना उलझा दिया है कि अब किसी को समझ नहीं आ रहा है कि करना क्या है ?
सुप्रीम कोर्ट हो या हाई कोर्ट दोनों ही अदालतें सरकारी जमीन पर कब्जे को अवैघ घोषित कर चुकी हैं। समय-समय पर इस संबंध में अनेक आदेश हो चुके हैं। कोर्ट की सख्त टिप्पणियां भी होती रहती हैं। लेकिन, अदालती आदेश को भू-माफिया अफसरों और सरकारों की मिलीभगत से ताक पर रखा जा रहा है।
पिछले साल हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर अतिक्रमणों को नियमित करने के सरकार के आदेश पर रोक के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। इस मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बैंच ने बेहद तल्ख और सख्त टिप्पणी की थीं। बैंच ने कहा था कि हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर निजी कॉलोनियां बसाना खुला घोटाला है। अधिकारियों की मिलीभगत के बिना अवाप्त जमीन पर निर्माण नहीं हो सकते।
कोर्ट ने सरकार को दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान कर कार्रवाई करने को कहा था। लेकिन,यह सब जानते हैं कि यह कभी नहीं होगा।
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भू-माफियाओंं ने गृह निर्माण सहकारी समितियों और जेडीए के गठजोड़ ने हाईकोर्ट के आदेश-निर्देशों को खुलेआम ठेंगा दिखाकर धडल्ले से जमीन बेची और निर्माण भी जारी रहा। कोई कानून, नियम या अदालती आदेश भू-माफियाओं को सरकार की जमीन को खुलेआम खुर्द-बुर्द होने से नहीं रोक सका। वर्ष 2008 में राज्य सरकार ने अवाप्ति से मुक्ति की अधिसूचना को वापस ले लिया तो हाई कोर्ट ने जनहित याचिका का भी निपटारा कर दिया।
इसके बाद सरकार ने जनहित के नाम पर पृथ्वीराज नगर में गृह निर्माण सहकारी समितियों से उनकी सृजित की गई आवासीय योजनाओं का नियमन करना शुरु कर दिया। सरकार ने अपनी ही जमीन के पट्टे औन-पौने दामों में देने शुरु कर दिए। लूट का यह खेल आज तक जारी है।
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साल 1960 में सरकार ने ग्राम भोजपुरा व चक सुदर्शनपुरा की 552 बीघा जमीन अवाप्त की थी। यहां नया विधानसभा भवन और विधायक आवास बनने के साथ अन्य विकास होने थे। 1964 में भू-अवाप्ति अधिकारी ने गैर-कानूनी रुप से जमीन मालिकों और यहां जमीन खरीदने वालों केा मुआवजे में एक से दो हजार वर्गगज के भूखंड आवंटित कर दिए। कई बरसों तक मामला अदालती लड़ाई में उलझा रहा और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में राधेश्याम और 1997 में दौलतमल जैन के मामलों में मुआवजे के रुप में दिए भूखंडों के आवंटन को सिरे से ही गैर-कानूनी घेाषित कर दिया था।
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बताया जाता है कि गांधीवादियों के साथ जमीन हड़पने में पूर्व मुख्य सचिव की भूमिका प्रमुख रही है। गोकुल वाटिका कॉलोनी बसाने वालों ने गांधीवादी नेता दिवंगत गोकुलभाई भट्ट की स्मृति में बनी समग्र सेवा संघ की 2 बीघा 1 बिस्वा जमीन हड़प ली और बेच दिया। इसके विरोध में समग्र सेवा संघ ने हाईकोर्ट की शरण ली। साल 2014 में समग्र सेवा संघ की जमीन छीन ली गई और जेडीए का कब्जा करवा दिया। इसके खिलाफ भी समग्र सेवा संघ ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
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यह जमीन कैपस्टन मीटर को आवंटित हुई थी। कैपस्टन मीटर के मालिक जयपुरिया परिवार ने अपने ही परिवार की दूसरी कंपनियों को जमीन के अलग-अलग टुकडे सब-लीज पर दे दिए। सरकार ने इस जमीन को अवाप्त कर लिया और फिर अवाप्ति से मुक्त भी कर दिया।
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क्या भू-माफिया के आगे नतमस्तक सरकार
पिछले साल हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर अतिक्रमणों को नियमित करने के सरकार के आदेश पर रोक के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। इस मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बैंच ने बेहद तल्ख और सख्त टिप्पणी की थीं। बैंच ने कहा था कि हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर निजी कॉलोनियां बसाना खुला घोटाला है। अधिकारियों की मिलीभगत के बिना अवाप्त जमीन पर निर्माण नहीं हो सकते।
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