राजस्थान की 80 तहसीलें सूखाग्रस्त, मुआवजे पर सवाल: रामपाल जाट बोले- पटवारी खेतों में नहीं जाते, किसानों का नुकसान कौन देखेगा?
Raghvendra Singh Rathore | Oct 27, 2026, 19:00 IST
राजस्थान की 80 तहसीलें सूखाग्रस्त घोषित। रामपाल जाट ने गिरदावरी पर सवाल उठाए
राजस्थान सरकार ने 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। इनमें 69 तहसीलें गंभीर और 11 मध्यम श्रेणी में रखी गई हैं। लेकिन किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल फसल खराबे के सही आकलन और मुआवजे का है। किसान नेता रामपाल जाट ने गिरदावरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि पटवारी खेतों तक नहीं पहुंचते और गलत आकलन का नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।
राजस्थान में खरीफ की फसल खराब होने के बाद सरकार ने 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। इनमें 69 तहसीलें गंभीर और 11 मध्यम सूखे की श्रेणी में रखी गई हैं। लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। सवाल उठ रहा है कि जिन किसानों की फसलें खराब हुई हैं, लेकिन उनकी तहसील सरकारी सूची में शामिल नहीं है, उन्हें राहत कैसे मिलेगी?
प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी सूखे जैसे हालात की शिकायतें सामने आई हैं। विपक्ष सरकार से प्रभावित क्षेत्रों का दोबारा सर्वे कराने की मांग कर रहा है। दूसरी तरफ किसान संगठनों ने फसल खराबे की गिरदावरी और मुआवजा तय करने की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
राजस्थान के आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग ने 24 और 25 अक्टूबर को दो अधिसूचनाएं जारी की हैं। पहली अधिसूचना में 13 जिलों की 53 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था। इसके बाद दूसरी अधिसूचना में 27 और तहसीलों को शामिल किया गया।
इस तरह प्रदेश के 14 जिलों की कुल 80 तहसीलें सूखाग्रस्त घोषित हुई हैं। इनमें जोधपुर की सबसे ज्यादा 12 तहसीलें शामिल हैं। बाड़मेर और जालोर की 10-10, बालोतरा की 9 और पाली की 8 तहसीलों को भी सूची में रखा गया है।
इसके अलावा डूंगरपुर, जैसलमेर और फलोदी की 7-7 तहसीलें, बांसवाड़ा की 3, चूरू और ब्यावर की 2-2 तथा बीकानेर, नागौर और सिरोही की एक-एक तहसील शामिल है।
सरकार की घोषणा के बाद सबसे बड़ा सवाल सूखाग्रस्त क्षेत्रों के चयन को लेकर उठ रहा है। अजमेर, अनूपगढ़, जयपुर, डीडवाना-कुचामन, भीलवाड़ा और राजसमंद सहित कई जिलों में भी सूखे जैसे हालात की जानकारी सामने आई है।
इन क्षेत्रों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब फसलों को नुकसान और पानी की कमी की शिकायतें हैं, तो संबंधित तहसीलों को सूखाग्रस्त सूची में क्यों नहीं रखा गया?
सूखे का आकलन करने के लिए जिला प्रशासन की रिपोर्ट, बारिश की स्थिति, भूजल और जलाशयों में पानी की उपलब्धता सहित फसलों की स्थिति देखी जाती है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों के चयन और वास्तविक नुकसान के बीच अंतर होने की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
किसान नेता रामपाल जाट ने द सूत्र से बातचीत में प्रदेश की गिरदावरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार के पास यह सुनिश्चित करने की प्रभावी व्यवस्था नहीं है कि किसानों की फसलों का वास्तविक नुकसान सही तरीके से दर्ज हो रहा है या नहीं।
जाट ने आरोप लगाया कि पटवारी अपने कार्यालयों और घरों से बाहर निकलकर खेतों में नहीं जाते। जब खेतों में जाकर फसलों की वास्तविक स्थिति ही नहीं देखी जाएगी, तो सही गिरदावरी कैसे बनेगी?
उन्होंने कहा कि गलत गिरदावरी का सीधा नुकसान किसानों को होता है। किसान की फसल खराब हो जाती है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में नुकसान का सही आकलन नहीं होने से उसे उचित मुआवजा नहीं मिल पाता।
रामपाल जाट ने फसल खराबे के आकलन में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार ने सैटेलाइट और ड्रोन की सहायता से फसलों का सर्वे और गिरदावरी कराने की बात कही थी। लेकिन अभी तक ऐसी प्रभावी व्यवस्था जमीन पर नजर नहीं आ रही है, जिससे हर किसान के नुकसान का सही आकलन सुनिश्चित हो सके।
जाट का कहना है कि जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, तो किसानों को पुरानी व्यवस्था की खामियों का नुकसान क्यों उठाना पड़ रहा है? सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे वास्तविक फसल खराबे का सही रिकॉर्ड तैयार हो और किसानों को मुआवजे के लिए परेशान नहीं होना पड़े।
रामपाल जाट ने सरकार की प्राथमिकताओं पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अगर उद्योगपतियों की बात होती है, तो सरकार उनके लिए रेड कार्पेट बिछा देती है। लेकिन देश का सबसे बड़ा निवेशक किसान है, जिसकी कोई सुनवाई नहीं होती।
जाट ने कहा कि किसान खेती में अपनी पूंजी लगाता है, मेहनत करता है और महीनों तक फसल तैयार होने का इंतजार करता है। इसके बाद प्राकृतिक आपदा से फसल खराब हो जाए, तो उसे अपने नुकसान का सही मुआवजा पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार बड़े निवेशकों के लिए सुविधाएं उपलब्ध करा सकती है, तो किसानों के नुकसान का सही आकलन और समय पर राहत देने की व्यवस्था क्यों नहीं कर सकती?
राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी सरकार की सूखाग्रस्त तहसीलों की सूची पर सवाल उठाए हैं। जूली ने कहा कि प्रदेश की 425 तहसीलों में से केवल 80 को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। उन्होंने पूछा कि बाकी प्रभावित क्षेत्रों को किस आधार पर सूची से बाहर रखा गया?
उन्होंने जिला कलेक्टरों की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और सूखे से प्रभावित क्षेत्रों का दोबारा सर्वे कराने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि जिन किसानों की फसलें खराब हुई हैं, उन्हें केवल इसलिए राहत से वंचित नहीं रहना चाहिए कि उनकी तहसील सरकारी अधिसूचना में शामिल नहीं है।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रदेश में सूखे और फसल खराबे के मुद्दे पर सरकार को घेर चुके हैं। गहलोत ने पश्चिमी राजस्थान में फसलों को हुए नुकसान, पानी की कमी और पशुओं के लिए चारे के संकट का मुद्दा उठाया था।
उन्होंने सरकार से प्रभावित क्षेत्रों को जल्द सूखाग्रस्त घोषित करने और राहत कार्य शुरू करने की मांग की थी। गहलोत ने पशुओं के लिए चारा डिपो, पशु शिविर और पेयजल की कमी वाले इलाकों में टैंकरों से पानी पहुंचाने जैसे कदम उठाने पर जोर दिया था।
सरकार ने सूखाग्रस्त तहसीलों की घोषणा कर दी है, लेकिन किसानों के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल राहत मिलने का है। किस गांव में कितनी फसल खराब हुई, गिरदावरी में कितना नुकसान दर्ज किया गया और किस किसान को कितनी सहायता मिलेगी, इन सवालों का जवाब वास्तविक आकलन और राहत वितरण की प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
किसान नेता रामपाल जाट के आरोपों और विपक्ष की मांगों के बीच सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, सूखाग्रस्त सूची से बाहर रह गए प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का आकलन करना। दूसरी, जिन तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है, वहां किसानों तक सही और समय पर राहत पहुंचाना।
प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी सूखे जैसे हालात की शिकायतें सामने आई हैं। विपक्ष सरकार से प्रभावित क्षेत्रों का दोबारा सर्वे कराने की मांग कर रहा है। दूसरी तरफ किसान संगठनों ने फसल खराबे की गिरदावरी और मुआवजा तय करने की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
14 जिलों की 80 तहसीलें सूखाग्रस्त, 69 में गंभीर हालात
इस तरह प्रदेश के 14 जिलों की कुल 80 तहसीलें सूखाग्रस्त घोषित हुई हैं। इनमें जोधपुर की सबसे ज्यादा 12 तहसीलें शामिल हैं। बाड़मेर और जालोर की 10-10, बालोतरा की 9 और पाली की 8 तहसीलों को भी सूची में रखा गया है।
इसके अलावा डूंगरपुर, जैसलमेर और फलोदी की 7-7 तहसीलें, बांसवाड़ा की 3, चूरू और ब्यावर की 2-2 तथा बीकानेर, नागौर और सिरोही की एक-एक तहसील शामिल है।
जयपुर सहित दूसरे जिलों में भी सूखे जैसे हालात, सूची से बाहर क्यों?
इन क्षेत्रों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब फसलों को नुकसान और पानी की कमी की शिकायतें हैं, तो संबंधित तहसीलों को सूखाग्रस्त सूची में क्यों नहीं रखा गया?
सूखे का आकलन करने के लिए जिला प्रशासन की रिपोर्ट, बारिश की स्थिति, भूजल और जलाशयों में पानी की उपलब्धता सहित फसलों की स्थिति देखी जाती है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों के चयन और वास्तविक नुकसान के बीच अंतर होने की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
रामपाल जाट बोले- पटवारी खेतों में नहीं जाते, सही गिरदावरी कैसे बनेगी?
जाट ने आरोप लगाया कि पटवारी अपने कार्यालयों और घरों से बाहर निकलकर खेतों में नहीं जाते। जब खेतों में जाकर फसलों की वास्तविक स्थिति ही नहीं देखी जाएगी, तो सही गिरदावरी कैसे बनेगी?
उन्होंने कहा कि गलत गिरदावरी का सीधा नुकसान किसानों को होता है। किसान की फसल खराब हो जाती है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में नुकसान का सही आकलन नहीं होने से उसे उचित मुआवजा नहीं मिल पाता।
सैटेलाइट और ड्रोन से गिरदावरी के दावे, जमीन पर व्यवस्था कहां?
जाट का कहना है कि जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, तो किसानों को पुरानी व्यवस्था की खामियों का नुकसान क्यों उठाना पड़ रहा है? सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे वास्तविक फसल खराबे का सही रिकॉर्ड तैयार हो और किसानों को मुआवजे के लिए परेशान नहीं होना पड़े।
उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट, किसानों की सुनवाई नहीं- रामपाल जाट
जाट ने कहा कि किसान खेती में अपनी पूंजी लगाता है, मेहनत करता है और महीनों तक फसल तैयार होने का इंतजार करता है। इसके बाद प्राकृतिक आपदा से फसल खराब हो जाए, तो उसे अपने नुकसान का सही मुआवजा पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार बड़े निवेशकों के लिए सुविधाएं उपलब्ध करा सकती है, तो किसानों के नुकसान का सही आकलन और समय पर राहत देने की व्यवस्था क्यों नहीं कर सकती?
टीकाराम जूली ने उठाए सवाल, कलेक्टरों की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
उन्होंने जिला कलेक्टरों की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और सूखे से प्रभावित क्षेत्रों का दोबारा सर्वे कराने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि जिन किसानों की फसलें खराब हुई हैं, उन्हें केवल इसलिए राहत से वंचित नहीं रहना चाहिए कि उनकी तहसील सरकारी अधिसूचना में शामिल नहीं है।
गहलोत भी उठा चुके हैं राहत में देरी का मुद्दा
उन्होंने सरकार से प्रभावित क्षेत्रों को जल्द सूखाग्रस्त घोषित करने और राहत कार्य शुरू करने की मांग की थी। गहलोत ने पशुओं के लिए चारा डिपो, पशु शिविर और पेयजल की कमी वाले इलाकों में टैंकरों से पानी पहुंचाने जैसे कदम उठाने पर जोर दिया था।
घोषणा हो गई, अब किसानों को राहत कब मिलेगी?
किसान नेता रामपाल जाट के आरोपों और विपक्ष की मांगों के बीच सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, सूखाग्रस्त सूची से बाहर रह गए प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का आकलन करना। दूसरी, जिन तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है, वहां किसानों तक सही और समय पर राहत पहुंचाना।
एमपी के आयुष विभाग में अफसरों की मनमानी? नियमितीकरण से ट्रांसफर तक नियमों की अनदेखी के आरोप
By Atul Dwivedi
राजस्थान में पंचायत चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग होगी कल, 1.06 करोड़ वोटर डालेंगे वोट
By Ashish Bhardwaj
धान खरीदी 15 नवंबर से, 3100 रुपए रेट, कर्मचारियों को कैशलेस इलाज, बिजली छूट मार्च तक बढ़ी, 19 फैसलों में सरकार ने खोला खजाना
By VINAY VERMA
SI भर्ती 2021 पेपर लीक: सरगना जगदीश विश्नोई का सॉल्वर मनोहर लाल गिरफ्तार, अब तक 157 चढ़े हत्थे
By Jageshwar Prasad
एमपी बीजेपी विधायक का वीडियो वायरल: सदस्य खरीदने के दावे पर बवाल, कांग्रेस ने उठाए सवाल
By Arohi Raj
मंत्रियों के कामकाज पर खफा हुईं स्मृति इरानी, वर्किंग सुधारने के लिए डेडलाइन,एक एक से किया सवाल-जवाब
By Arun Tiwari
राजस्थान हाईकोर्ट के निर्देश, तीन महीने में लागू हो हिरासत में मौत पर राहत योजना
By Mukesh Sharma