सचिवालय से लेकर बाड़मेर तक सियासी तपिश, ढाई साल बाद सीएमओ का री-डिजाइन
Jinesh Jain | Apr 04, 2026, 19:29 IST
Photograph: (the sootr)
इस सप्ताह राजस्थान में शासन सचिवालय की गलियों से लेकर सरहदी जिले बाड़मेर की सियासी तपिश दिखी। एक तरफ जहां सीएमओ का पूरा चेहरा बदला दिखा, वहीं बाड़मेर में विधायक रविंद्र सिंह भाटी बड़े विवाद में फंसते नजर आए। ये आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय करेंगे।
यह हफ्ता राजस्थान के लिए केवल प्रशासनिक फेरबदल का ही नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष केंद्रों के बीच शक्ति संतुलन और शुचिता की फिर से स्थापना के प्रयासों का रहा है। एक ओर मुख्यमंत्री अपनी टीम को धार दे रहे हैं, तो दूसरी ओर अदालतें संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ी हैं। लेकिन, बाड़मेर का विवाद और वीआईपी नंबर घोटाला याद दिलाता है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता और संवाद की गरिमा अभी भी एक चुनौती है।
इस सप्ताह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सत्ता संभालने के लगभग ढाई साल बाद सचिवालय और मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के बीच शक्ति संतुलन का बड़ा प्रयोग किया है। 65 आईएएस अधिकारियों की हालिया दूसरी तबादला सूची केवल रूटीन बदलाव नहीं, बल्कि सीएमओ का री-डिजाइन भी है।
सबसे महत्वपूर्ण संदेश एसीएस अखिल अरोड़ा के कद में हुई वृद्धि है। अशोक गहलोत सरकार में बेहद प्रभावशाली रहे अरोड़ा का वर्तमान सरकार में भी दबदबा कायम है। सूत्रों की मानें तो सीएमओ में नई टीम के चयन में उनकी पसंद को तवज्जो मिली है।
सरहदी जिले बाड़मेर में इन दिनों सियासी पारा सातवें आसमान पर है। शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी और प्रख्यात भजन गायक छोटू सिंह रावणा के बीच छिड़ी जुबानी जंग अब पुलिस की फाइलों तक पहुंच गई है। यह विवाद डिजिटल नैरेटिव और सोशल मीडिया माइलेज की राजनीति पर गंभीर प्रहार है।
एक कैंसर बच्चे के वीडियो पर भजन गायक रावणा की टिप्पणी शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी को नागवार गुजरी। दरअसल, रावणा ने यह टिप्पणी की कि काश, बेटा आप रील स्टार होते तो सारे नेता आपके पास होते। इस टिप्पणी से विधायक रविंद्र सिंह भाटी नाराज हो उठे। उन्होंने बाकायदा इसे साजिश करार देते हुए इस मामले को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। राजस्थान जैसे राज्य में 36 कौम का भाईचारा सामाजिक ताने-बाने का आधार है, वहां दो प्रभावशाली हस्तियों का यह टकराव सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा भी पैदा करता है।
इस सप्ताह परिवहन विभाग की जांच ने प्रदेश के सियासी सूरमाओं के चेहरे से नकाब हटा दिया। वीआईपी नंबरों के फर्जीवाड़े में कुछ बड़े नेताओं के नाम सामने आए। यह मामला उजागर करता है कि सत्ता और रसूख का इस्तेमाल किस तरह सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए किया जाता रहा है। मामला कुछ थ्री नंबरों की हेरफेरी तक सीमित नहीं रहा।
कुछ बड़े नेताओं ने बैक-डेट एंट्री और सिस्टम में हेरफेरी करके 15-15 लाख रुपये के नंबरों को मुफ्त या कम दाम पर हासिल किया। इस हेराफेरी से पता चलता है कि डिजिटलाइजेशन के दावों के बावजूद सिस्टम में छेद बरकरार हैं। आरसी निरस्त करने की प्रक्रिया स्वागत योग्य है, लेकिन क्या उन रसूखदारों पर कानूनी कार्रवाई होगी, जिन्होंने इस चोरी को अंजाम दिया।
राज्य
राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट का कड़ा रुख राज्य सरकार और चुनाव आयोग के लिए एक वेक-अप कॉल है। एक्टिंग चीफ जस्टिस की बेंच ने राज्य चुनाव आयुक्त को अवमानना का नोटिस जारी कर यह स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक बाध्यताओं और अदालती आदेशों के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सरकार का वन स्टेट वन इलेक्शन का एजेंडा अपनी जगह है, लेकिन संविधान के अनुसार 5 साल में चुनाव कराना अनिवार्य है। चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट की तारीखें बार-बार बढ़ाना अदालत को गुमराह करने जैसा लगा। यह मामला लोकतंत्र की जमीनी इकाई यानी पंचायतों को प्रशासकों के भरोसे छोड़ने की सरकारी मंशा पर भी सवाल खड़ा करता है।
राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) इस सप्ताह दो प्रमुख कारणों से चर्चा में रहा। सुप्रीम कोर्ट से एसआई भर्ती परीक्षा 2025 को लेकर आरपीएससी को मिली राहत उन 2.25 लाख ओवरएज अभ्यर्थियों के लिए वज्रपात जैसी है, जो परीक्षा में बैठने की उम्मीद लगाए बैठे थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राहत केवल याचिकाकर्ता तक सीमित रहेगी।
व्यावहारिक तौर पर आयोग की यह दलील कि दो दिन में इन ओवरएज अभ्यर्थियों को परीक्षा कराना असंभव नहीं है, अपने स्तर पर सही हो सकती है, लेकिन उन युवाओं के करियर का क्या जो भर्ती में देरी के कारण ओवरएज हो गए। इसी 5-6 अप्रैल को होने वाली इस परीक्षा में 7.70 लाख अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर है।
वहीं दूसरी ओर, आरपीएससी ने डिप्टी कमांडेंट भर्ती में एक सराहनीय पहल की है। रिजल्ट से पहले ही डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन का निर्णय लेना उन 'अयोग्य' फॉर्म भरने वालों के लिए कड़ा संदेश है जो सिस्टम को जाम करने का प्रयास करते हैं। 10 हजार आवेदनों में से केवल 255 का परीक्षा देना यह साबित करता है कि प्रदेश में फर्जी फॉर्म की एक बड़ी समस्या है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 217 के तहत कार्रवाई की चेतावनी ने पारदर्शिता की दिशा में एक नया मानक स्थापित किया है।
अगले सप्ताह फिर मिलेंगे नई साप्ताहिक चिट्ठी के साथ।
बदला सीएमओ का पूरा चेहरा, जानिए जितेंद्र, मुकुल और अमिता की कैसे हुई एंट्री
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अखिल अरोड़ा का उदय और सीएमओ का नया चेहरा
सबसे महत्वपूर्ण संदेश एसीएस अखिल अरोड़ा के कद में हुई वृद्धि है। अशोक गहलोत सरकार में बेहद प्रभावशाली रहे अरोड़ा का वर्तमान सरकार में भी दबदबा कायम है। सूत्रों की मानें तो सीएमओ में नई टीम के चयन में उनकी पसंद को तवज्जो मिली है।
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बाड़मेर का सियासी संग्राम
एक कैंसर बच्चे के वीडियो पर भजन गायक रावणा की टिप्पणी शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी को नागवार गुजरी। दरअसल, रावणा ने यह टिप्पणी की कि काश, बेटा आप रील स्टार होते तो सारे नेता आपके पास होते। इस टिप्पणी से विधायक रविंद्र सिंह भाटी नाराज हो उठे। उन्होंने बाकायदा इसे साजिश करार देते हुए इस मामले को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। राजस्थान जैसे राज्य में 36 कौम का भाईचारा सामाजिक ताने-बाने का आधार है, वहां दो प्रभावशाली हस्तियों का यह टकराव सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा भी पैदा करता है।
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वीआईपी नंबर घोटाला, रसूख के नीचे दबा भ्रष्टाचार
कुछ बड़े नेताओं ने बैक-डेट एंट्री और सिस्टम में हेरफेरी करके 15-15 लाख रुपये के नंबरों को मुफ्त या कम दाम पर हासिल किया। इस हेराफेरी से पता चलता है कि डिजिटलाइजेशन के दावों के बावजूद सिस्टम में छेद बरकरार हैं। आरसी निरस्त करने की प्रक्रिया स्वागत योग्य है, लेकिन क्या उन रसूखदारों पर कानूनी कार्रवाई होगी, जिन्होंने इस चोरी को अंजाम दिया।
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राज्य चुनाव आयोग को कोर्ट की फटकार
सरकार का वन स्टेट वन इलेक्शन का एजेंडा अपनी जगह है, लेकिन संविधान के अनुसार 5 साल में चुनाव कराना अनिवार्य है। चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट की तारीखें बार-बार बढ़ाना अदालत को गुमराह करने जैसा लगा। यह मामला लोकतंत्र की जमीनी इकाई यानी पंचायतों को प्रशासकों के भरोसे छोड़ने की सरकारी मंशा पर भी सवाल खड़ा करता है।
आरपीएससी के दो चेहरे, राहत और सख्ती
व्यावहारिक तौर पर आयोग की यह दलील कि दो दिन में इन ओवरएज अभ्यर्थियों को परीक्षा कराना असंभव नहीं है, अपने स्तर पर सही हो सकती है, लेकिन उन युवाओं के करियर का क्या जो भर्ती में देरी के कारण ओवरएज हो गए। इसी 5-6 अप्रैल को होने वाली इस परीक्षा में 7.70 लाख अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर है।
वहीं दूसरी ओर, आरपीएससी ने डिप्टी कमांडेंट भर्ती में एक सराहनीय पहल की है। रिजल्ट से पहले ही डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन का निर्णय लेना उन 'अयोग्य' फॉर्म भरने वालों के लिए कड़ा संदेश है जो सिस्टम को जाम करने का प्रयास करते हैं। 10 हजार आवेदनों में से केवल 255 का परीक्षा देना यह साबित करता है कि प्रदेश में फर्जी फॉर्म की एक बड़ी समस्या है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 217 के तहत कार्रवाई की चेतावनी ने पारदर्शिता की दिशा में एक नया मानक स्थापित किया है।
अगले सप्ताह फिर मिलेंगे नई साप्ताहिक चिट्ठी के साथ।
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