एक शहर-एक निगम ने बदले सियासी समीकरण, जयपुर-कोटा-जोधपुर में कैसे बनेगा बोर्ड?
Mukesh Sharma | Sept 10, 2026, 18:09 IST
राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव
राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव 2026 में जयपुर, जोधपुर और कोटा में दो की जगह एक निगम है। बदले परिसीमन से BJP-कांग्रेस के पुराने सियासी समीकरण भी बदल गए हैं।
राजस्थान में नगर निगम चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण का मतदान शुक्रवार को होगा। फाइनल फेज में जयपुर, जोधपुर और कोटा समेत 147 निकायों में वोट डाले जाएंगे।
सबसे ज्यादा नजर जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम के चुनाव पर रहेगी। इसकी वजह यह है कि 2020 में इन तीनों शहरों में दो-दो नगर निगम के आधार पर चुनाव हुए थे। इस बार तीनों शहरों में फिर एक-एक नगर निगम है।
2019 में हुए निगम विभाजन के बाद जिन पुराने शहर और अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों के दम पर कांग्रेस को बढ़त मिली थी, एक निगम बनते ही तस्वीर बदल गई है।
गहलोत सरकार के समय जयपुर को हेरिटेज और ग्रेटर, जबकि जोधपुर और कोटा को उत्तर और दक्षिण नगर निगम में बांटा गया था। भजनलाल सरकार ने एक शहर-एक निगम की व्यवस्था लागू करते हुए तीनों शहरों का परिसीमन फिर एक नगर निगम में कर दिया।
इस बार के चुनाव इसलिए भी अहम हैं कि इससे सरकार की 'एक शहर-एक निगम' की नीति की साख तय होगी। साथ ही यह भी पता चलेगा कि 2020 में मजबूत प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस क्या दोबारा उसी तरह का प्रदर्शन कर पाती है या नहीं?
राजस्थान में 2020 के नगरीय निकाय चुनाव के समय जयपुर, जोधपुर और कोटा में दो-दो नगर निगम बनाए थे। पुराने शहर और कुछ खास इलाकों को अलग नगर निगम में रखने से कांग्रेस को सियासी फायदा मिला था। जयपुर में हेरिटेज, जोधपुर उत्तर और कोटा उत्तर जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस अपने पारंपरिक शहरी और अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करने में कामयाब रही थी।
इन 6 नगर निगमों में कांग्रेस ने 4 जगह बोर्ड बनाए थे। इनमें दो जगह उसे बहुमत मिला था, जबकि दो स्थानों पर निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से बोर्ड बना था। कांग्रेस के खाते में चार नगर निगम में महापौर की कुर्सी भी आई थी। इससे शहरों की स्थानीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव बढ़ा था।
भाजपा को नगर निगमों के बंटवारे का नुकसान उठाना पड़ा था। बीजेपी शहरी इलाकों में मजबूत मानी जाती है। क्योंकि मध्यमवर्गीय और व्यापारी वर्ग उसका कोर वोटर माना जाता है। लेकिन जयपुर, जोधपुर और कोटा में दो-दो निगम बनने से उसका वोट और संगठन भी दो हिस्सों में बंट गया था। भाजपा सिर्फ जयपुर ग्रेटर और जोधपुर दक्षिण में बहुमत हासिल कर पाई थी। वहीं कई अहम शहरी इलाके उसके हाथ से निकल गए थे।
भजनलाल सरकार ने जयपुर, जोधपुर और कोटा में एक नगर निगम करने के साथ ही परिसीमन के बाद वार्डों की संख्या भी कम हो गई। 2026 के नगरीय निकाय चुनाव में यह स्थिति है।
जयपुर: 250 से घटकर 150 वार्ड
कोटा: 150 से घटकर 100 वार्ड
जोधपुर: 160 से घटकर 100 वार्ड
वार्डों की संख्या घटने के साथ उनकी सीमाएं भी बदली गई हैं। इसका सीधा असर दोनों दलों के स्थानीय समीकरण पर पड़ेगा।
बड़े वार्ड और नई सीमाएं भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकती। भाजपा का पारंपरिक शहरी और व्यापारी वर्ग का वोट अब बड़े वार्डों में एक साथ आ सकता। इससे पार्टी को अपने पुराने शहरी गढ़ों में मजबूत होने का मौका मिल सकता। एक शहर में अब एक ही महापौर होगा। ऐसे में स्थानीय सत्ता का बंटवारा भी खत्म होगा।
भाजपा इसे केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय के बीच बेहतर तालमेल यानी ट्रिपल इंजन सरकार के रूप में भी पेश कर रही। पार्टी की कोशिश तीनों बड़े शहरों में अपना राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव मजबूत करने की है।
जयपुर नगर निगम में अब टक्कर सिर्फ चारदीवारी तक बंधकर नहीं रहेगी। ग्रेटर नगर निगम क्षेत्र के असर वाली विधानसभा सीटें- विद्याधर नगर, सांगानेर, झोटवाड़ा और मालवीय नगर, हेरिटेज निगम में अब हवामहल, किशनपोल और आदर्श नगर जैसी हेरिटेज (चारदीवारी) सीटों पर भारी पड़ती दिख रही। पहले जो छोटे और कांग्रेस के लिए सुरक्षित वार्ड थे, उनमें से कई नए परिसीमन में खत्म हो गए हैं या बड़े वार्डों में शामिल कर दिए गए।
वार्डों की संख्या कम होने और सीमाएं बदलने से कांग्रेस के लिए बहुमत जुटाना पहले के मुकाबले मुश्किल हो सकता। महापौर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए भी पार्टी को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।
हेरिटेज क्षेत्र में हमेशा से ही कांग्रेस का प्रदर्शन मजबूत रहा, लेकिन बाहरी इलाकों के 60 से अधिक वार्ड, जहां भाजपा की स्थिति मजबूत है, कांग्रेस की बढ़त को कम करनी की स्थिति में हैं। यानी जयपुर निगम में जीत की चाबी पुराने पुराने शहर में नहीं, बल्कि नए विकसित इलाकों के वोटर्स के हाथ में होगी।
![जयपुर नगर निगम]()
जोधपुर में नॉर्थ क्षेत्र- सूरसागर के हिस्से और शहर विधानसभा- कांग्रेस का मजबूत वोटबैंक वाला इलाका माना जा रहा है। वहीं, साउथ क्षेत्र में सरदारपुरा का बाहरी हिस्सा और लूणी से सटे शहरी वार्ड भाजपा के साथ खड़े दिखते। राजस्थान में फिलहाल भाजपा की सरकार है और सत्ता में होने का फायदा उसे जोधपुर के नए शहरी इलाकों में मिल सकता। क्योंकि राजस्थान के इतिहास में जिस पार्टी की सरकार रहती है, उसे वार्ड परिसीमन का उसे फायदा मिलता रहा है।
![जोधपुर नगर निगम]()
कोटा नगर निगम में इस बार मुकाबला फिफ्टी-फिफ्टी वाला बताया जा रहा। कोटा साउथ, सांगोद और लाडपुरा से सटे शहरी वार्डों में भाजपा की स्थिति मजबूत दिख रही, जबकि नॉर्थ में कांग्रेस के मजबूत नेता शांति धारीवाल का पार्टी को फायदा मिल सकता है। गहलोत सरकार के दौरान धारीवाल की पहचान विकास कराने वाले नेता के रूप में रही है। ऐसे में यहां जो भी दल सीधी टक्कर में आगे रहेगा, वही निर्णायक साबित होगा।
![कोटा नगर निगम]()
कांग्रेस ने निर्दलीय के समर्थन से बोर्ड और मेयर बनाया था। बाद में मेयर और कुछ पार्षद भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद भाजपा का बोर्ड बन गया था।
जयपुर, जोधपुर और कोटा के इस चुनाव में सिर्फ पार्षदों का चुनाव नहीं है। तीनों शहरों में एक शहर-एक निगम की व्यवस्था की भी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा है।
2020 में जहां छह नगर निगम के जरिए चुनाव हुआ था, वहीं इस बार तीन नगर निगम के जरिए मुकाबला हो रहा है। वार्डों की संख्या कम है। सीमाएं बदली हैं। पुराने राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। अब चुनाव परिणाम बताएंगे कि नई व्यवस्था का फायदा किसे मिला और तीनों बड़े शहरों में जनता ने भाजपा और कांग्रेस में से किसे अपनी पसंद बनाया।
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सबसे ज्यादा नजर जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम के चुनाव पर रहेगी। इसकी वजह यह है कि 2020 में इन तीनों शहरों में दो-दो नगर निगम के आधार पर चुनाव हुए थे। इस बार तीनों शहरों में फिर एक-एक नगर निगम है।
2019 में हुए निगम विभाजन के बाद जिन पुराने शहर और अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों के दम पर कांग्रेस को बढ़त मिली थी, एक निगम बनते ही तस्वीर बदल गई है।
एक शहर-एक निगम से बदलेगा सियासी समीकरण
इस बार के चुनाव इसलिए भी अहम हैं कि इससे सरकार की 'एक शहर-एक निगम' की नीति की साख तय होगी। साथ ही यह भी पता चलेगा कि 2020 में मजबूत प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस क्या दोबारा उसी तरह का प्रदर्शन कर पाती है या नहीं?
2020 में दो निगम होने का कांग्रेस को मिला था फायदा
इन 6 नगर निगमों में कांग्रेस ने 4 जगह बोर्ड बनाए थे। इनमें दो जगह उसे बहुमत मिला था, जबकि दो स्थानों पर निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से बोर्ड बना था। कांग्रेस के खाते में चार नगर निगम में महापौर की कुर्सी भी आई थी। इससे शहरों की स्थानीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव बढ़ा था।
भाजपा को 2020 में तीन शहरों के बंटवारे से हुआ था नुकसान
भजनलाल सरकार ने जयपुर, जोधपुर और कोटा में एक नगर निगम करने के साथ ही परिसीमन के बाद वार्डों की संख्या भी कम हो गई। 2026 के नगरीय निकाय चुनाव में यह स्थिति है।
जयपुर: 250 से घटकर 150 वार्ड
कोटा: 150 से घटकर 100 वार्ड
जोधपुर: 160 से घटकर 100 वार्ड
वार्डों की संख्या घटने के साथ उनकी सीमाएं भी बदली गई हैं। इसका सीधा असर दोनों दलों के स्थानीय समीकरण पर पड़ेगा।
भाजपा को जयपुर में वार्ड घटने का क्यों मिलेगा फायदा?
भाजपा इसे केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय के बीच बेहतर तालमेल यानी ट्रिपल इंजन सरकार के रूप में भी पेश कर रही। पार्टी की कोशिश तीनों बड़े शहरों में अपना राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव मजबूत करने की है।
कांग्रेस के सामने जयपुर में क्या है चुनौती?
वार्डों की संख्या कम होने और सीमाएं बदलने से कांग्रेस के लिए बहुमत जुटाना पहले के मुकाबले मुश्किल हो सकता। महापौर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए भी पार्टी को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।
हेरिटेज क्षेत्र में हमेशा से ही कांग्रेस का प्रदर्शन मजबूत रहा, लेकिन बाहरी इलाकों के 60 से अधिक वार्ड, जहां भाजपा की स्थिति मजबूत है, कांग्रेस की बढ़त को कम करनी की स्थिति में हैं। यानी जयपुर निगम में जीत की चाबी पुराने पुराने शहर में नहीं, बल्कि नए विकसित इलाकों के वोटर्स के हाथ में होगी।
जयपुर नगर निगम
जोधपुर में एक निगम से कैसे बन रहे समीकरण?
जोधपुर नगर निगम
कोटा में कैसा बन रहा सियासी गणित?
कोटा नगर निगम
कांग्रेस ने निर्दलीय के समर्थन से बोर्ड और मेयर बनाया था। बाद में मेयर और कुछ पार्षद भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद भाजपा का बोर्ड बन गया था।
अब एक निगम की पहली बड़ी परीक्षा
2020 में जहां छह नगर निगम के जरिए चुनाव हुआ था, वहीं इस बार तीन नगर निगम के जरिए मुकाबला हो रहा है। वार्डों की संख्या कम है। सीमाएं बदली हैं। पुराने राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। अब चुनाव परिणाम बताएंगे कि नई व्यवस्था का फायदा किसे मिला और तीनों बड़े शहरों में जनता ने भाजपा और कांग्रेस में से किसे अपनी पसंद बनाया।
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