​सेंचुरी में कैसे चल रहा फाइव स्टार होटल, न वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस और न ही पर्यावरण पर किया खर्च

Mukesh Sharma | Apr 28, 2026, 18:48 IST
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Ashish Bhardwaj (82)
Photograph: (the sootr)

राजस्थान में जयपुर के फाइव स्टार होटल 'द लीला पैलेस' पर अब कानूनी तलवार लटक गई है। नाहरगढ़ सेंचुरी में इस आलीशान होटल के पास न तो वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस है और न ही उसने नियमों के तहत पर्यावरण पर कोई राशि खर्च की।

News In Short

  • जयपुर का फाइव स्टार होटल 'द लीला पैलेस' कानूनी भंवर में फंसा।
  • होटल के पास कोई वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस नहीं, जो अनिवार्य थी।
  • होटल ने पर्यावरण संरक्षण पर भी कोई राशि खर्च नहीं की।
  • एनजीटी ने आश्चर्य जताया कि आखिर सेंचरी में कैसे संचालित है होटल।
  • एनजीटी ने जयपुर कलेक्टर से इस मामले में मांगा व्यक्तिगत हलफनामा।

News In Detail

​Jaipur: राजस्थान की राजधानी जयपुर के पास बनी फाइव स्टार होटल 'द लीला पैलेस' ने सारे पर्यावरण नियमों को ताक पर रख दिया है। गंभीर बात यह है कि यह होटल नाहरगढ़ सेंचुरी के 'ईको-सेंसिटिव ज़ोन' (ESZ) में बनी हुई है। इस होटल पर अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।

एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि केवल एनवायरमेंटल क्लीयरेंस (EC) मिल जाना अन्य कानूनी बाध्यताओं से मुक्त नहीं करता है। एनजीटी ने होटल द्वारा पर्यावरण और वन्यजीव नियमों के गंभीर उल्लंघन के आरोपों पर केंद्र सरकार, राजस्थान सरकार और जयपुर के जिला कलेक्टर से जवाब तलब किया है।

​क्या है पूरा मामला?

दरअसल, जयपुर के कूकस गांव में स्थित होटल 'द लीला पैलेस' (The Leela Palace) खसरा नंबर 364, 366, 367 सहित अन्य भूखंडों पर बना हुआ है। याचिकाकर्ता हेमराज मीणा के वकील वैभव पंचोली ने एनजीटी में दलील दी है कि यह होटल नाहरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के 'ईको-सेंसिटिव ज़ोन' (ESZ) में आता है। नियमों के तहत ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी बड़े निर्माण के लिए वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस (वन्यजीव मंजूरी) अनिवार्य होती है।

चौंकाने वाली बात यह है कि होटल प्रबंधन ने साल 2016 में वन्यजीव मंजूरी के लिए आवेदन तो किया था, जो आज तक लंबित है। बावजूद इसके बिना अंतिम मंजूरी के होटल का न केवल निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया, बल्कि वहां व्यावसायिक गतिविधियां धड़ल्ले से जारी हैं। यह होटल सेंचुरी में वन्यजीवों के खतरा है।

नियम नहीं, रसूख पर चल रही होटल

एडवोकेट वैभव पंचौली के अनुसार इस होटल का कुल निर्मित क्षेत्र 20,000 वर्ग मीटर से अधिक है। इसके लिए सख्त पर्यावरणीय मानकों का पालन आवश्यक है। होटल को 2015 में एनवायरमेंटल क्लीयरेंस (EC) मिली थी, जिसकी शर्त संख्या 6 में स्पष्ट था कि प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले सक्षम अधिकारी से वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस लेना अनिवार्य होगा। यह क्लीयरेंस नेशनल बोर्ड फॉर वाईल्डलाईफ देता है।

होटल कंपनी को अपने प्रोजेक्ट में 120 लाख रुपए निवेश करना था। उसे 8.9 लाख रुपए वार्षिक पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न उपायों के लिए खर्च करने थे, लेकिन कंपनी ने ऐसा कुछ नहीं किया। पर्यावरण स्वीकृति के अनुसार दोनों ही शर्तों को पूरा करना जरुरी है, लेकिन रिसोर्ट दोनों ही जरुरी शर्त को पूरा किए बिना ही अवैध रुप से संचालित हो रहा है। कानूनी तौर पर यदि पर्यावरण मंजूरी की शर्तों की पालना नहीं होती है तो दी गई मंजूरी रद्ध हो सकती है और रिसोर्ट पर प्रोजेक्ट की कीमत का तीन गुणा तक जुर्माना लग सकता है।

​ट्रिब्यूनल ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि विशिष्ट स्थितियां (Specific Conditions) यह प्रावधान करती हैं कि ईसी का मिलना परियोजना प्रस्तावक को वर्तमान में लागू किसी अन्य कानून के तहत निर्धारित वैधानिक दायित्वों से मुक्त नहीं करता है। बिना वन्यजीव मंजूरी के इस स्तर के व्यावसायिक प्रतिष्ठान का संचालन पूरी तरह से अवैध है।



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कलेक्टर को हलफनामा देने का आदेश

​एनजीटी ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जयपुर कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि कलेक्टर तथ्यों की सही स्थिति के संबंध में एक व्यक्तिगत हलफनामा पेश करें। इससे यह साफ होगा कि प्रशासन की नाक के नीचे बिना आवश्यक क्लीयरेंस के इतना बड़ा होटल कैसे संचालित हो रहा है।

​इसके साथ ही एनजीटी ने केंद्र और राजस्थान सरकार के संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा गया है। सभी उत्तरदाताओं को ई-फाइलिंग पोर्टल के माध्यम से छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा।



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वन्यजीवों का हैबिटाट उजड़ने का खतरा​

पर्यावरणविदों का कहना है कि ईको-सेंसिटिव ज़ोन वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षा कवच (Buffer Zone) का काम करते हैं। यदि यहां बिना मंजूरी के बड़े व्यावसायिक ढांचे खड़े होंगे, तो इससे न केवल वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होगा, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन भी बिगड़ जाएगा।

​एनजीटी ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 24 जुलाई, 2026 की तारीख तय की है। तब तक याचिकाकर्ता को निर्देशित किया गया है कि वे सभी आवश्यक दस्तावेज संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध कराएं।

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