दावों से डबल है कर्मचारियों पर असली खर्च, जानिए 8वें वेतन आयोग से पहले पूरा गणित
Jinesh Jain | Jul 02, 2026, 20:11 IST
8वें वेतन आयोग से पहले जानिए पूरा गणित
हमारा देश 8वें वेतन आयोग की तैयारियों में जुटा है। मुद्दा यह नहीं है कि सरकार अपने कर्मचारियों पर जरूरत से ज्यादा खर्च कर रही है या कम। असली मुद्दा पारदर्शिता का है। क्या सरकार को खुद पता है कि उसकी जेब से कितना जा रहा है? आइए समझते हैं पूरा मामला:
देश में इस समय 8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चा तेज है। सरकारी कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन में होने वाली बढ़ोतरी आगे के सालों में देश के खजाने की दिशा तय करेगी।
इस बीच एक बुनियादी सवाल सामने आया है। सवाल यह है कि क्या सरकार को वाकई अंदाजा है कि वह अपने कर्मचारियों पर कुल कितना पैसा खर्च कर रही है?
आधिकारिक आंकड़े जो तस्वीर दिखाते हैं, हकीकत उससे कोसों दूर है। पर्दे के पीछे का गणित
कुछ ऐसा है कि सरकार का वास्तविक खर्च कागजी दावों से लगभग दोगुना है।
अगर आप भारत सरकारकी बैलेंस शीट देखेंगे तो लगेगा कि सब कुछ नियंत्रण में है:
केंद्र सरकार का दावा: साल 2015-16 से 2020-21 के बीच वेतन और पेंशन पर होने वाला खर्च देश की जीडीपी का औसतन 2.4% रहा।
राज्यों का दावा: साल 2022-23 में यह आंकड़ा जीडीपी का 2.5% था।
लेकिन ट्विस्ट यहीं है। यह आंकड़ा केवल पक्के यानी स्थायी कर्मचारियों का है। इसमें उन लाखों चेहरों को शामिल ही नहीं किया गया है, जिनके दम पर सरकारी योजनाएं जमीन पर चल रही हैं।
पिछले एक दशक में सरकारी नौकरियों का ट्रेंड पूरी तरह बदल चुका है। साल 2020-21 तक केंद्र में कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की संख्या स्थायी कर्मचारियों की तुलना में 76% तक पहुंच गई है।
एक दशक पहले तक हर दो पक्के कर्मचारियों पर एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी होता था। अब यह अनुपात तेजी से बदला है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के नियमों के मुताबिक सरकार और कर्मचारी के रिश्ते के बीच होने वाले हर नियमित भुगतान को सैलरी माना जाना चाहिए। मगर भारत के आधिकारिक आंकड़ों में इन तीन वजहों से बड़ी हेराफेरी हो जाती है:
कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी: मंत्रालयों में डेटा एंट्री, मेंटेनेंस और सुरक्षा जैसे बारहमासी काम करने वाले इन कर्मचारियों का डेटा श्रम मंत्रालय के पास भी पूरा नहीं है।
अनुमान है कि इन्हें न्यूनतम मजदूरी देने में ही केंद्र के सालाना ₹14,000 करोड़ खर्च होते हैं, जो सैलरी हेड में दिखते ही नहीं।
योजना कार्यकर्ता (Scheme Workers): देश की 10 लाख आशा वर्कर्स और पीएम-पोषण योजना के तहत काम करने वाले 37 लाख रसोइए-सह-सहायक। इन्हें कर्मचारी नहीं स्वयंसेवक माना जाता है। सैलरी की जगह मानदेय दिया जाता है।
सरकारें स्वायत्त संस्थान बनाती हैं। उन्हें ग्रांट देती हैं। साल 2024-25 में 350 से अधिक ऐसे संस्थानों को वेतन के लिए 60,000 करोड़ रुपए दिए गए।
इसी तरह देश के 232 नगर निगमों के कर्मचारियों का 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च मुख्य सैलरी अकाउंट से बाहर रहता है।
एक ही काम के लिए कहीं सैलरी लिखा जाता है। कहीं मानदेय तो कहीं योजना खर्च। इस कन्फ्यूजन के कारण राज्यों के खर्च की आपस में तुलना करना नामुमकिन हो जाता है।
अगर आंकड़ों की बाजीगरी को हटाकर कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों का वेतन, आशा वर्कर्स का मानदेय, स्वायत्त संस्थानों की सैलरी और रेलवे-डाक विभाग की पेंशन को जोड़ दिया जाए, तो असली तस्वीर कुछ ऐसी दिखती है:
![8वें वेतन आयोग से पहले जानिए पूरा गणित: कर्मचारियों पर असली खर्च दावों से दोगुना]()
जब सरकारें असली खर्च को छिपाकर कागजों पर अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत दिखाती हैं, तो इसका नुकसान भारत की अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ता है।
खतरे की घंटी: संशोधित पेंशन और ब्याज भुगतानों को जोड़ने के बाद केंद्र सरकार का अनिवार्य खर्च उसकी कुल कमाई का लगभग 82% तक पहुंच जाता है।
इसका मतलब यह है कि सरकार के पास हाईवे, रेलवे, अस्पताल और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए सिर्फ 18% पैसा बचता है। नतीजा, सरकार को विकास कार्यों के लिए भारी-भरकम कर्ज लेना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाला 8वां केंद्रीय वेतन आयोग इस विसंगति को सुधारने का सबसे बड़ा मौका है। इसके लिए तीन ठोस कदम उठाने होंगे:
एक समान परिभाषा: सभी श्रेणियों के कर्मचारियों (स्थायी, कॉन्ट्रैक्ट, योजना कार्यकर्ता) को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक ही मुआवजा ढांचे में गिना जाए।
पारदर्शिता: हर मंत्रालय और राज्य सरकार हर साल अपने कॉन्ट्रैक्ट और योजना कार्यकर्ताओं की सही संख्या और उन पर होने वाले खर्च का डेटा सार्वजनिक करे।
सटीक आकलन: वेतन आयोग और पेंशन सुधारों के दीर्घकालिक वित्तीय प्रभाव का सटीक आकलन किया जाए।
मुद्दा यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार अपने कर्मचारियों पर जरूरत से ज्यादा खर्च कर रही है या कम। असली मुद्दा पारदर्शिता का है। क्या सरकार को खुद पता है कि उसकी जेब से कितना जा रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक मर्ज का सही पता नहीं होगा, तब तक आर्थिक स्थिरता का इलाज संभव नहीं है।
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इस बीच एक बुनियादी सवाल सामने आया है। सवाल यह है कि क्या सरकार को वाकई अंदाजा है कि वह अपने कर्मचारियों पर कुल कितना पैसा खर्च कर रही है?
आधिकारिक आंकड़े जो तस्वीर दिखाते हैं, हकीकत उससे कोसों दूर है। पर्दे के पीछे का गणित
कुछ ऐसा है कि सरकार का वास्तविक खर्च कागजी दावों से लगभग दोगुना है।
सरकारी आंकड़े बनाम असली हकीकत: कहां है झोल?
केंद्र सरकार का दावा: साल 2015-16 से 2020-21 के बीच वेतन और पेंशन पर होने वाला खर्च देश की जीडीपी का औसतन 2.4% रहा।
राज्यों का दावा: साल 2022-23 में यह आंकड़ा जीडीपी का 2.5% था।
लेकिन ट्विस्ट यहीं है। यह आंकड़ा केवल पक्के यानी स्थायी कर्मचारियों का है। इसमें उन लाखों चेहरों को शामिल ही नहीं किया गया है, जिनके दम पर सरकारी योजनाएं जमीन पर चल रही हैं।
अदृश्य वर्कफोर्स जो बजट से है गायब
एक दशक पहले तक हर दो पक्के कर्मचारियों पर एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी होता था। अब यह अनुपात तेजी से बदला है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के नियमों के मुताबिक सरकार और कर्मचारी के रिश्ते के बीच होने वाले हर नियमित भुगतान को सैलरी माना जाना चाहिए। मगर भारत के आधिकारिक आंकड़ों में इन तीन वजहों से बड़ी हेराफेरी हो जाती है:
1. बजट के सैलरी हेड से बाहर हैं ये लोग:
अनुमान है कि इन्हें न्यूनतम मजदूरी देने में ही केंद्र के सालाना ₹14,000 करोड़ खर्च होते हैं, जो सैलरी हेड में दिखते ही नहीं।
योजना कार्यकर्ता (Scheme Workers): देश की 10 लाख आशा वर्कर्स और पीएम-पोषण योजना के तहत काम करने वाले 37 लाख रसोइए-सह-सहायक। इन्हें कर्मचारी नहीं स्वयंसेवक माना जाता है। सैलरी की जगह मानदेय दिया जाता है।
2. टुकड़ों में बिखरा हुआ डेटा
इसी तरह देश के 232 नगर निगमों के कर्मचारियों का 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च मुख्य सैलरी अकाउंट से बाहर रहता है।
3. परिभाषाओं का हेरफेर
जब खुला तो चौंक गए सब!
8वें वेतन आयोग से पहले जानिए पूरा गणित: कर्मचारियों पर असली खर्च दावों से दोगुना
देश के विकास पर कैसे लग रहा है ब्रेक?
खतरे की घंटी: संशोधित पेंशन और ब्याज भुगतानों को जोड़ने के बाद केंद्र सरकार का अनिवार्य खर्च उसकी कुल कमाई का लगभग 82% तक पहुंच जाता है।
इसका मतलब यह है कि सरकार के पास हाईवे, रेलवे, अस्पताल और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए सिर्फ 18% पैसा बचता है। नतीजा, सरकार को विकास कार्यों के लिए भारी-भरकम कर्ज लेना पड़ता है।
8वां वेतन आयोग बन सकता है गेम चेंजर
एक समान परिभाषा: सभी श्रेणियों के कर्मचारियों (स्थायी, कॉन्ट्रैक्ट, योजना कार्यकर्ता) को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक ही मुआवजा ढांचे में गिना जाए।
पारदर्शिता: हर मंत्रालय और राज्य सरकार हर साल अपने कॉन्ट्रैक्ट और योजना कार्यकर्ताओं की सही संख्या और उन पर होने वाले खर्च का डेटा सार्वजनिक करे।
सटीक आकलन: वेतन आयोग और पेंशन सुधारों के दीर्घकालिक वित्तीय प्रभाव का सटीक आकलन किया जाए।
क्यों जरूरी है यह?
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