टाइगर को बचाने के लिए बिछाया कैमरों का जाल, शुरू होगा मेगा वैक्सीनेशन अभियान
Ashish Bhardwaj | May 22, 2026, 15:17 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के टाइगर रिजर्व सरिस्का में बाघों को कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से बचाने के लिए प्रयास शुरू हो गए हैं। यह वायरस कुत्तों से फैलता है। सरिस्का में कुत्ते टाइगर के लिए खतरा बने हुए हैं।
सुनील जैन@अलवर
जंगल का एक ऐसा नियम है जिसे कोई नहीं बदल सकता। जब जंगल का राजा टाइगर अपनी मांद से बाहर निकलता है तो बड़े से बड़े शिकारी जानवर भी डर के मारे अपना रास्ता बदल लेते हैं। उसकी एक दहाड़ पूरे जंगल को खामोश कर देती है। लेकिन इन दिनों राजस्थान के प्रसिद्ध सरिस्का टाइगर रिजर्व में कहानी थोड़ी उलट गई है।
जिस टाइगर को सबके लिए काल माना जाता है, आज उसी की जान पर संकट मंडरा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह खतरा किसी बड़े शिकारी या शिकारियों के गिरोह से नहीं, बल्कि इंसानी बस्तियों के आसपास घूमने वाले आम कुत्तों से है।
दरअसल, कुत्तों में पाए जाने वाले एक जानलेवा वायरस कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) ने सरिस्का प्रशासन की रातों की नींद उड़ा दी है। स्थिति यह है कि अब जंगल में बाघों से ज्यादा कुत्तों की मॉनिटरिंग की जा रही है।
कैनाइन डिस्टेंपर एक बेहद संक्रामक और जानलेवा वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से कुत्तों में पाई जाती है। जब कोई टाइगर किसी संक्रमित कुत्ते के संपर्क में आता है या उसका शिकार करता है, तो यह वायरस बाघ के शरीर में प्रवेश कर जाता है।
यह वायरस सीधे वन्यजीवों के श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और सबसे खतरनाक-उनके नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) पर हमला करता है। इससे बाघों की मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है, वे सुस्त हो जाते हैं और अंततः उनकी मौत हो जाती है। मध्य प्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क में इस वायरस के कारण 5 बाघों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जिसके बाद राजस्थान का वन्यजीव विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गया है।
सरिस्का के फील्ड डायरेक्टर और सीसीएफ संग्राम सिंह कटियार ने बताया कि वर्तमान में सरिस्का में बाघों की संख्या बढ़कर 52 हो गई है। यहां बाघों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है, जो बेहद खुशी की बात है। लेकिन इस बढ़ती संख्या के साथ ही उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी दोगुनी हो गई है।
टाइगर को इस जानलेवा बीमारी से बचाने के लिए प्रशासन ने अब डॉॉग्स मॉनिटरिंग और वैक्सीनेशन का एक बड़ा एक्शन प्लान तैयार किया है। इसके तहत बाघों की टेरिटरी (क्षेत्र) और उसके आसपास के गांवों में घूमने वाले सभी कुत्तों का शत-प्रतिशत टीकाकरण किया जाएगा।
सरिस्का प्रशासन ने इस खतरे से निपटने के लिए चौतरफा रणनीति बनाई है। बाघों के इलाके में सक्रिय कुत्तों को उनकी उम्र के हिसाब से सुरक्षा चक्र दिया जाएगा। कुत्तों को 6, 9 और 12 सप्ताह की आयु में कैनाइन डिस्टेंपर (CDV) की वैक्सीन दी जाएगी। इसके बाद साल में एक बार उन्हें बूस्टर डोज भी लगाई जाएगी। इसके लिए वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है।
जंगल के भीतर और सीमावर्ती इलाकों में 400 से अधिक अत्याधुनिक कैमरे (ट्रैप कैमरे) लगाए गए हैं। इन कैमरों के जरिए न सिर्फ बाघों बल्कि उनके इलाके में घुसपैठ करने वाले आवारा कुत्तों पर भी पैनी नजर रखी जा रही है।
सभी रेंज अधिकारियों और फॉरेस्टर्स को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई भी कुत्ता बीमार या संदिग्ध हालत में दिखे, तो तुरंत पशु चिकित्सकों को सूचना देकर उसका सैंपल लिया जाए। संक्रमित कुत्तों को तुरंत बाघों की टेरिटरी से दूर आइसोलेट किया जाएगा।
पानी के स्रोतों पर पहरा: जिन तालाबों और वाटर होल्स (Water Holes) से बाघ पानी पीते हैं, उन्हें कुत्तों की पहुंच से पूरी तरह दूर रखा जाएगा ताकि पानी के जरिए संक्रमण न फैले।
इस महा-अभियान में सरिस्का प्रशासन अकेला नहीं है। जंगल के कोर और बफर जोन में बसे ग्रामीण इलाकों के लोगों की भी मदद ली जा रही है। ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है कि वे अपने पालतू या आसपास के आवारा कुत्तों में बीमारी के लक्षण दिखते ही वन विभाग को सूचित करें।
काबू में रखने की यह कवायद सिर्फ अलवर के सरिस्का तक ही सीमित नहीं है। कान्हा नेशनल पार्क की घटना से सबक लेते हुए राजस्थान सरकार अब सरिस्का के साथ-साथ सवाई माधोपुर के प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व में भी विशेष हाई-अलर्ट बरत रही है।
जंगल के राजा को एक सूक्ष्म वायरस से बचाना वन विभाग के लिए एक अनोखी और बड़ी चुनौती है। उम्मीद है कि समय रहते शुरू हो रहा यह वैक्सीनेशन और सख्त निगरानी का चक्र सरिस्का के इन 52 गौरवशाली बाघों को सुरक्षित रखने में कामयाब होगा।
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जंगल का एक ऐसा नियम है जिसे कोई नहीं बदल सकता। जब जंगल का राजा टाइगर अपनी मांद से बाहर निकलता है तो बड़े से बड़े शिकारी जानवर भी डर के मारे अपना रास्ता बदल लेते हैं। उसकी एक दहाड़ पूरे जंगल को खामोश कर देती है। लेकिन इन दिनों राजस्थान के प्रसिद्ध सरिस्का टाइगर रिजर्व में कहानी थोड़ी उलट गई है।
जिस टाइगर को सबके लिए काल माना जाता है, आज उसी की जान पर संकट मंडरा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह खतरा किसी बड़े शिकारी या शिकारियों के गिरोह से नहीं, बल्कि इंसानी बस्तियों के आसपास घूमने वाले आम कुत्तों से है।
दरअसल, कुत्तों में पाए जाने वाले एक जानलेवा वायरस कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) ने सरिस्का प्रशासन की रातों की नींद उड़ा दी है। स्थिति यह है कि अब जंगल में बाघों से ज्यादा कुत्तों की मॉनिटरिंग की जा रही है।
क्यों विलेन बन गए हैं कुत्ते?
यह वायरस सीधे वन्यजीवों के श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और सबसे खतरनाक-उनके नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) पर हमला करता है। इससे बाघों की मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है, वे सुस्त हो जाते हैं और अंततः उनकी मौत हो जाती है। मध्य प्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क में इस वायरस के कारण 5 बाघों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जिसके बाद राजस्थान का वन्यजीव विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गया है।
52 बाघों के कुनबे पर साया
टाइगर को इस जानलेवा बीमारी से बचाने के लिए प्रशासन ने अब डॉॉग्स मॉनिटरिंग और वैक्सीनेशन का एक बड़ा एक्शन प्लान तैयार किया है। इसके तहत बाघों की टेरिटरी (क्षेत्र) और उसके आसपास के गांवों में घूमने वाले सभी कुत्तों का शत-प्रतिशत टीकाकरण किया जाएगा।
कैसे बचेगी रॉयल बंगाल टाइगर की जान?
जंगल के भीतर और सीमावर्ती इलाकों में 400 से अधिक अत्याधुनिक कैमरे (ट्रैप कैमरे) लगाए गए हैं। इन कैमरों के जरिए न सिर्फ बाघों बल्कि उनके इलाके में घुसपैठ करने वाले आवारा कुत्तों पर भी पैनी नजर रखी जा रही है।
सभी रेंज अधिकारियों और फॉरेस्टर्स को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई भी कुत्ता बीमार या संदिग्ध हालत में दिखे, तो तुरंत पशु चिकित्सकों को सूचना देकर उसका सैंपल लिया जाए। संक्रमित कुत्तों को तुरंत बाघों की टेरिटरी से दूर आइसोलेट किया जाएगा।
पानी के स्रोतों पर पहरा: जिन तालाबों और वाटर होल्स (Water Holes) से बाघ पानी पीते हैं, उन्हें कुत्तों की पहुंच से पूरी तरह दूर रखा जाएगा ताकि पानी के जरिए संक्रमण न फैले।
ग्रामीणों का साथ और रणथंभौर भी अलर्ट
काबू में रखने की यह कवायद सिर्फ अलवर के सरिस्का तक ही सीमित नहीं है। कान्हा नेशनल पार्क की घटना से सबक लेते हुए राजस्थान सरकार अब सरिस्का के साथ-साथ सवाई माधोपुर के प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व में भी विशेष हाई-अलर्ट बरत रही है।
जंगल के राजा को एक सूक्ष्म वायरस से बचाना वन विभाग के लिए एक अनोखी और बड़ी चुनौती है। उम्मीद है कि समय रहते शुरू हो रहा यह वैक्सीनेशन और सख्त निगरानी का चक्र सरिस्का के इन 52 गौरवशाली बाघों को सुरक्षित रखने में कामयाब होगा।
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