14 साल से एमपीलेड में बढ़ोतरी नहीं, क्या ऊंट के मुंह में जीरा बन गई है सांसद निधि
Jinesh Jain | Apr 08, 2026, 17:29 IST
Photograph: (the sootr)
क्या सांसदों के लिए एमपीलेड (MPLADS) की मौजूदा राशि कम महसूस हो रही है? इस पर सांसद क्या सोचते हैं, राजनीतिक विश्लेषकों का क्या नजरिया है और सरकार का क्या मूड़ नजर आता है, जानिए पूरा मामला।
Jaipur/Bhopal/Raipur: कल्पना कीजिए एक ऐसे घर की, जिसका बजट 2011 में तय किया गया था। तब से अब तक दूध, दाल और पेट्रोल के दाम आसमान छूने लगे, लेकिन घर चलाने वाली राशि आज भी वहीं खड़ी है। कुछ ऐसी ही स्थिति सांसद फंड की है।
पिछले 14 साल से देश के सांसदों का विकास फंड यानी एमपीलेड (Member of Parliament Local Area Development Scheme) एक ही जगह पर जाम है। 2011 में जो 5 करोड़ रुपये सालाना विकास कराने के लिए पर्याप्त लगते थे, आज 2026 में वे विकास की बूंद जैसे लगने लगे हैं।
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा टि्वस्ट सांसद बनाम विधायक की तुलना है। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में एक लोकसभा क्षेत्र के भीतर लगभग आठ विधानसभा सीटें आती हैं। कमोबेश छत्तीसगढ़ में एक लोकसभा क्षेत्र में इतनी ही सीटें हैं।
राजस्थान और मध्यप्रदेश में एक विधायक को अपने छोटे से क्षेत्र के लिए एमएलएलेड 5 करोड़ रुपये सालाना मिलते हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में एमएलएलेड 4 करोड़ रुपये वार्षिक है। इसके ठीक उलट एक सांसद को अपनी 8 विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर भी केवल 5 करोड़ रुपये सालाना ही मिलते हैं।
यानी एक विधायक के पास अपने इलाके में खर्च करने के लिए जितना पैसा है, सांसद के पास उतना ही पैसा आठ गुना बड़े इलाके के लिए है। राजस्थान में सीकर सांसद अमराराम ने हाल ही में संसद में इसी व्यावहारिक परेशानी को मुद्दा बनाया। उनका कहना है कि इतने बड़े क्षेत्र में वोटरों को संतुष्ट करना इस बजट में नामुमकिन है। इससे पहले भी संसद में यह मामला उठ चुका है।
सांसदों का तर्क सीधा है। 2011 में सीमेंट की एक बोरी की कीमत, लेबर का खर्च और निर्माण सामग्री के दाम आज के मुकाबले आधे से भी कम थे। 14 साल पहले 5 करोड़ में जितने सामुदायिक भवन या सड़कें बन सकती थीं, आज उनकी लागत तीन गुना बढ़ चुकी है।
मध्यप्रदेश में होशंगाबाद के भाजपा सांसद दर्शन सिंह चौधरी कहते हैं, क्षेत्र काफी बड़ा होता है, जितनी भी राशि मिले कम ही होगी। हमें प्राथमिकताओं के आधार पर काम चुनना पड़ता है। वहीं रतलाम की सांसद अनीता नागर सिंह चौहान का मानना है कि जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं और क्षेत्र विस्तार के लिहाज से यह निधि वाकई बहुत कम है।
सांसद निधि का सफर दिलचस्प रहा है। इसकी शुरुआत 1993-94 में हुई थी। तब यह महज 5 लाख रुपये सालाना थी। एक ही साल यानी 1994-95 में यह बढ़कर 1 करोड़ हो गई।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में 1998-99 में इसे 2 करोड़ सालाना किया गया। बाद में मनमोहन सिंह सरकार ने 2011-12 में इसे बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया।
हैरत वाली बात यह है कि 2011 के बाद से वक्त की सुई जैसे ठहर गई है। 14 साल बीत गए, तीन सरकारें आईं, लेकिन यह आंकड़ा 5 करोड़ सालाना से आगे नहीं बढ़ा।
संसद के इस सत्र में जब यह सवाल गूंजा कि क्या सरकार इस फंड को बढ़ाएगी? तो जवाब ने सांसदों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने स्पष्ट किया कि मंत्रालय को सुझाव तो मिलते रहते हैं, लेकिन फिलहाल सांसद निधि बढ़ाने का कोई भी प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। इस जवाब ने उन चर्चाओं को भी हवा दे दी है कि क्या सरकार इस योजना के स्वरूप में बदलाव करना चाहती है?
हालांकि, सांसदों के बीच इस मुद्दे पर दोफाड़ राय नहीं, लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक सांसद फंड पर जरूर सवाल उठाते हैं। छत्तीसगढ़ की राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम कहती हैं कि विकास के लिए यह राशि बढ़ना अनिवार्य है। वहीं रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो एक बड़ी बात कह दी। उनके अनुसार सांसद इस निधि से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि या तो इसे बढ़ाया जाए या फिर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। कारण? जब पैसा कम होता है और उम्मीदें ज्यादा, तो सांसद को जनता के बीच असंतोष झेलना पड़ता है। लोग काम मांगते हैं और सांसद के पास बजट खत्म हो चुका होता है।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार गोविंद चतुर्वेदी कहते हैं कि सांसद फंड हो या विधायक विकास निधि, आज वे जिस तरह बदनाम हो रही हैं, उनका दुरुपयोग हो रहा है, उसमें इसे समाप्त कर देना ही बेहतर विकल्प है।
आज का दौर स्मार्ट सिटी और हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर का है। ऐसे में 5 करोड़ की राशि वाकई ऊंट के मुंह में जीरे जैसी लगती है। एक तरफ राज्य सरकारें अपने विधायकों को ताकतवर बनाने के लिए निधि बढ़ा रही हैं, वहीं केंद्र सरकार सांसदों की झोली भरने में संकोच कर रही है।
राजस्थान में नागौर से रालोप सांसद हनुमान बेनीवाल कहते हैं कि हम अनेक बार सरकार को कह चुके हैं कि सांसद निधि बढ़ाकर 40 करोड़ रुपये सालाना तक किया जाए, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाए। राजस्थान में एक सांसद आठ विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महंगाई के इस दौर में 5 करोड़ सालाना बहुत ही कम है।
हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सनी सेबेस्टियन का कहना है कि सांसद फंड को बढ़ाने की बजाय इसमें कराए गए कामों की सही मॉनिटरिंग जरूरी है। पब्लिक को बताना चाहिए कि सांसद ने अपने क्षेत्र में कहां-कहां खर्च किया है। मॉनिटरिंग के अभाव में एमपीलेड और एमएलएलेड का दुरुपयोग अधिक हो रहा है।
सांसदों का कहना है कि सांसद निधि केवल पैसा नहीं, बल्कि एक जनप्रतिनिधि का अपने क्षेत्र से जुड़ने का सीधा माध्यम है। अगर यह निधि समय के साथ नहीं बढ़ी तो सांसदों के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में पैठ बनाए रखना मुश्किल होगा। फिलहाल तो गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। सरकार अभी नो चेंज के मूड में दिख रही है।
'सांसद निधि कोष 5 करोड़ सालाना बहुत ही कम है। राजस्थान में तो इतना पैसा विधायक को ही मिल रहा है। हम अनेक बार सरकार को कह चुके हैं कि सांसद निधि कोष बढ़ाकर 40 करोड़ रुपये सालाना तक किया जाए, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाए। सांसद आठ विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं और महंगाई के इस दौर में 5 करोड़ रुपये सालाना बहुत ही कम है।
-हनुमान बेनीवाल, सांसद, नागौर—राजस्थान
'सांसदों का क्षेत्र काफी बड़ा होता है। कई जिलों में सांसद निधि के काम कराए जाते हैं। जनता की अपेक्षा भी काफी ज्यादा होती है। इस लिहाज से राशि कम पड़ ही जाती है। सांसदों को उनके क्षेत्र विस्तार के लिहाज से विधायकों से कम निधि मिलती है।'
-अनीता नागर सिंह चौहान, सांसद, रतलाम-मध्यप्रदेश
'सांसदों को जो राशि केंद्र से सांसद निधि के रूप में मिलती है, उसे क्षेत्र की सभी विधानसभाओं में समान रूप से खर्च करने का प्रयास करते हैं। संसदीय क्षेत्र काफी बड़ा होता है इसलिए जितनी भी राशि मिले कम ही होगी। हमारी पूरी कोशिश होती है कि महत्वपूर्ण और जरूरी कामों को प्राथमिकता के आधार पर राशि स्वीकृत करें। सांसदों को राशि ज्यादा मिलेगी तो निश्चित ही और ज्यादा काम करा पाएंगे।'
-दर्शन सिंह चौधरी, सांसद, होशंगाबाद-मध्य प्रदेश
'सांसद फंड बढ़ना चाहिए। विकास के लिए इसकी जरुरत है। अभी यह राशि काम है। शुरू में इस तरह की बात सामने आई थी कि इसे बंद किया जा रहा है। अभी बंद होने को लेकर कोई प्रस्ताव सामने नहीं आया है। राशि बढ़नी चाहिए।'
-फूलोदेवी नेताम, राज्यसभा सदस्य, छत्तीसगढ़
'सांसद निधि बहुत ही कम है। यह बढ़ना चाहिए। सरकार की मंशा तो है। मुझे लगता है यह निर्णय बहुत जल्दी होगा। फ़िलहाल सांसद निधि से सांसद खुश नहीं है। इसलिए वे चाहते हैं कि या तो इसे बढ़ाया जाए या ख़त्म कर दिया जाए, क्योकि इस कारण से उन्हें असंतोष झेलना पड़ता है।'
-बृजमोहन अग्रवाल, सांसद, रायपुर—छत्तीसगढ़
'एमपीलेड जब शुरू हुआ, तब अच्छा लगा। जनप्रतिनिधि को लोकल स्तर पर यह ज्यादा पता होता है कि कहां-कहां विकास होना चाहिए। कई मामलों में देखा गया है कि इस फंड का मिसयूज हो रहा है। एमपी के लिए पांच करोड़ रुपये सालाना फंड पर्याप्त है, लेकिन एमएलए के लिए इतनी राशि बहुत अधिक है। फंड सीमा बढ़ाने की बजाय इसकी सही मॉनिटरिंग होनी चाहिए। पब्लिक को बताना चाहिए कि सांसद इस फंड का कहां-कहां खर्च कर रहा है।'
-सनी सेबेस्टियन, पूर्व वाइस-चांसलर, हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, जयपुर
'सांसद विकास निधि हो या विधायक विकास निधि,आज वे जिस तरह बदनाम हो रही हैं, उनका दुरुपयोग हो रहा है, उसमें इसे समाप्त कर देना ही श्रेयस्कर है। प्राय: यह देखा गया है कि जनप्रतिनिधियों के कामों में न तो क्वालिटी है और न ही इसका जनहित में व्यापक फायदा दिखता है। जिस तरह से हम दायरे बढ़ा रहे हैं, उसमें इसे प्राइवेट यूज के लिए भी खोल दिया है। यही बात इस योजना में करप्शन की संभावनाओं को बढ़ाती है। ऐसे बहुत से विवेकाधीन कोटे हमने समाप्त भी किए हैं। देश भर में इनसे जुड़ी राशि भी बहुत बड़ी है।'
-गोविंद चतुर्वेदी, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार
उदयपुर भाजपा का अंतर्कलह अब दिल्ली पहुंचा , कटारिया और धर्मनारायण जोशी की पुरानी लड़ाई फिर से बेपर्दा
राजस्थान में संवैधानिक संकट, पंचायत-निकाय चुनावों में देरी पर गहलोत का कड़ा प्रहार
खेड़ा के घर पर असम पुलिस के छापे से उबली कांग्रेस, नेताओं ने कहा-हार के डर से बौखलाई भाजपा
जानिए आईपीएस माधव उपाध्याय की संपत्ति का पूरा हिसाब, जो प्रोबेशन पीरियड में ही भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे
पिछले 14 साल से देश के सांसदों का विकास फंड यानी एमपीलेड (Member of Parliament Local Area Development Scheme) एक ही जगह पर जाम है। 2011 में जो 5 करोड़ रुपये सालाना विकास कराने के लिए पर्याप्त लगते थे, आज 2026 में वे विकास की बूंद जैसे लगने लगे हैं।
विधायक भारी, सांसद लाचार
राजस्थान और मध्यप्रदेश में एक विधायक को अपने छोटे से क्षेत्र के लिए एमएलएलेड 5 करोड़ रुपये सालाना मिलते हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में एमएलएलेड 4 करोड़ रुपये वार्षिक है। इसके ठीक उलट एक सांसद को अपनी 8 विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर भी केवल 5 करोड़ रुपये सालाना ही मिलते हैं।
यानी एक विधायक के पास अपने इलाके में खर्च करने के लिए जितना पैसा है, सांसद के पास उतना ही पैसा आठ गुना बड़े इलाके के लिए है। राजस्थान में सीकर सांसद अमराराम ने हाल ही में संसद में इसी व्यावहारिक परेशानी को मुद्दा बनाया। उनका कहना है कि इतने बड़े क्षेत्र में वोटरों को संतुष्ट करना इस बजट में नामुमकिन है। इससे पहले भी संसद में यह मामला उठ चुका है।
महंगाई की मार और विकास की लागत
मध्यप्रदेश में होशंगाबाद के भाजपा सांसद दर्शन सिंह चौधरी कहते हैं, क्षेत्र काफी बड़ा होता है, जितनी भी राशि मिले कम ही होगी। हमें प्राथमिकताओं के आधार पर काम चुनना पड़ता है। वहीं रतलाम की सांसद अनीता नागर सिंह चौहान का मानना है कि जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं और क्षेत्र विस्तार के लिहाज से यह निधि वाकई बहुत कम है।
ऐसा रहा एमपीलेड का सफर
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में 1998-99 में इसे 2 करोड़ सालाना किया गया। बाद में मनमोहन सिंह सरकार ने 2011-12 में इसे बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया।
हैरत वाली बात यह है कि 2011 के बाद से वक्त की सुई जैसे ठहर गई है। 14 साल बीत गए, तीन सरकारें आईं, लेकिन यह आंकड़ा 5 करोड़ सालाना से आगे नहीं बढ़ा।
सरकार का रुख, अभी उम्मीद न रखें
एमपीलेड बढ़े या फिर खत्म हो
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार गोविंद चतुर्वेदी कहते हैं कि सांसद फंड हो या विधायक विकास निधि, आज वे जिस तरह बदनाम हो रही हैं, उनका दुरुपयोग हो रहा है, उसमें इसे समाप्त कर देना ही बेहतर विकल्प है।
क्या है भविष्य का रास्ता
राजस्थान में नागौर से रालोप सांसद हनुमान बेनीवाल कहते हैं कि हम अनेक बार सरकार को कह चुके हैं कि सांसद निधि बढ़ाकर 40 करोड़ रुपये सालाना तक किया जाए, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाए। राजस्थान में एक सांसद आठ विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महंगाई के इस दौर में 5 करोड़ सालाना बहुत ही कम है।
हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सनी सेबेस्टियन का कहना है कि सांसद फंड को बढ़ाने की बजाय इसमें कराए गए कामों की सही मॉनिटरिंग जरूरी है। पब्लिक को बताना चाहिए कि सांसद ने अपने क्षेत्र में कहां-कहां खर्च किया है। मॉनिटरिंग के अभाव में एमपीलेड और एमएलएलेड का दुरुपयोग अधिक हो रहा है।
Untitled design
गेंद सरकार के पाले में
क्या सोचते हैं सांसद और विश्लेषक:
सांसद फंड बढ़ाएं या फिर बंद करें
-हनुमान बेनीवाल, सांसद, नागौर—राजस्थान
Ashish Bhardwaj (25)
अभी कम पड़ जाता है फंड
-अनीता नागर सिंह चौहान, सांसद, रतलाम-मध्यप्रदेश
Ashish Bhardwaj (26)
ज्यादा राशि मिलेगी तो अधिक होंगे काम
-दर्शन सिंह चौधरी, सांसद, होशंगाबाद-मध्य प्रदेश
Ashish Bhardwaj (27)
सांसद फंड विकास के लिए जरूरी
-फूलोदेवी नेताम, राज्यसभा सदस्य, छत्तीसगढ़
Ashish Bhardwaj (28)
झेलना पड़ता है असंतोष
-बृजमोहन अग्रवाल, सांसद, रायपुर—छत्तीसगढ़
Ashish Bhardwaj (29)
सही मॉनिटरिंग होना जरूरी
-सनी सेबेस्टियन, पूर्व वाइस-चांसलर, हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, जयपुर
WhatsApp Image 2026-04-08 at 2.45.11 PM
हो रहा दुरुपयोग, बंद करना बेहतर
-गोविंद चतुर्वेदी, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार
Ashish Bhardwaj (30)
ये भी पढे़:-
राजस्थान में संवैधानिक संकट, पंचायत-निकाय चुनावों में देरी पर गहलोत का कड़ा प्रहार
खेड़ा के घर पर असम पुलिस के छापे से उबली कांग्रेस, नेताओं ने कहा-हार के डर से बौखलाई भाजपा
जानिए आईपीएस माधव उपाध्याय की संपत्ति का पूरा हिसाब, जो प्रोबेशन पीरियड में ही भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari
Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग
By Jitendra Shrivastava
Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग
By Jitendra Shrivastava
Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग
By Jitendra Shrivastava
मंत्रालय में बड़ा फेरबदल, 38 अनुभाग अधिकारियों की बदली जिम्मेदारी; वित्त-गृह समेत कई विभागों में नई तैनाती
By VINAY VERMA
नवरात्रि के पहले इंदौर में 92 लाख रुपए की गर्भपात किट मिलने से भड़के हिंदूवादी नेता
By Sanjay Gupta, Sandeep Kumar
20 हजार करोड़ रुपए के बकाया चालान: सुप्रीम कोर्ट ने दिए अनोखे सुझाव: बिजली बिल में जुड़ सकती है चालान की राशि
By Neel Tiwari