मंत्री-विधायकों के घर क्यों उमड़ रहा हुजूम, जानिए तबादलों का पूरा जुगाड़ कल्चर
Mukesh Sharma | Jun 29, 2026, 17:28 IST
राजस्थान में तबादला सीजन, जुगाड़ कल्चर हावी, मंत्रियों के घर उमड़ी भीड़
राजस्थान में तबादलों के लिए जुगाड़ कल्चर तेज हो गई है। तबादला चाहने वालों की भीड़ मंत्रियों और विधायकों के घर उमड़ रही है। क्या यह मारा-मारी जरूरतमंद को राहत दे पाएगी।
Jaipur: राजस्थान की सियासी और प्रशासनिक आबो-हवा बदली हुई है। एक ही चर्चा है-तबादला। मंत्री-विधायकों के बंगलों पर तबादला चाहने वालों का हुजूम उमड़ रहा है।
सरकार ने 5 जुलाई तक के लिए तबादलों से रोक हटाई है। रोक के हटते ही पंसदीदा जगह पोस्टिंग के लिए लोग उन तमाम जगहों पर चक्कर काट रहे हैं, जहां से उन्हें तबादले की उम्मीद है।
सचिवालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक मनपसंद जगह पोस्टिंग चाहने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों का रैला उमड़ रहा है। सुबह से शाम तक सिर्फ सिफारिशों और अर्जियों का दौर चल रहा है।
तबादलों के लिए यह भीड़ पहली बार नहीं उमड़ी है। प्रदेश में यह बरसों पुरानी रवायत बन चुकी है। सरकार जब भी ट्रांसफर से बैन हटाती है, सत्ता के दरवाजों पर मेला लग जाता है। लोगों की जुगाड़ कल्चर शुरू हो जाती है।
दरअसल, तबादलों के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं है। बरसों से यह परंपरा बन गई है कि तबादलों में स्थानीय विधायक और सांसदों की डिजायर को ही तवज्जो दी जाएगी। इसमें खासकर सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधियों को वजन मिलेगा।
इसी डिजायर की चाह में तबादला चाहने वाले लोग विधायकों के घर उमड़ रहे हैं। एक विधायक का कहना है कि आपके क्षेत्र में किन अधिकारी-कर्मचारियों को पोस्टिंग मिल रही है, यह बात उनकी नजर में होनी चाहिए। यह देखना होता कि संबंधित व्यक्ति की निष्ठा किस दल से जुड़ी है।
हालांकि, पूर्व विधायक बनवारी लाल सिंघल डिजायर सिस्टम पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि तबादले 12 महीने जारी रहने चाहिए। इसकी प्रक्रिया कार्मिक विभाग के जरिए कराई जाए, जो आवेदनों की जांच करके जरूरतमंदों का ट्रांसफर कर सके।
सरकार ने इस बार तबादलों के लिए जो आदेश जारी किए हैं, उसमें दावा किया है कि गंभीर और जरूरतमंद मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी।
प्राथमिकता सूची में एकल महिला, विधवा, परित्यक्ता, असाध्य रोगों से पीड़ित कर्मचारी, लंबी सेवा अवधि वाले कार्मिक, दिव्यांगजन और ऐसे पति-पत्नी जो दोनों ही सरकारी सेवा में हैं, उन्हें रखा गया है।
सवाल है कि क्या वाकई इन जरूरतमंद कर्मचारियों को आसानी से राहत मिल पाएगी? या फिर कागजी गाइडलाइन धरी की धरी रह जाएगी अथवा जुगाड़ वाले लोग बाजी मार ले जाएंगे?
जानकार बताते हैं कि तबादला सीजन शुरू होते ही जुगाड़ कल्चर सबसे ज्यादा हावी हो जाता है। नियमों से ज्यादा साम, दाम, दंड, भेद और व्यक्तिगत कारक ट्रांसफर में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
जो जरूरतमंद कर्मचारी बिना किसी पहुंच के सिर्फ अपनी मजबूरी के भरोसे बैठा है, वह अक्सर सचिवालय और मंत्रियों के चक्कर ही काटता रह जाता है। उसकी अर्जी सिफारिशों के भारी वजन के नीचे दब जाती है।
राजस्थान की सियासत का यह सबसे कड़वा पहलू है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां पारदर्शी तबादला नीति लाने का बड़ा-बड़ा वादा करती रही हैं। दोनों दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में भी इसे प्रमुखता से शामिल करते रहे हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा कहते हैं कि तबादला नीति नहीं बनने के पीछे कई कारण होते हैं। किसी एक कारक को जिम्मेदार ठहराना मुश्किल है। मैंने शिक्षा मंत्री रहते हुए तबादला नीति बनाई थी, लेकिन वह लागू नहीं हो पाई थी।
भाजपा ने 2023 के अपने चुनावी संकल्प पत्र में वादा किया था कि वे एक पारदर्शी स्थानांतरण नीति लाएंगे। इससे तबादलों में भेदभाव को रोका जा सकेगा।
रोचक बात यह है कि भजनलाल सरकार ने इस संकल्प पत्र को आधिकारिक दस्तावेज के रूप में स्वीकार भी किया। हकीकत यह है कि भाजपा को सत्ता में आए ढाई साल बीत जाने के बाद भी इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
नतीजतन, इस बार का तबादला सीजन भी पुरानी डिजायर परिपाटी पर ही चल पड़ा है, जहां ट्रांसफर नीति से ज्यादा जुगाड़ और सिफारिशों की गूंज सुनाई दे रही है।
इस बार के आदेश में थर्ड ग्रेड टीचर्स (तृतीय श्रेणी शिक्षक) और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के तबादलों पर छूट नहीं दी गई है।
प्रदेश में थर्ड ग्रेड टीचर्स के तबादले पिछले 8 सालों से पूरी तरह बंद हैं। इन पर रोक वसुंधरा राजे सरकार के समय से लगी हुई है।
वसुंधरा सरकार के बाद कांग्रेस सरकार आई। अब भजनलाल सरकार काम कर रही है, लेकिन कोई भी सरकार इन शिक्षकों के दर्द को दूर नहीं कर सकी। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भी एक भी थर्ड ग्रेड टीचर का ट्रांसफर नहीं हुआ है।
राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर लगातार कहते रहे हैं कि जब तक एक ठोस स्थानांतरण नीति नहीं बन जाती, तब तक थर्ड ग्रेड टीचर्स के तबादले नहीं खोले जाएंगे। हालांकि, यह नीति कब तक बनकर तैयार होगी, इस पर वे हमेशा खामोश रहे हैं।
सरकारें स्थाई नीति बनाने के बजाय समय-समय पर कुछ दिनों के लिए रोक हटाकर काम चलाती रही हैं।
पिछले तीन सालों का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो साफ होता है कि ट्रांसफर विंडो को सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही खोला जाता है:
2024: 10 से 22 फरवरी तक।
2025: 1 से 15 जनवरी तक। इसके बाद 8 मई से 30 जून तक विशेष छूट दी गई।
2026 (वर्तमान): 19 जून को तबादलों से रोक हटाई गई, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों को इससे बाहर रखा गया है।
तबादला सीजन में सबसे अधिक हलचल शिक्षा, पुलिस, कृषि, ग्रामीण विकास और नगरीय विकास जैसे विभागों में होती हैं। जानकार बताते हैं कि इन्हीं विभागों में तबादलों के दौरान सबसे अधिक लेनदेन और सक्रियता देखी जाती है।
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के अधिकारियों का भी मानना है कि ऐसे संवेदनशील विभागों की अलग से निगरानी की जानी चाहिए। इससे अनुचित प्रथाओं पर लगाम कसी जा सके।
राज्य में पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा तबादला नीतियों के कई ड्राफ्ट तैयार किए गए, लेकिन उन्हें कभी लागू नहीं किया गया। इससे मौजूदा व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो सका।
उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने अपने यहां मजबूत और स्मार्ट ऑनलाइन तबादला नीति लागू की है।
हरियाणा: यहां तबादलों के लिए 120 अंकों की एक पारदर्शी अंक प्रणाली निर्धारित की गई है। इसके तहत कर्मचारी ऑनलाइन आवेदन करते हैं और निर्धारित मानकों (जैसे वरिष्ठता, विशेष परिस्थितियां) के आधार पर सॉफ्टवेयर के माध्यम से स्वतः प्राथमिकता तय होती है।
उत्तर प्रदेश: यूपी में एक निश्चित कार्यकाल तय है, जिसके तहत कोई भी कर्मचारी एक जिले में अधिकतम 3 वर्ष और एक संभाग में 7 वर्ष से अधिक समय तक पदस्थापित नहीं रह सकता। ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से पसंदीदा जिलों का चयन होता है और किसी भी कैडर में अधिकतम 20 प्रतिशत से ज्यादा तबादले नहीं किए जा सकते।
पंजाब: यहां तबादलों के लिए परफॉर्मेंस, एसीआर और अन्य कड़े मानकों को आधार बनाया गया है। कुल 250 अंकों में से 90 अंक हासिल करना अनिवार्य होता है। साथ ही, सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों को 15 अतिरिक्त अंकों का विशेष लाभ दिया जाता है।
दिल्ली: दिल्ली में प्रत्येक 3 से 5 वर्ष के अंतराल पर तबादले का प्रावधान है। आवेदन ऑनलाइन होते हैं। कर्मचारी के निवास स्थान के नजदीक पदस्थापन को प्राथमिकता दी जाती है।
आंध्र प्रदेश: यहां किसी भी स्थान पर न्यूनतम 3 वर्ष की सेवा अनिवार्य है। 5 वर्ष से अधिक समय तक एक ही जगह पर पदस्थापन नहीं किया जा सकता। प्रोबेशन काल में तबादलों पर पूरी तरह रोक है। महिला, दिव्यांग तथा गंभीर रूप से बीमार कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जाती है।
राजस्थान में तबादला नीति के अभाव के कारण प्रशासनिक व्यवस्था और शिक्षा का स्तर दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
विशेषज्ञ और शिक्षक संघ लगातार मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार को अन्य राज्यों के सफल मॉडलों का अध्ययन कर तुरंत एक पारदर्शी और ऑनलाइन तबादला नीति लागू करनी चाहिए।
इनका कहना है कि जब तक इस डिजायर सिस्टम को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक तबादलों के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार और दलाली को रोकना असंभव होगा।
प्रदेश में मनमाने और रसूख के आधार पर होने वाले तबादलों ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित किया है, बल्कि इसके कारण अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ भी बढ़ रहा है।
राजस्थान सिविल सेवा अपील न्यायाधिकरण (रेट) और हाई कोर्ट में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। न्याय पाने के चक्कर में हर साल करीब 2500 नए प्रकरण अदालतों और न्यायाधिकरणों तक पहुंच रहे हैं।
अदालतों में तबादलों को लेकर आने वाले नए केसों का ग्राफ चिंताजनक है:
वर्ष 2023: 2,500 केस
वर्ष 2024: 2,400 केस
वर्ष 2025: 2,200 केस
![तबादलों ने अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ बढ़ाया है]()
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सरकार ने 5 जुलाई तक के लिए तबादलों से रोक हटाई है। रोक के हटते ही पंसदीदा जगह पोस्टिंग के लिए लोग उन तमाम जगहों पर चक्कर काट रहे हैं, जहां से उन्हें तबादले की उम्मीद है।
सचिवालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक मनपसंद जगह पोस्टिंग चाहने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों का रैला उमड़ रहा है। सुबह से शाम तक सिर्फ सिफारिशों और अर्जियों का दौर चल रहा है।
तबादलों के लिए यह भीड़ पहली बार नहीं उमड़ी है। प्रदेश में यह बरसों पुरानी रवायत बन चुकी है। सरकार जब भी ट्रांसफर से बैन हटाती है, सत्ता के दरवाजों पर मेला लग जाता है। लोगों की जुगाड़ कल्चर शुरू हो जाती है।
इसलिए मंत्री-विधायकों के घरों में भीड़
इसी डिजायर की चाह में तबादला चाहने वाले लोग विधायकों के घर उमड़ रहे हैं। एक विधायक का कहना है कि आपके क्षेत्र में किन अधिकारी-कर्मचारियों को पोस्टिंग मिल रही है, यह बात उनकी नजर में होनी चाहिए। यह देखना होता कि संबंधित व्यक्ति की निष्ठा किस दल से जुड़ी है।
हालांकि, पूर्व विधायक बनवारी लाल सिंघल डिजायर सिस्टम पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि तबादले 12 महीने जारी रहने चाहिए। इसकी प्रक्रिया कार्मिक विभाग के जरिए कराई जाए, जो आवेदनों की जांच करके जरूरतमंदों का ट्रांसफर कर सके।
क्या जरूरतमंदों को मिल पाएगी राहत?
प्राथमिकता सूची में एकल महिला, विधवा, परित्यक्ता, असाध्य रोगों से पीड़ित कर्मचारी, लंबी सेवा अवधि वाले कार्मिक, दिव्यांगजन और ऐसे पति-पत्नी जो दोनों ही सरकारी सेवा में हैं, उन्हें रखा गया है।
सवाल है कि क्या वाकई इन जरूरतमंद कर्मचारियों को आसानी से राहत मिल पाएगी? या फिर कागजी गाइडलाइन धरी की धरी रह जाएगी अथवा जुगाड़ वाले लोग बाजी मार ले जाएंगे?
जानकार बताते हैं कि तबादला सीजन शुरू होते ही जुगाड़ कल्चर सबसे ज्यादा हावी हो जाता है। नियमों से ज्यादा साम, दाम, दंड, भेद और व्यक्तिगत कारक ट्रांसफर में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
जो जरूरतमंद कर्मचारी बिना किसी पहुंच के सिर्फ अपनी मजबूरी के भरोसे बैठा है, वह अक्सर सचिवालय और मंत्रियों के चक्कर ही काटता रह जाता है। उसकी अर्जी सिफारिशों के भारी वजन के नीचे दब जाती है।
धरातल पर कब उतरेगी पारदर्शी नीति?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा कहते हैं कि तबादला नीति नहीं बनने के पीछे कई कारण होते हैं। किसी एक कारक को जिम्मेदार ठहराना मुश्किल है। मैंने शिक्षा मंत्री रहते हुए तबादला नीति बनाई थी, लेकिन वह लागू नहीं हो पाई थी।
भाजपा ने 2023 के अपने चुनावी संकल्प पत्र में वादा किया था कि वे एक पारदर्शी स्थानांतरण नीति लाएंगे। इससे तबादलों में भेदभाव को रोका जा सकेगा।
रोचक बात यह है कि भजनलाल सरकार ने इस संकल्प पत्र को आधिकारिक दस्तावेज के रूप में स्वीकार भी किया। हकीकत यह है कि भाजपा को सत्ता में आए ढाई साल बीत जाने के बाद भी इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
नतीजतन, इस बार का तबादला सीजन भी पुरानी डिजायर परिपाटी पर ही चल पड़ा है, जहां ट्रांसफर नीति से ज्यादा जुगाड़ और सिफारिशों की गूंज सुनाई दे रही है।
1.75 लाख अध्यापकों का दर्द
प्रदेश में थर्ड ग्रेड टीचर्स के तबादले पिछले 8 सालों से पूरी तरह बंद हैं। इन पर रोक वसुंधरा राजे सरकार के समय से लगी हुई है।
वसुंधरा सरकार के बाद कांग्रेस सरकार आई। अब भजनलाल सरकार काम कर रही है, लेकिन कोई भी सरकार इन शिक्षकों के दर्द को दूर नहीं कर सकी। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भी एक भी थर्ड ग्रेड टीचर का ट्रांसफर नहीं हुआ है।
राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर लगातार कहते रहे हैं कि जब तक एक ठोस स्थानांतरण नीति नहीं बन जाती, तब तक थर्ड ग्रेड टीचर्स के तबादले नहीं खोले जाएंगे। हालांकि, यह नीति कब तक बनकर तैयार होगी, इस पर वे हमेशा खामोश रहे हैं।
नीति नहीं, सिर्फ अस्थाई राहत
पिछले तीन सालों का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो साफ होता है कि ट्रांसफर विंडो को सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही खोला जाता है:
2024: 10 से 22 फरवरी तक।
2025: 1 से 15 जनवरी तक। इसके बाद 8 मई से 30 जून तक विशेष छूट दी गई।
2026 (वर्तमान): 19 जून को तबादलों से रोक हटाई गई, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों को इससे बाहर रखा गया है।
इन विभागों में अधिक लेनदेन
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के अधिकारियों का भी मानना है कि ऐसे संवेदनशील विभागों की अलग से निगरानी की जानी चाहिए। इससे अनुचित प्रथाओं पर लगाम कसी जा सके।
राज्य में पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा तबादला नीतियों के कई ड्राफ्ट तैयार किए गए, लेकिन उन्हें कभी लागू नहीं किया गया। इससे मौजूदा व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो सका।
अन्य राज्यों में क्या है पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था?
हरियाणा: यहां तबादलों के लिए 120 अंकों की एक पारदर्शी अंक प्रणाली निर्धारित की गई है। इसके तहत कर्मचारी ऑनलाइन आवेदन करते हैं और निर्धारित मानकों (जैसे वरिष्ठता, विशेष परिस्थितियां) के आधार पर सॉफ्टवेयर के माध्यम से स्वतः प्राथमिकता तय होती है।
उत्तर प्रदेश: यूपी में एक निश्चित कार्यकाल तय है, जिसके तहत कोई भी कर्मचारी एक जिले में अधिकतम 3 वर्ष और एक संभाग में 7 वर्ष से अधिक समय तक पदस्थापित नहीं रह सकता। ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से पसंदीदा जिलों का चयन होता है और किसी भी कैडर में अधिकतम 20 प्रतिशत से ज्यादा तबादले नहीं किए जा सकते।
पंजाब: यहां तबादलों के लिए परफॉर्मेंस, एसीआर और अन्य कड़े मानकों को आधार बनाया गया है। कुल 250 अंकों में से 90 अंक हासिल करना अनिवार्य होता है। साथ ही, सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों को 15 अतिरिक्त अंकों का विशेष लाभ दिया जाता है।
दिल्ली: दिल्ली में प्रत्येक 3 से 5 वर्ष के अंतराल पर तबादले का प्रावधान है। आवेदन ऑनलाइन होते हैं। कर्मचारी के निवास स्थान के नजदीक पदस्थापन को प्राथमिकता दी जाती है।
आंध्र प्रदेश: यहां किसी भी स्थान पर न्यूनतम 3 वर्ष की सेवा अनिवार्य है। 5 वर्ष से अधिक समय तक एक ही जगह पर पदस्थापन नहीं किया जा सकता। प्रोबेशन काल में तबादलों पर पूरी तरह रोक है। महिला, दिव्यांग तथा गंभीर रूप से बीमार कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जाती है।
पारदर्शी तबादला नीति जरूरी
विशेषज्ञ और शिक्षक संघ लगातार मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार को अन्य राज्यों के सफल मॉडलों का अध्ययन कर तुरंत एक पारदर्शी और ऑनलाइन तबादला नीति लागू करनी चाहिए।
इनका कहना है कि जब तक इस डिजायर सिस्टम को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक तबादलों के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार और दलाली को रोकना असंभव होगा।
मनमाने तबादलों से रेट में केसों की संख्या बढ़ी
राजस्थान सिविल सेवा अपील न्यायाधिकरण (रेट) और हाई कोर्ट में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। न्याय पाने के चक्कर में हर साल करीब 2500 नए प्रकरण अदालतों और न्यायाधिकरणों तक पहुंच रहे हैं।
तबादलों से जुड़े केसों का बढ़ता ग्राफ
वर्ष 2023: 2,500 केस
वर्ष 2024: 2,400 केस
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